परमानंद पांडेय-
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) एक पूरी तरह से अप्रासंगिक संस्था बन चुकी है। यह ऐसी संस्था है जो न तो प्रभावी है और न ही व्यावहारिक—बल्कि सरकारी खजाने पर बोझ मात्र है। यह आत्म-नियमन (self-regulation) की व्यवस्था की बात करती है, लेकिन व्यवहार में इसका पालन कम और उल्लंघन ज्यादा होता है।
प्रेस काउंसिल एक्ट की धारा 14 के तहत जो तीन तरह की सज़ाएं निर्धारित हैं—चेतावनी (warning), फटकार/निंदा (reprimand/admonishment) और जांच के बाद ‘सेंसर’ (censure)—उनमें कोई खास अंतर नहीं है। ये सज़ाएं महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं और इनका कोई ठोस असर नहीं दिखता।
काउंसिल अखबारों को यह निर्देश दे सकती है कि वे अपने खिलाफ हुई जांच की जानकारी प्रकाशित करें, लेकिन यदि मामला अदालत में लंबित हो तो वह उसमें दखल नहीं दे सकती। साथ ही, इसके फैसलों को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती। कुल मिलाकर, PCI एक नैतिक निगरानी (moral watchdog) की भूमिका निभाती है, जिसका दायरा केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित है। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया पर इसका कोई अधिकार नहीं है।
प्रेस काउंसिल की स्थापना प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। यह आयोग सितंबर 1952 में गठित हुआ था और 1954 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके अध्यक्ष बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जी.एस. राजाध्यक्ष थे।
प्रथम प्रेस आयोग के प्रमुख सदस्य
इस आयोग में कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शामिल थे, जैसे—
- डॉ. सी.पी. रामास्वामी अय्यर, प्रख्यात वकील और प्रशासक
- आचार्य नरेंद्र देव, शिक्षाविद और समाजवादी नेता
- डॉ. जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने
- डॉ. वी.के.आर.वी. राव, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के संस्थापक
- पी.एच. पटवर्धन, मराठवाड़ा मुक्ति आंदोलन के प्रमुख नेता
- त्रिभुवन नारायण सिंह, पत्रकार और बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री
- जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासी नेता और 1928 ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान
- जे. नटराजन, भारतीय पत्रकारिता के इतिहासकार
- ए.आर. भट्ट और एम. चेलापति राव जैसे अन्य विद्वान और पत्रकार
इस आयोग ने स्वतंत्र भारत में प्रेस के विकास और नियमन के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं।
प्रेस काउंसिल की स्थापना
आयोग की प्रमुख सिफारिशों में से एक थी एक वैधानिक प्रेस काउंसिल की स्थापना, जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करे, पत्रकारिता के मानकों को बनाए रखे और आचार संहिता तैयार करे। इसी आधार पर 1966 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना हुई।
हालांकि, समय के साथ यह संस्था अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रही।
अन्य प्रमुख सिफारिशें
आयोग ने भारत में समाचार पत्रों के पंजीकरण और निगरानी के लिए रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया (RNI) बनाने की सिफारिश की, जिसकी स्थापना 1956 में हुई। इसके अलावा, ‘प्राइस-पेज शेड्यूल’ और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की गईं।
लेकिन आज डिजिटल मीडिया के दौर में इन सिफारिशों की प्रासंगिकता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को भी अब नए श्रम कानूनों में समाहित कर दिया गया है।
आज की स्थिति
इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के तेजी से विस्तार के कारण प्रिंट मीडिया का प्रभाव सीमित हो गया है। ऐसे में केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित प्रेस काउंसिल की उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
इसके अलावा, वर्तमान प्रेस काउंसिल में ऐसे लोगों की नियुक्ति को लेकर भी आलोचना होती रही है, जिनका पत्रकारिता से सीधा संबंध नहीं है। आरोप यह भी लगते हैं कि पत्रकारिता से इतर लोग—जैसे विज्ञापन एजेंट या संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े लोग—भी इसमें प्रवेश पा जाते हैं।
क्या होना चाहिए?
इन सभी कारणों से यह मांग उठ रही है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को समाप्त कर दिया जाए और उसकी जगह एक व्यापक “मीडिया काउंसिल” बनाई जाए।
यह नई संस्था प्रतिनिधिक स्वरूप की हो, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार, विधि विशेषज्ञ, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि शामिल हों, ताकि मीडिया की वास्तविक निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
(लेखक IFWJ के महासचिव और 1990 के दशक में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य रह चुके हैं)
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