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सत्ता कर रही पत्रकारों का ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’, क्या अब सच बोलना महंगा पड़ेगा?

जयपुर/दिल्ली। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के लिए आज के दौर में चुनौतियां केवल मैदान तक सीमित नहीं रह गई हैं। हाल के दिनों में सत्ता के गलियारों में एक नया शब्द चर्चा का विषय बना हुआ है— ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’ (Economic Encounter)। यह किसी हथियार से किया गया हमला नहीं, बल्कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की आर्थिक रीढ़ तोड़ने की एक ऐसी सुनियोजित प्रक्रिया है, जो निष्पक्ष पत्रकारिता के सामने बड़ा संकट खड़ा कर रही है।

क्या है पत्रकारों का ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’?
जब कोई पत्रकार या संस्थान सत्ता की कमियों को उजागर करता है या जनता के सवालों को मजबूती से उठाता है, तो सीधे टकराव के बजाय अब उनकी आर्थिक घेराबंदी शुरू कर दी जाती है।

विज्ञापनों पर रोक, सरकारी आवासों का खाली कराया जाना और बेवजह के कानूनी नोटिसों के जरिए संस्थानों को आर्थिक रूप से पंगु बनाना ही ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’ कहलाता है। जानकारों का मानना है कि यह तरीका किसी भी पत्रकार की आवाज को दबाने का सबसे ‘मौन’ लेकिन सबसे घातक हथियार है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार
मीडिया जगत के विशेषज्ञों का कहना है कि एक समय था जब पत्रकारों को उनकी निर्भीकता के लिए सम्मान मिलता था, लेकिन आज स्थिति बदल रही है। यदि पत्रकार सत्ता के सुर में सुर न मिलाए, तो उसे ‘सिस्टम’ से बाहर करने की कोशिशें तेज हो जाती हैं।ये सवाल आज हर उस पत्रकार की कहानी है जो अपनी कलम की धार को कुंद नहीं होने देना चाहता।

मुख्य बिंदु जो चिंता का विषय हैं:

  • विज्ञापन नीति में भेदभाव: स्वतंत्र रूप से लिखने वाले अखबारों और पोर्टल्स के सरकारी विज्ञापनों पर अघोषित प्रतिबंध।
  • आर्थिक अपराध की जांच: सत्ता विरोधी स्वर अलापने वाले पत्रकारों पर बेवजह आर्थिक जांच एजेंसियों का दबाव।
  • भविष्य का संकट: क्या आने वाले समय में केवल वही पत्रकार सुरक्षित रहेंगे जो ‘पीआर एजेंसी’ की तरह काम करेंगे?

पत्रकारिता का धर्म केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना भी है। यदि सवाल पूछने पर ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’ का डर दिखाया जाएगा, तो जनता की आवाज कौन बनेगा? सरकार को चाहिए कि वह आलोचना को व्यक्तिगत हमले के रूप में न देखकर उसे सुधार के अवसर के रूप में स्वीकार करे।

पत्रकारिता के इस बदलते स्वरूप में अब पत्रकारों को न केवल कलम चलानी है, बल्कि अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए भी एक बड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ इस ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर’ से खुद को कैसे बचा पाता है।

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