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दिल्ली

खरबों रुपये की UNI की जमीन पर क्या केंद्र सरकार की नजर है?

लेकिन किसके लिए…?

शिशिर सोनी-

जिस तरह हमारे पत्रकार साथियों को कल UNI.. यूनीवार्ता के दफ्तर से खदेड़ा गया, महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, न्यूजरूम में दिल्ली पुलिस ने घुसकर गुंडई की है वो आपातकाल से भी बुरे दौर की याद दिलाने को काफी है। इंदिरा गांधी के आपातकाल को कोसने वाले उन सभी साथियों को एक प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी के साथ इस पुलिसिया दुर्व्यवहार पर भी उसी तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए। सड़कों पर आना चाहिए। ये अति है। दुर्गति की तैयारी है।

यूएनआई के साथियों ने बताया कि कुछ वकीलों के साथ सैंकड़ों को तादाद में दिल्ली पुलिस यूएनआई के दफ्तर में शुक्रवार की शाम घुस गई। उनके साथ केंद्रीय शहरी मंत्रालय के भू संपदा विभाग के कुछ अधिकारी भी थे। उनलोगों ने कहा दिल्ली हाईकोर्ट का ऑर्डर है तुरंत यूएनआई परिसर खाली करें। शाम का समय खबरों का होता है। सभी साथी खबरें फाइल कर रहे थे। पुलिस न्यूजरूम में घुस गई। कायदे से उन्हें यूएनआई मैनेजमेंट से बात करनी चाहिए थी। उन्हें हाईकोर्ट का नोटिस दिखाना चाहिए था। यूएनआई मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों से कहता कि आपलोग दफ्तर खाली कर दें। तो कर्मचारी चले जाते।

मगर लोकतांत्रिक मूल्यों को जिस तरह पुलिस के द्वारा कुचला गया। जिस तरह लोकतंत्र के एक-एक खम्भे को रौंदा जा रहा है। जिस तरह पत्रकारों के साथ बदसूलकी की गई, याद रखना लोकतंत्र को राजतंत्र में बदलने में समय नहीं लगेगा। दिल्ली हाईकोर्ट का ऑर्डर कोई भगवान का फरमान है क्या? अगर ऐसा कोई ऑर्डर आया भी तो केंद्र सरकार के वकीलों को ये कहने का अधिकार किसने दे दिया कि 3 मिनट में दफ्तर खाली करो? क्या हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से बड़ा हो गया? एक ऑर्डर आया भी तो उसके कानूनी पहलुओं को देखकर यूएनआई एजेंट सुप्रीम कोर्ट जाए वहां से स्टे लाये इसका समय देने में केंद्र सरकार को क्या परेशानी थी?

यूएनआई के एक साथी ने बताया, दिल्ली के दिल में चल रहे खरबों रुपये की यूएनआई की जमीन पर केंद्र सरकार की नजर है। केंद्र सरकार द्वारा लीज रिनिवल नहीं किया गया। मामला कोर्ट में गया तकनीकी कारणों से अगर हाईकोर्ट ने खाली करने का आदेश दे भी दिया तो हड़बड़ी इसलिए की गई ताकि तमाम मीडिया को घुटने पर लाने के लिए सरकारी तंत्र अपनी ताकत दिखाना चाहता है। पत्रकार साथी ने कहा, जब लीज वापिस ही लेना था, जमीन पर कब्जा करना था तो बमुश्किल साल भर पहले यूएनआई चलाने को स्टेट्समैन मैनेजमेंट को टेकओवर क्यों करने दिया गया? क्यों सैंकड़ों पत्रकारों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया गया?

ऐसा इसलिए हो रहा है कि सब अपनी बारी की प्रतिक्षा में “मैनू की” वाले मोड पर रहे। साथी पत्रकारों, मीडिया संस्थानों को धमकाने वाले सरकारी कदमों पर पत्रकार “मैनू की” से ऊपर उठ कर बारी-बारी चारण भाट बनते गए। तय मानो, चुप रखे, खामोशी ओढ़े रहे तो कल तुम्हारी बारी भी आएगी। ऐसा जीना भी क्या जीना है – जो देश की, उसके लोकतंत्र की हिफाजत में खुद को होम न कर सके!

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1 Comment

1 Comment

  1. Ravindra Nath Kaushik

    March 21, 2026 at 1:49 pm

    जमीन केंद्र की ही है ना? 40 साल दे दीये लीज शर्ते पूरी करने को,कान पै जूं नही रेंगी. हाईकोर्ट ने हवा में order तो किया नही. कि यूएनआई मामा बुआ की बेटी है ? कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का रोना कब से रोया जा रहा है? ये भी सरकार के मत्थे? स्टेट्समैन ने फ्री में कब्जाया कि आंख बंद करके ? उसे मुकदमे का पता नही था? अब चले जाओ सुप्रीम कोर्ट. दोबारा आ के बैठ जाना, गाहक ऐजेंसी के हैं कि कर्मचारी पत्रकारों के जो इतनी फिक्र हो गई. चार-चार महीने तो वेतन नही मिलता था. ऐसे कौन नौकरी करता है? वही,जिसके पास इसके अलावा और कोई रास्ता नही होता.यानि नालायक

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