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राजकमल झा का सुर बीजेपी वाला हो गया है!

संविधान संशोधन और डीलिमिटेशन से जुड़े मुद्दे पर मीडिया की भूमिका एक बार फिर बहस के केंद्र में है। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा के रुख को लेकर आलोचनाएं सामने आ रही हैं, जिसमें उन पर तथ्यों की अनदेखी कर एक खास राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा रहा है।

सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतने वरिष्ठ संपादक के स्तर पर भी संवैधानिक मुद्दों की व्याख्या में भ्रम पैदा किया जा रहा है, या फिर यह बदलते मीडिया परिदृश्य की एक बड़ी तस्वीर है…


गोबरपट्टी के सवर्ण की स्थिति ये है कि मोदी अगर कहे कि काम पर निकलने से पहले चार जूते खाने हैं तो ये कहेगा कि जूते लगाने के काउंटर कम है – काम पर लेट हो जाते हैं
इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा को क्या ये मालूम नहीं होगा कि संविधान संशोधन बिल डीलिमिटेशन के लिये था.
सवर्ण सच झूठ, नैतिक अनैतिक का फ़र्क छोड़ चुका है – उसे संविधान या लोकतंत्र नहीं चाहिये, हर कीमत पर मोदी चाहिये. -प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार

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