बद्री प्रसाद सिंह-
वर्ष १९७५ में श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने आपातकाल की घोषणा कर विरोधियों को विभिन्न मुक़दमों में गिरफ़्तार करा लिया। आपातकाल में कांग्रेसी नेता सक्रिय हो गये और इसी अवधि में मुन्ना भाई इंदिरा जी के नज़दीक आये यद्यपि संजय गांधी की उच्छृंखलता के वह समर्थक नहीं थे। वर्ष १९७७ के संसद चुनाव में जनता दल की सरकार बनी और कांग्रेस हिंदी पट्टी से साफ़ हो गई। उत्तर प्रदेश की ८५ सीट में से कांग्रेस का कोई प्रत्याशी विजयी न हो सका और केंद्र में मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी।
मैं १९७५ में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर चयनित हुआ और १९७६ की परीक्षा में आईपीएस व आईएएस एलाइड सेवा के लिए साक्षात्कार हेतु चयनित हुआ जिसकी तैयारी के लिए नई दिल्ली आ गया। तब मुन्ना भाई कर्ज़न एपार्टमेंट में रहते थे। मैं उनसे मिलने ७-८ दिन में जाता था और वह हालचाल पूछ कर ५०० रुपये मुझे दिया करते थे। एक दिन जब वह मुझे रुपये देने लगे तब मैंने पैसे लेने से मना कर इंदिरा गांधी जी से मिलवाने की जिद करने लगा।
पहले तो वह डाँटे लेकिन मेरी जिद पर तैयार होकर फ़िएट कार पर मुझे बिठा कर १ सफदरजंग मार्ग पर लाए जहां इंदिरा जी का निवास था। मैं भी उनके साथ भीतर गया जहां उन्हें सभी जानते थे। इंदिरा जी अपने कक्ष में बैठी थी, वह मुझे लेकर भीतर गए। इंदिरा जी ने मेरी तरफ इशारा कर मेरा परिचय पूछा तो उन्होंने मुझे अपना छोटा भाई बताया। मैंने उनका चरणस्पर्श कर प्रणाम किया। उन्होंने पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैंने बताया कि मैं उ.प्र. में पुलिस उपाधीक्षक पद पर चयनित हूँ और आईपीएस के साक्षात्कार के लिए यहाँ आया हूँ। उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए देश और जनता की ईमानदारी से सेवा करने को कहा और मुन्ना भाई से मुझे कुछ खिलाने हेतु कहा। हम प्रणाम कर वहाँ से निकले। इंदिरा गांधी जी से मिलने के बाद मेरी भूख-प्यास समाप्त हो गई थी और आह्लादित मन से मैं भाई को वहीं छोड़कर कर निकल आया। मुन्ना भाई की इंदिरा गांधी से निकटता का यह एक उदाहरण था।
केंद्रीय सरकार ने उन सभी प्रदेशों की विधानसभाओं को भंग कर दिया जहाँ लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया था। उत्तर प्रदेश की भी विधानसभा भंग कर चुनाव की घोषणा की गई। अंग्रेज़ी राज्य में हमारा परिवार कांग्रेस समर्थक रहा था जिसका परिणाम शस्त्र लाइसेंस का निलंबन तथा कुर्की में हुआ था। १९७७ के विधानसभा चुनाव में मुन्ना भाई मछलीशहर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस दल से चुनाव लड़ने का विचार किया और इंदिरा गांधी की कृपा से वह कांग्रेस के प्रत्याशी बन कर स्थानीय कांग्रेस नेताओं को अचंभित कर दिया। चुनाव प्रचार की उनकी शैली ने मतदाताओं को अत्यधिक प्रभावित किया। जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर था तभी परिवार के गोपाल भाई, जो मुझसे बड़े व मुन्ना भैया से छोटे थे, की चुनाव प्रचार के समय सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी।
यद्यपि इस चुनाव में मुन्ना भाई विजयी हुए लेकिन परिवार की अपूरणीय क्षति हुई। इस विजय पर मुझे शिवाजी महाराज का कथन याद आता है “गढ़ आणा पण सिंह गेला” (क़िला तो जीत लिया लेकिन हमारे सेनापति नहीं रहे॥) यह कथन उन्होंने तब कहा था जब उनके बहादुर सेनापति ताना जी मलुसरे मुग़लों से लड़ कर कोढाणा क़िला जीता था लेकिन इस लड़ाई में ताना जी शहीद हुए थे॥
इस चुनाव में कांग्रेस दल की शर्मनाक पराजय हुई थी। कांग्रेस नारायण दत्त तिवारी जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी, वह ४२५ में से मात्र ४५ सीट पाई थी। चुनाव बाद तिवारी जी कांग्रेस विधायक दल के नेता तथा अरुण कुमार सिंह उप नेता चुने गये। तिवारी जी इस अप्रत्याशित हार की शर्म से सदन में कम ही आते थे और विपक्ष की पूरी ज़िम्मेदारी मुन्ना भाई ने बखूबी निभाई।
संजय गांधी जी पर लखनऊ में मुक़दमा चल रहा था जिसकी तारीख़ पर वह लखनऊ आते थे। मुन्ना भाई उन्हें अमौसी हवाईअड्डे पर स्वागत व विदाई करते थे लेकिन न्यायालय में अन्य कांग्रेसी नेताओं की तरह उनके पक्ष में नारेबाज़ी या उधम नहीं करते थे जिससे संजय गांधी उनसे रुष्ट रहा करते थे। उस समय वह उ. प्र. युवा कांग्रेस के अध्यक्ष थे।
१९७८ में वह युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बने उस समय ग़ुलाम नवी आज़ाद अध्यक्ष हुआ करते थे। १९७८ में एक डेलीगेशन में उन्हें क्यूबा भेजा गया जहां उन्होंने क्यूबा की फ़िदेल कास्त्रो की सरकार की उपलब्धियाँ देखी ।वह १९८३ तक महासचिव रहे।
वर्ष १९७८ के अंत में मेरे बैच के पुलिस उपाधीक्षकों का व्यवहारिक प्रशिक्षण कुछ सप्ताह के लिए लखनऊ हुआ। मेरे २५ के बैच में १८ अधिकारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से थे इसलिए वे सभी मुन्ना भाई से बखूबी परिचित थे। लखनऊ में हम ८ अधिकारी मुन्ना भाई के सरकारी आवास २४ रायल होटल में रुके थे। जब डीजीपी कार्यालय जाने के लिए हम सब वर्दी में वहाँ से निकले तो आसपास के विधायकों ने समझा कि भाई के घर पुलिस का छापा पड़ा है। शाम को भाई जब अपने आवास लौटे तो परिसर में उन्हें सतर्क किया गया कि उनके मकान पर पुलिस आई थी वह वहाँ से निकल भागें। तब उन्होंने बताया कि वहाँ छोटा भाई (मैं) अपने पुलिस साथियों के साथ रुका है। प्रशिक्षण की आख़िरी रात भाई ने घर पर सभी २५ अधिकारियों को भव्य दावत दी थी।
जनता दल के आपसी मतभेद से मोरारजी देसाई सरकार का पतन हुआ, तदुपरांत चौधरी चरण सिंह अल्प काल के लिए कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने लेकिन सरकार न चला सके और उन्हें भी त्याग पत्र देना पड़ा जिसके कारण जनवरी १९८० में लोकसभा का चुनाव हुआ जिसमें इंदिरा गांधी जी की कांग्रेस ने शानदार वापसी कर ३५३ सीटें जीती और वह प्रधानमंत्री बनी। उन्होंने कुछ प्रदेशों की जनता दल की सरकारों को भंग कर वहाँ विधानसभा का पुनः चुनाव कराया गया जिसमें उत्तर प्रदेश भी था।
संजय गांधी से मुन्ना भाई के असहज संबंध के कारण वर्तमान विधायक होने के बाद भी विधानसभा के टिकट से उन्हें वंचित कर दिया गया। मुन्ना भाई इंदिरा गांधी जी से मिले लेकिन उस समय वह भी संजय गांधी के सामने विवश थीं। उन्होंने भाई को सान्त्वना देते हुए भविष्य में भी मिलते रहने को कहा॥ मुन्ना भाई निराश होकर लौट आए।
वर्ष १९७७ से १९८० तक मुन्ना भाई इंदिरा गांधी के विपक्ष में रहते प्रत्येक कार्यक्रमों में साये की तरह साथ रहे थे लेकिन सत्ता प्राप्त होते ही संजय गांधी के व्यवहार से अपनी इस दशा को देख मर्माहत हुए लेकिन इंदिरा जी और कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा। कांग्रेस के प्रति उनकी अनुपम निष्ठा का यह एक उदाहरण था।
लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।
क्रमशः
पहला भाग…
अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 1) : उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का अध्यक्ष वही बनता था जो छात्र नेता हड़ताल के बाद गिरफ्तार होकर जेल जाता था!


