संजय कुमार सिंह
आज देशबन्धु की लीड है कि 23 राजनीतिक दलों ने चुनाव से जुड़े मुद्दों पर सीजेआई को पत्र लिखा है, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और विपक्षी दलों ने चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के आरोप लगाए हैं। लेकिन यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर नहीं है। कल ही खबर थी कि देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के ऋणदाता एचडीएफसी बैंक ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और पूर्व वित्त सचिव राजीव कुमार को अपना नया पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त किया है। बैंक के बोर्ड ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अंतिम मंजूरी के अधीन उन्हें तीन साल की अवधि के लिए यह कमान सौंपी है। कल मैंने बताया था कि दिल्ली में एसआईआर शुरू होने की खबर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने एसआईआर नहीं लिखा था। मुझे समझ में नहीं आया कि खबर क्या थी। देशबन्धु ने मूल खबर के साथ एक और खबर छापी है, मतदाता सूचियों से करीब छह करोड़ नाम हटाए गए। इससे जुड़े अनर्थ और उसमें सुप्रीम कोर्ट के योगदान की चर्चा अभी मैं नहीं कर रहा हूं लेकिन देख रहा हूं कि टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम की छोटी सी खबर है जो बताती है कि, कांग्रेस ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। इस खबर के होते हुए मैं नहीं कह सकता हूं कि टाइम्स ऑफ इंडिया विपक्ष की खबर नहीं दे रहा है। लेकिन मुझे यकीन है कि आप इस मामले को जानते होंगे और इसका कारण भी समझते होंगे। आज दैनिक भास्कर में एथनॉल मिलाने से संबंधित एक खबर है और यह सरकारी लूट पर सरकार की विचारधारा और प्रचार से संबंधित है। उसकी भी चर्चा करूंगा लेकिन पहले भ्रष्टाचार के आरोपी और व्यवस्था के संरक्षण में फल फूल रहे शिक्षा मंत्री को पद से हटाने की जरूरत और उसपर सरकार व मीडिया के रुख के बारे में। खासकर तब जब सोनम वांगचुक जैसी हस्ती को भूख हड़ताल करनी पड़ रही है तब रक्षा मंत्री के खिलाफ इस नोटिस के मायने हैं। इसका महत्व तो है ही। लेकिन तथ्य यह है कि मोदी सरकार के दो मंत्रियों का विरोध हो रहा है। सरकार के समर्थक और प्रचारक यह भी रिपोर्ट कर रहे हैं कि सोनम वांगचुक अनशन करते हुए पानी पी रहे हैं, छिपाकर फलों के रस पी रहे हैं। इस सरकार ने न सिर्फ शासन की परिभाषा बदली है, खबरों और पत्रकारिता को भी बदल दिया है। अभी वह मुद्दा नहीं है लेकिन जो खबरें छपी हैं उससे साफ है कि खबरों की परिभाषा बदल गई है। मुख्य धारा की मीडिया के लिए पत्रकारिता भी बदल गई है।
आइए, बताता हूं कैसे? अमर उजाला में आज पहले पन्ने से पहले का अधपन्ना है। इस अधपन्ने की लीड है, प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों के सचिवों के संग बैठक में निर्देश दिए कि लोगों का जीवन व कारोबार आसान बनाना सुनिश्चत करें। आप जानते हैं कि पिछले 12 वर्षों में आम लोगों का जीवन कितना आसान हुआ है और कैसे आसान हुआ है। इसमें द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक के पासपोर्ट नवीकरण की कहानी आपने सुनी ही होगी और यह भी जान चुके होंगे कि बैंक से मृत बहन के 19 हजार रुपए निकालने के लिए उड़ीशा के एक व्यक्ति को अपनी बहन का शव निकालना पड़ा और वह उसे लेकर बैंक पहुंचा तब सिस्टम की आंख खुली। इसके बावजूद सरकारी प्रचारक कह रहे हैं कि द टेलीग्राफ के संपादक के पासपोर्ट का नवीकरण नहीं होना बड़ी बात नहीं है और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया तब कहां था जब टेलीग्राफ ने स्मृति ईरानी के एक भाषण के लिए उन्हें आंटी नेशनल कहा था और आठ कॉलम की बैनर हेडलाइन लगाई थी। अगर आप भी इसे सरकार के समर्थन और विरोध के खाने में बांट कर देखते हैं तो मैं कह सकता हूं कि डबल इंजन वाले आरडब्ल्यूए के पंजीकरण का मामला इससे ज्यादा उलझा हुआ है क्योंकि यहां परेशान लोगों में शायद कोई संपादक नहीं है। स्थिति यह है कि आरडब्ल्यूए का पंजीकरण तो 700 रुपए में होता है और 16 साल से नवीकरण नहीं हुआ है कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बार नोटिस आया कि आरडब्ल्यूए के स्विमिंग पूल और जिम को भी पंजीकरण कराना होगा। शुल्क है 15,000 रुपए प्रत्येक। नवीकरण का इंतजार कर रहे एक आरडब्ल्यूए को अगर उसके जिम और पूल के पंजीकरण के लिए 30 हजार रुपए देने हों तो हंगामा होना ही था। हुआ, खबरें छपीं लेकिन कुछ नही हुआ। पूल 10,000 रुपए की रिश्वत पर चल रहे हैं। पता नहीं पैसे कहां जा रहे हैं और वसूली कौन करवा रहा है।
ऐसे में अमर उजाला की आज की खबर, प्रधानमंत्री की सीख हो या आदेश, बहुत देर से आई है। में भी लीड है। आज ही अमर उजाला की लीड है, (चढ़ावा चोरी के) आरोपियों ने करोड़ों की चोरी कबूली, बैंक खातों में हैसियत से ज्यादा लेन-देन। इससे अलग, सोशल मीडिया पर यह प्रचार चल रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने मंदिर बनाया, वही इसके लिए काम करती रही, उन्हीं की बदौलत चढ़ावा आया और उसकी चोरी हो गई तो वे क्यों परेशान हैं जो भाजपा के खिलाफ हैं। निश्चित रूप से यह विचारधारा का मामला है और मैं इसमें नहीं पड़ता। ऐसी खबरों में दिलचस्पी नहीं रहती है लेकिन जो चल रहा है उससे लग रहा है कि कुछ आम लोगों को बलि का बकरा बना दिया जाएगा या अभी उनके सिर पर ठीकरा फोड़ कर मामले को दबाने की कोशिश हो रही है। इस सिलसिले में हिन्दुस्तान टाइम्स की एक विशेष खबर उल्लेखनीय है। खबर के अनुसार, चढ़ावा चोरी मामले बनारस की एजेंसी ने गिरफ्तार आठ लोगों में से छह को काम पर रखवाया था। जाहिर है, नकदी और चढ़ावा संभालने का काम कर रहे लोग बनारस की एजेंसी से लेकर काम पर रखे गए थे। अब ये कितने बड़े या कैसे राम भक्त होंगे और इस काम के लिए कितने उपयुक्त थे मैं नहीं जानता। लेकिन यह जरूर जानता हूं कि चढ़ावे की चौकीदारी का काम इन्हें किन लोगों ने सौंपा होगा या किनकी जिम्मेदारी थी। जिनकी जिम्मेदारी थी उन्हें किन लोगों ने चुना था और क्यों चुना होगा, समझना मुश्किल नहीं है। बाकी बातें विचारधारा के प्रचार से स्पष्ट हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर (लीड) बताती है कि पुलिस ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा से विवरण के लिए संपर्क किया है और अन्य गिरफ्तारी हो सकती है। मुझे लगता है कि यह सब दिखावा है और वह भी ऐसा कि पूरे मामले में कोषाध्यक्ष का नाम कहीं है ही नहीं। हालांकि वह अलग मामला है। अभी खबरों से यह दिखाने की कोशिश चल रही है कि कार्रवाई हो रही है। भले वह ढीली और लचर है तथा वैसी तो नहीं ही है जैसी विपक्ष के नेताओं के खिलाफ माल गायब हुए बगैर होती रही है या विनोद राय के बताए 2जी घोटाले और कोयला घोटाले में हुई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह आस्था का मामला है और यह भी याद दिलाया जाता रहा है कि मामला दान की चोरी का नहीं चढ़ावे की चोरी का है। कुल मिलाकर, पूरे परिवार का पाखंड टुकड़ों में छप रहा है या छपा है। द हिन्दू में चढ़ावा विवाद पहले पन्ने पर नहीं है। राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार का नोटिस भी अंदर के पन्ने पर है। लेकिन मौसम की खबर लीड है और जुलाई में अगर बारिश 40 प्रतिशत कम हुई है तो सरकार को क्या करना है यह भी एक महत्वपूर्ण खबर हो सकती है। पर अब ऐसी खबरें नहीं होती हैं। नवोदय टाइम्स की खबर है, तपिश खत्म होगी, बारिश बस एक दो दिन में। द हिन्दू में पहले पन्ने पर सीजेआई को लिखी चिट्ठी का जिक्र है। शीर्षक के अनुसार यह पत्र चुनाव आयोग के पक्षपाती रुख पर है तथा द्रमुक और आम आदमी पार्टी ने भी इसपर दस्तखत किए हैं। यह खबर द टेलीग्राफ और दि एशियन एज में भी पहले पन्ने पर में भी पहले पन्ने पर है। आप देखिए कि आपके अखबार में है या नहीं और इससे आप समझ सकते हैं कि आपका अखबार किस विचारधारा का समर्थन कर रहा है। अगर आप जानते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन निष्पक्ष समझ रहे थे तो सतर्क हो जाने की जरूरत है। मैं बता देता हूं कि अमर उजाला ही नहीं, दैनिक भास्कर और नवोदय टाइम्स में भी यह खबर वैसी तो नहीं है जैसी होनी चाहिए थी।
आज एथेनॉल वाला मामला भी सीजेआई को लिखी गई चिट्ठी की ही तरह महत्वपूर्ण है। हालांकि, भास्कर एक्सप्लेनर का शीर्षक है, ई20 पेट्रोल का इस्तेमाल करने से गाड़ी की बीमा पॉलिसी पर असर नहीं पड़ता है। मुझे लगता है कि शब्दों का यह खेल विज्ञापनों में तो चल रहा था और वहां भी नहीं होना चाहिए पर अब खबरों में भी हो रहा है। इस शीर्षक का यह मतलब तो नहीं ही है कि ई20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ी खराब नहीं होगी। अगर गाड़ी खराब हो जाए और बीमा पैसा देता रहे तो क्या खराब होने दी जाए, बीमा पैसा देता रहेगा? अगर गाड़ी 15 साल में ही कंडम होती हो तो क्या होने देना चाहिए क्योंकि 15 साल बाद वैसे भी पंजीकरण रद्द हो जाता है और सरकार पुरानी गाड़ी नहीं चलाने देती है। पुरानी गाड़ी की चलने लायक स्थिति, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना, उसका असर, मकसद, लाभ-नुकसान, उपयोगकर्ता को, सरकार को, किसी और को या कभी-कभी प्रधानमंत्री के खिलाफ बोल देने वाले के परिवार या उसके मुखिया को होना – सब अलग मुद्दा है। इसके साथ की खबर में सरकार ने स्वीकार किया है कि प्रयोग चल रहा है। मतलब नफा नुकसान पता नहीं है। अगर पता है कि नुकसान नहीं होता है प्रयोग किसलिए चल रहा है और जब चल ही रहा है तो सवाल यह भी है कि जिस पर चल रहा है या जिसकी गाड़ियों का उपयोग किया जा रहा है उससे सहमति अनुमति ली गई है? अगर नहीं ली गई है और नुकसान हो गया तो उसकी भरपाई की जा सकेगी? क्या यह नुकसान या प्रयोग जरूरी है और जरूरी है तो सरकारी गाड़ियों पर क्यों नहीं, सीमित गाड़ियों पर क्यों नहीं और अगर इन सबकी जरूरत नहीं है तो लाभ किसे हो रहा है, कितना और कैसे? क्या लाभ पाने वालों में गाड़ी मालिक है? इन्हें क्या लाभ हो रहा है और कैसे? क्या यह लाभ जबरन देना जरूरी और उचित है। क्या किसी के पास लाभ नहीं लेने का विकल्प नहीं होना चाहिए। गाड़ी में लाखों रुपए लगाने वालों की मन की शांति के लिए सरकार क्या कर रही है और नहीं कर रही है तो क्यों? क्या इसका नुकसान देश को नहीं होगा और नहीं ही होगा तो अब प्रधानमंत्री लोगों का जीवन और कारोबार आसान बनाने के लिए क्यों चिन्तित हैं? सरकारी वकील हर बार जनता या भाजपा विरोधियों के खिलाफ क्यों होते हैं। जज के बच्चों की कमाई के मामले में भी? अगर यह सब सामान्य है तो आज ही इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, जेएसडब्ल्यू संयुक्त उपक्रम के इशारे पर सरकारी जांच को लेकर छोटी फर्में आतंक में। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार ने हर क्षेत्र में हर ओर, आतंक ही फैलाया है और यह उसके अपने लोगों के लिए या उनमें बिल्कुल नहीं है। शुरुआत नोटबंदी से तो हो ही गई थी और इसी कारण देश में न सिर्फ उद्योग धंधों का, विदेशी निवेश और रोजगार ही नहीं विदेशी चंदे से जीने-खाने वालों का भी बुरा हाल है। मौज सिर्फ सरकार समर्थकों और प्रचारकों की है। यह अलग बात है कि वे कम में ही खुश रहते हैं या चूड़ी किसी और की कसती है, खुश कोई और होता है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार कंपनी चाहती है कि चीन, दक्षिण कोरिया के आपू्र्तिकर्ताओं पर जुर्माना लगाया जाए। जाहिर है, सरकार लोगों का जीवन आसान करती रही है और यह नई बात नहीं है। लेकिन जिनका जीवन आसान करती है उनकी वजह से दूसरे परेशान होते हैं। जैसे फिल्मी सितारों के बच्चे अब नशा नहीं करते होंगे। उनका जीवन आसान हो गया होगा पर शाहरुख खान और उनके बेटे के साथ जो हुआ उसे सब भूल जाएं इतिहास तो बन चुका है और यह ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ के सम्मान को धोता रहेगा क्योंकि देश का भविष्य इस वर्तमान से तो खुश नहीं ही होगा।
आज जब पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर सरकार और सरकार समर्थक के कमाने की खबर को समान्य तौर पर पेश किया गया है तब अमर उजाला मे एक खबर है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। इस खबर के अनुसार ट्रम्प बोले – कच्चा तेल सस्ता हुआ, अब पेट्रोल कंपनियां तुरंत घटाएं कीमतें। पहले भी खबर छपी है कि पेट्रोल की कीमत खाड़ी युद्ध शुरू होने के समय के स्तर पर पहुंच गई है। ऐसे में कीमतें कम करने के लिए कहने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी। खुद कम कर दी जानी चाहिए थी। सिर्फ खबर जोरदार छपती तो भी कीमत कम करनी पड़ती। लेकिन वह सब नहीं हुआ तो ट्रम्प चच्चा का संदेश आया है। अखबारों ने इसकी खबर भी नहीं दी है लेकिन पॉ पॉ के इस संदेश का प्रचार कर रहे हैं कि जीवन आसान बनाने के लिए काम करें।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



