यह ‘खबर’ प्रचार की तरह नहीं छपी और प्रचारित भी नहीं की गई
आज द हिन्दू में तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “सीबीआई ने 80 स्थानों की तलाशी ली, डिजिटल अरेस्ट मामले में दो को पकड़ा”। खबर का हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है, केंद्रीय एजेंसी ने 15 राज्यों और दिल्ली के 200 से ज्यादा मामलों में जुड़े स्थानों की तलाशी ली। उल्लेखनीय है कि अक्टूबर-दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े घोटालों पर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने कहा था कि फर्जी अदालती आदेशों का इस्तेमाल करना न्यायपालिका पर जनता के भरोसे पर हमला है। सुप्रीम कोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट घोटालों से निपटने का काम सौंपा था और अन्य साइबर अपराधों के मुकाबले इसे प्राथमिकता देने को कहा था। कोर्ट ने सीबीआई को साइबर अपराधियों की मदद करने वाले और संदिग्ध बैंक खाते खोलने वाले भ्रष्ट बैंक अधिकारियों की जांच करने के लिए भी खुली छूट और व्यापक निर्देश दिए थे। इसके बाद दिल्ली में एक बैंक अधिकारी की गिरफ्तारी की खबर थी जो पता नहीं पहले क्यों नहीं हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने पर ही सीबीआई की कार्रवाई शुरू हुई जबकि राजनीतिक मामलों में मुख्यमंत्रियों तक की गिरफ्तारी में देर नहीं हुई है। ऐसे में मुझे इस कार्रवाई में देरी संदिग्ध लगती है। खास कर इसलिए कि कल नवोदय टाइम्स में एक खबर थी जो वैसे नहीं छपा थी जैसे प्रधानमंत्री की पहल आम तौर पर छपती रही है या खुद प्रधानमंत्री अपने काम का जैसे प्रचार करते हैं। खबरों के अनुसार 24 जून 2026 को आयोजित प्रगति (PRAGATI) की बैठक में प्रधानमंत्री ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर अपराध से जुड़ी जन शिकायतों की समीक्षा की और पुलिस व बैंकों को सख्त कदम उठाने के साथ-साथ ‘ई-ज़ीरो एफआईआर’ लागू करने के निर्देश दिए थे।
तथ्य यह है कि दिखावा और प्रचार के बावजूद शिकायत दर्ज करवाना मुश्किल होता है और अपराधी के पकड़े जाने का मामला नहीं के बराबर रहा है। अब पता चल रहा है कि प्रगति भारत सरकार का एक बेहद शक्तिशाली और आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की बड़ी परियोजनाओं में होने वाली देरी को खत्म करना, जनता की शिकायतों का निवारण करना और शासन में पारदर्शिता लाना है। इसका नाम Pro-Active Governance And Timely Implementation यानी सक्रिय शासन और समय पर कार्यान्वयन है। लेकिन इसने कार्रवाई बहुत देर से शुरू की। प्रधानमंत्री जो अब बोल रहे हैं वह पहले बोले होते तो शायद हजारों लोग लुटने से बच जाते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी शुरुआत तो मार्च 2015 में की लेकिन इसका कोई फायदा मिला या नहीं और इसके बावजूद डिजिटल अरेस्ट क्यों होते रहे, लाख टके का सवाल है। द हिन्दू में आज एक और महत्वपूर्ण खबर है, विपक्ष ने नए एफसीआरए नियमों को वापस लेने की मांग की, कहा नागरिक समाज पर प्रतिकूल असर हो रहा है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री एफसीआरए को सख्त बनाकर तमाम लोगों का जीवन मुश्किल कर रहे हैं। दूसरी तरफ अभी भी इमरजेंसी को संविधान पर हमला बता रहे हैं और काला समय कह रहे हैं। यह भी सही है कि दूसरे लोग भाजपा शासन को उससे बुरा और अघोषित इमरजेंसी कहते रहे हैं। खास बात यह है कि खबरें नहीं छपती हैं जबकि उनके कहे को दि एशियन एज ने लीड बना दिया है। आज कश्मीर में सेना और पुलिस के बीच टकराव की भी एक गंभीर और चिन्ताजनक खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड और सेकेंड लीड – दोनों सरकारी खबरें है। लीड के अनुसार, सरकार ने होटलों- रेस्त्रां के लिए युद्ध से पहले का एलपीजी आपूर्ति का स्तर बहाल कर दिया है। कल हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर थी कि कच्चे तेल की कीमत युद्ध से पहले के स्तर पर पहुंच गई है। आज कमर्शियल एलपीजी की खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है लेकिन पेट्रोल की कीमत पर कुछ नहीं है, बताया नहीं गया है। जब कच्चे तेल की कीमत कम हो गई युद्ध के दौरान बढ़ाई गई तेल की कीमत कम की जानी चाहिए पर आज ऐसी कोई खबर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी नहीं।
चढ़ावा विवाद और जमीन की खरीद-बिक्री से कमाई
राम मंदिर जमीन खरीद या चंदा विवाद (जिसकी चर्चा मुख्य रूप से साल 2021 के मध्य में हुई थी) को लेकर ट्रस्ट और उसके समर्थकों द्वारा लगातार किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से इनकार किया गया है। इस मामले में ट्रस्टियों और जिम्मेदार पदाधिकारियों ने विभिन्न मौकों पर बयान जारी कर “सब कुछ पारदर्शी” होने का दावा किया था। चंपत राय (महासचिव, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट) ने जून 2021 में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और सपा नेता पवन पांडेय द्वारा जमीन खरीद में भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के तुरंत बाद दावा किया था कि चंपत राय ने एक लिखित आधिकारिक बयान जारी कर सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के नाम पर खरीदी गई भूमि पूरी तरह पारदर्शी तरीके से और बाजार दर से कम कीमत पर ली गई है। ट्रस्ट का आधिकारिक स्पष्टीकरण प्रेस नोट के रूप में आया था। यह सोशल मीडिया और मीडिया चैनलों पर “2 करोड़ की जमीन 18.5 करोड़ में खरीदने” के आरोपों पर प्रतिक्रिया थी। ट्रस्ट ने सिलसिलेवार तरीके से जमीन के पुराने एग्रीमेंट का हवाला देते हुए दावा किया कि रेलवे स्टेशन के पास की प्राइम लोकेशन की जमीन को मौजूदा बाजार भाव से बहुत सस्ते में खरीदा गया है। टैक्स और एग्रीमेंट की कानूनी प्रक्रियाओं के कारण कीमतों में अंतर दिख रहा है, लेकिन कोई हेरफेर या गड़बड़ी नहीं हुई है। स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज (कोषाध्यक्ष, राम मंदिर ट्रस्ट) ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा था, उन्होंने खुद और ट्रस्ट के सीए (सीए) ने सभी दस्तावेजों की जांच की है। उन्होंने दावा किया, “जमीन खरीद में एक भी पैसे का घोटाला नहीं हुआ है। आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और मंदिर निर्माण के कार्य को बदनाम करने की साजिश हैं। सभी लेनदेन बैंक-टू-बैंक (डिजिटल) हुए हैं, इसलिए चोरी की कोई गुंजाइश ही नहीं है।” उल्लेखनीय है कि भाजपा सरकार बैंकों के जरिए डिजिटल लेन देन या कैमरे के आगे की गई गड़बड़ी को गलत नहीं मानती है और अनिल मसीहों के भरोसे बहुत कुछ हुआ है। सरकार ने उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की है और अनिल मसीहों के संरक्षण की व्यवस्था तो है ही।
विपक्ष ने जांच की मांग की और कोर्ट जाने की चेतावनी दी तो सरकारी हलकों और ट्रस्ट के करीबी सूत्रों की ओर से कहा गया कि जमीन की दरें जिलाधिकारी के सर्किल रेट के मूल्यांकन के अनुसार ही तय की गई हैं। यह भी तर्क दिया गया कि जो लोग आरोप लगा रहे हैं, वे केवल राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। यह भी वैसा ही मामला है। आम आदमी की कोई जमीन नेता या दलाल किस्म का आदमी खरीद ले। फिर सर्किल रेट बढ़ जाए और तब सरकार को (या मंदिर ट्रस्ट को बढ़ी हुई कीमत पर बेच दे। बढ़ी हुई कीमत सरकार को नहीं बेचने वाले को मिलेगी और दलाल नहीं होता तो यह कीमत उसे मिलती जिसकी जमीन थी या जिसने दलाल को पुराने सर्किल रेट पर जमीन बेची। यह सब बैंकों के जरिए हो सकता है और नियमों के खिलाफ नहीं है। पूंजी बाजार में इसे इनसाइडर ट्रेडिंग कहा जाता है। मतलब जिसे पता होता है कि शेयर की कीमत बढ़ या घट सकती है वह ऐसे सौदे नहीं कर सकता है या करता है तो कार्रवाई होती है। भाजपा सरकार में यह भी मुद्दा नहीं रहा है और ऐसे भी उदाहरण हैं। इसलिए, विपक्ष और कुछ शिकायतकर्ताओं का आरोप रहा है कि जांच एजेंसियां और एफआईआर केवल छोटे मोहरों या बिचौलियों के इर्द-गिर्द घूमती रहीं, जबकि ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों को क्लीन चिट दे दी गई या उन्हें जांच के दायरे से बाहर रखा गया। दूसरी ओर, ट्रस्ट और सरकार का पक्ष हमेशा यही रहा है कि सभी सौदे कागजी तौर पर पूरी तरह वैध और पारदर्शी थे। आप समझ सकते हैं कि मामला क्या है औऱ क्यों है। (समाप्त)
पहला भाग पढ़िए : आज के अखबार : चढ़ावा चोरी मामले में FIR की खबर छापनी ही पड़ी, TOI में सिंगल कॉलम हिन्दू में अंदर
लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/chadhava-chori-mamle-mein-fir-kee-khabar/
लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।



