नई दिल्ली। देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस एक बार फिर विवादों में घिर गया है। सोशल मीडिया पर अखबार की रिपोर्टिंग को लेकर तीखी आलोचना सामने आई है, जिसमें उस पर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और “फॉल्स नैरेटिव” चलाने के आरोप लगाए गए हैं।
दरअसल, एक यूजर ने अखबार की एक खबर पर सवाल उठाते हुए लिखा—“इंडियन एक्सप्रेस अखबारों का चंद्रचूड है। ‘जर्नलिज्म ऑफ करेज’ का दावा करने वाले इस संस्थान में अगर तथ्यों की गलत रिपोर्टिंग होगी, तो यह टैगलाइन भी छोड़ देनी चाहिए।”
आरोप है कि अखबार ने एक ऐसे मुद्दे को “महिला बिल” से जोड़कर पेश किया, जो वास्तव में उस संदर्भ में था ही नहीं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग न सिर्फ पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है और कई यूजर्स अखबार से स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों ने इसे “गलतफहमी” या “व्याख्या का अंतर” भी बताया है।
फिलहाल, इस पूरे विवाद पर इंडियन एक्सप्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, यह मामला एक बार फिर मीडिया की जिम्मेदारी, फैक्ट-चेकिंग और विश्वसनीयता को लेकर बहस को तेज कर रहा है।
Indian Express is the Chandrachud of newspapers. -विनय अरविंद, चेन्नई बेस्ड टेक राइटर और फोटोग्राफर
मृणाल पांडे-
जिस शिशु का जन्म २०२३ में बाक़ायदा घोषित होने का पक्का साक्ष्य हो, तीन बरस बाद २०२६ में किसी पर उसकी ‘भ्रूण हत्या’ का आरोप कैसे लगाया जा सकता है?
समर शेष है
नहीं सजा़ का भागी विपक्षी उपहास
समय लिखेगा बहुत जल्द
भुलक्कड मीडिया का भी इतिहास
( दिनकर जी से क्षमा)
Indian Express की इस खबर के अनुसार –
सूरत की कपड़ा–डायमंड इंडस्ट्री में मंदी है और गर्मी की छुट्टियां शुरू हो रही हैं। ऐसे में हजारों प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं। इसमें एक बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा के मजदूरों की है। उधना रेलवे स्टेशन पर मारामारी है। -सचिन गुप्ता, पत्रकार

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