विकास मिश्रा-
इस बार शुक्रवार का दिन जैसे बुरी खबरों का जखीरा लेकर आया था। हमारे पुराने सहकर्मी और मित्र राजशेखर की मृत्यु की सूचना आई। उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने के लिए निकले ही थे कि मेरठ से जीजाजी का फोन आ गया कि राजेश अवस्थी जी की मौत हो गई। उन्होंने खुदकुशी कर ली। भीतर तक हिला गई यह खबर। आंखों के आगे यादों की जैसे एक फिल्म ही चल पड़ी।
अगस्त 2001 में मैंने दैनिक जागरण, मेरठ में ज्वाइन किया था। जिस सिटी डेस्क पर था, उसी का हिस्सा थे अवस्थी जी। बेहद सज्जन, सहज और सरल। जानकारी उनकी अच्छी खासी थी। हिंदी की वर्तनी का अच्छा ज्ञान था। बहुत ज्यादा बोलते नहीं थे। हां, अक्सर एक बात जरूर होती थी, अवस्थी जी को कंप्यूटर के सामने काम करते-करते अचानक थोड़ी सी झपकी आ जाती थी। दो-तीन मिनट के लिए वे बैठे-बैठे सो जाते थे। वहां अवनीश त्यागी जी (वर्तमान में बीजेपी के प्रवक्ता) भी थे। जब अवस्थी जी इस अवस्था में होते थे तो अवनीश जी उनके कान के पास धीरे से बोलते थे-जागो। अवनीश जी जब बुलंदशहर चले गए तो कुछ और लोग भी धीरे से उनके कान में बोल देते थे-जागो।
अवस्थी जी बहुत ही कर्मठ पत्रकार थे। दफ्तर की राजनीति से कोसों दूर। सबके प्रिय थे। अजातशत्रु थे। सभी उनका सम्मान करते थे। एक दिन अवस्थी जी के साथ गड़बड़ हो गई। सबकी तनख्वाह बैंक में आई थी। अवस्थी जी ने दस हजार रुपये बैंक से निकाले, छोटे से बैग में रखकर साइकिल में टांग दिया। इधर-उधर नजर फेरे, इसी बीच कोई उचक्का उनकी साइकिल ले उड़ा। साइकिल तो गई ही, महीने की तनख्वाह भी चली गई।
अवस्थी जी शाम को दफ्तर आए तो बेहद उदास थे। मुझे जब इस बात का पता चला तो मैंने एक कागज लिया, पहले अपना नाम लिखा, आगे कुछ रकम लिखी। सभी साथियों में घुमाया। सबसे कहा कि हम सबकी तनख्वाह आई है, हमारे घरों में आज उत्सव होगा, लेकिन अगर अवस्थी जी उदास रहेंगे तो हम सबकी खुशी अधूरी रहेगी। अवस्थी जी हैरान थे तो वहीं दबे सुर में मना भी कर रहे थे।
खैर, पर्चा बढ़ गया, हाथ बढ़ गए। सबको तनख्वाह मिली थी, सबकी जेब गरम थी। सबने अपनी श्रद्धा और कमाई के हिसाब से अंशदान किया। अवस्थी जी को जब हमने इकट्ठा की गई रकम सौंपी तो वो उनकी तनख्वाह और साइकिल की कीमत से सौ-दो सौ रुपये ज्यादा ही थी। उस वक्त अवस्थी जी के चेहरे पर जो खुशी झलक रही थी, वह देखने लायक थी।
मेरठ दैनिक जागरण में छंटनी हुई और उस लिस्ट में एक नाम अवस्थी जी का भी था। वहां से हटने के बाद उन्होंने कई जगह काम किया, लेकिन कहीं मन लायक काम नहीं मिला तो कहीं जीवन यापन भर की तनख्वाह नहीं मिली। उनमें अद्भूत जीवट था। हार मानने वालों में से नहीं थे। एक वेबसाइट में काम कर रहे थे। साथ ही एक प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी के एजेंट के रूप में भी काम करने लगे। उनका मिजाज इस काम लायक नहीं था, ठेठ पत्रकार रहे तो किसी से बीमा के लिए बहुत मनुहार नहीं कर सकते थे, लिहाजा यह काम उनका चला नहीं। इसी सिलसिले में वे मुझसे मिलने नोएडा में मेरे दफ्तर भी आये थे, तब मैं न्यूज नेशन में काम कर रहा था।
अवस्थी जी की उम्र 66 साल हो गई थी। वे चूके नहीं थे, लेकिन जमाने ने उन्हें चुका हुआ मान लिया था। काम की तलाश में थे, लेकिन 66 की उम्र में नौकरी के अवसरों का न के बराबर होना भी एक सच्चाई है। वे परिवार के लिए बहुत कुछ संचय नहीं कर पाए, यह बात उन्हें कचोटती थी। इसी को लेकर वे अवसाद में भी चले गए और सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में भी उन्होंने लिखा कि इस मौत के जिम्मेदार वे स्वयं हैं। सुसाइड नोट में इसका भी जिक्र किया कि परिवार के लिए कुछ कर नहीं पाए।


अवस्थी जी की मौत की खबर अखबारों में भी छपी, लेकिन अमर उजाला अखबार की खबर और उसकी हेडिंग देखकर मन कचोट उठा। हेडिंग थी- माधवपुरम सेक्टर एक में बुजुर्ग का शव मिला। जिस व्यक्ति ने अपने सम्मान के लिए पत्रकारिता का पेशा चुना, उसी की मौत की खबर की हेडलाइन इतनी असम्मानजनक लगी। हेडिंग में वरिष्ठ पत्रकार लिखते तो कम से कम सम्मानजनक तो होता।
अवस्थी जी का इस तरह से जाना एक चेतावनी है उन पत्रकारों के लिए जिनकी उम्र 50 से 60 साल के बीच है। मुहावरे तो पहलवानों के बुढ़ापे के बारे में बने हैं, लेकिन पत्रकारों के बुढ़ापे पर न तो कोई मुहावरा बना है और न ही कहानी। अवस्थी जी जैसे ईमानदार और सज्जन पत्रकार को आखिर 4 दशक की पत्रकारिता का सिला मिला क्या..? एक बदनाम सी मौत। अवस्थी जी के पास धनबल तो था नहीं, लेकिन उनके शुभेच्छुओं की कमी नहीं है। परिवार शोकग्रस्त है, संकट में है तो मदद के लिए हाथ बढ़ने चाहिए।
भड़ास वाले यशवंत सिंह ने कुछ पहल की है। वे जल्द ही इसकी कार्ययोजना साझा करेंगे। अगर ऐसे में कुछ और हाथ बढ़ें और परिवार की मदद कर सकें तो पत्रकारों की तरफ से एक ईमानदार पत्रकार के लिए यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मूल खबर…
दैनिक जागरण मेरठ में कार्यरत रहे पत्रकार राजेश अवस्थी ने की आत्महत्या, छँटनी के बाद आर्थिक तंगी झेल रहे थे!


