नई दिल्ली। Press Club of India (PCI) ने United News of India (UNI) के दफ्तर में पत्रकारों के साथ हुई कथित बदसलूकी पर गहरा आघात जताया है।
PCI ने अपने बयान में कहा कि रफी मार्ग स्थित UNI परिसर में जमीन विवाद से जुड़े कोर्ट आदेश के बाद पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान ड्यूटी पर मौजूद पत्रकारों—जिनमें महिला कर्मचारी भी शामिल थीं—के साथ धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार बेहद चिंताजनक है।
प्रेस क्लब ने इस तरह की “जबरदस्ती और मनमानी” की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
PCI ने संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की तुरंत जांच कराई जाए और जो भी इस तरह के दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
इस घटना के बाद मीडिया संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है और इसे प्रेस की स्वतंत्रता से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

शकील अख्तर-
UNI के दफ्तर में जिस तरह पुलिस और सुरक्षा कर्मी घुसे पत्रकारों को जबरदस्ती बाहर निकाला, महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया और दफ्तर सील कर दिया ऐसा अगर कांग्रेस के राज में होता तो क्या होता? सोचिए जरा और बताइए!
पत्रकारिता ने पूरी तरह घुटने टेक रखे हैं मगर फिर भी उस पर कोई रहमो करम नहीं है। पहले UNI बिक गई। उसमें कार्यरत पत्रकारों को कई सालों से तनख्वाह नहीं मिल रही थी उनके लाखों रुपया बकाया है मगर कुछ नहीं दिया गया।
प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की थी। मगर कुछ नहीं हुआ।
और उसके बाद देश का एक दूसरा सबसे बड़ा मीडिया संस्थान सहारा बंद हो गया। वहां भी पत्रकारों को कुछ नहीं दिया। उनके भी लाखों रुपया बकाया है।
सहारा अखबार और टीवी सब बंद हो गए। सहारा के लोग अब कोर्ट जा रहे हैं। उनका केस बहुत मजबूत है उन्हें विश्वास है कि पत्रकारों सहित दूसरे गैर पत्रकार कर्मियों को पूरा बकाया मिलेगा।
लेकिन कोर्ट के फैसले अपनी जगह हैं सरकार को इसमें जो हस्तक्षेप करना चाहिए वह कहीं नहीं है।
और भी कई मीडिया प्रतिष्ठानों का यही हाल है। मन चाहे तरीका से कभी भी पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों की छुट्टी कर दी जाती है। कई टीवी चैनल बंद हो गए हैं।
दुनिया में प्रेस फ्रीडम में उसका स्थान ऐसे ही नहीं गिरता जा रहा। 2024 में 180 देशों की लिस्ट में 159 नंबर पर आ गया था।
देश में दो न्यूज़ एजेंसी हैं। इन्हें ऑफिशियल कहा जाता है। PTI और UNI. दो इसलिए जरूरी होती हैं की कंपटीशन बना रहे। मोनोपोली ना हो जाए। मगर इसमें से UNI को साजिशन मारा गया।
पार्लियामेंट में सिर्फ ऑफिशल मीडिया को ही कमरे अलाट हैं। एक PTI, दो UNI और तीन ऑल इंडिया रेडियो को।
मगर अभी कुछ समय पर UNI के कमरे में से आधा हिस्सा ANI को दे दिया गया। UNI का विरोध वैसे ही काम नहीं आया जैसा अभी कल रात को उनके मुख्यालय को सील करते समय नहीं आ पाया।
मीडिया में सवाल पूछा जा रहा है की क्या एक पूरी तरह प्राइवेट एजेंसी ANI को नो प्रॉफिट नो लॉस पर चलने वाली UNI के स्थान पर एस्टेब्लिश किया जा रहा है?
पत्रकारिता के लिए एक बहुत ही खराब दौर। आगे और क्या होगा किसी को पता नहीं। आवाजें उठ पाएंगी लोग बोल पाएंगे कहना भी मुश्किल।
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