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‘द सूत्र’ के 5 वर्ष : बड़े मीडिया संस्थानों की नौकरी छोड़कर दो भाइयों की मेहनत और संघर्ष की दास्तान!

Two men pose for a photo in an office, one with his hand on the other’s shoulder; framed poster on the wall behind reads 'We are committed to build a great organization'.

हरीश दिवेकर-

आज का दिन मेरे लिए बेहद खास है। भावुक कर देने वाला है। आज हमारा द सूत्र 5 साल का हो गया।

सच कहूं तो पता ही नहीं चला कि मेरे और मेरे बड़े भाई आनंद पांडे जी के ड्रीम बेबी ने कब अपने जीवन के 5 साल पूरे कर लिए। भोपाल से नन्हे-नन्हे कदमों के साथ शुरू हुई यह यात्रा आज मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तक अपना परचम लहरा रही है। बहुत जल्द हम उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएंगे।

आज इस खास मौके पर मैं आप सबके साथ द सूत्र की इस गौरवशाली यात्रा के कुछ खट्टे-मीठे पल साझा करना चाहता हूं।

बात जनवरी 2020 की है। उस समय मैं पत्रिका में स्टेट ब्यूरो हेड था और आनंद पांडे जी दैनिक भास्कर में नेशनल हेड के रूप में दिल्ली में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। हम दोनों के मन में कुछ नया करने की बेचैनी थी। लेकिन नौकरी की जिम्मेदारियां और सुरक्षित जीवन की जंजीरें हमें हर बार दो कदम आगे बढ़ाकर फिर पीछे खींच लेती थीं।

इसी बीच फरवरी 2020 में मुझे जी न्यूज में एमपी-सीजी एग्जिक्यूटिव एडिटर का ऑफर मिला। मैं उलझन में था। तब पांडे जी ने कहा, प्रिंट में बहुत काम कर लिया, टीवी का भी अनुभव ले आओ। आगे डिजिटल मीडिया में काम आएगा। उनकी बात मानकर मैंने मार्च 2020 में जी न्यूज ज्वाइन कर लिया।

इधर पांडे जी ने भी दैनिक भास्कर को अलविदा कहकर इंडिया TV में रजत शर्मा जी के साथ नई जिम्मेदारी संभाल ली। लेकिन इन सबके बीच हमारा सपना कभी ठंडा नहीं पड़ा। फोन पर हमारी बातें लगातार उसी ड्रीम बेबी के इर्द-गिर्द घूमती रहती थीं।

एक दिन पांडे जी का फोन आया। बोले, बाबू, कुछ बड़ा करना है तो कड़ा निर्णय लेना होगा। मैं इस्तीफा दे रहा हूं, तुम भी दे दो। मैंने हमेशा की तरह तुरंत कहा, मैं तैयार हूं।

कुछ दिन बाद उनका फिर फोन आया। बोले, मैंने इस्तीफा दे दिया है, तुम कब दे रहे हो? मैंने कहा, अगले महीने दे दूंगा।

इसके बाद मैंने घर पर बात की। कहा कि मैं जी न्यूज छोड़ रहा हूं। मेरी बात सुनकर सब चौंक गए। सबका एक ही सवाल था, कुछ हो गया क्या अचानक ज़ी न्यूज़ छोड़ने का फ़ैसला कैसे ले लिया। मैंने कहा कि मैं और आनंद पांडे कुछ अपना नया करना चाहते हैं। परिवार ने समझाने का प्रयास किया कि इतनी अच्छी पोजिशन छोड़कर नया काम शुरू करना बहुत रिस्की है।

मैंने बस इतना कहा, फैसला कर लिया है। मेरी हां के बाद पांडे जी ने भी इस्तीफा दे दिया है। अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं है।

सच कहूं तो इस्तीफा लिखते समय धड़कनें तेज थीं। मन में कई सवाल उठ रहे थे। कहीं भावनाओं में बहकर गलत कदम तो नहीं उठा रहा? सब कुछ ठीक चल रहा है। नए वेंचर का क्या होगा? कब सेट होगा? घर का खर्च कैसे चलेगा?

लेकिन इन सभी सवालों से ऊपर था पांडे जी को दिया गया वचन। मेरे कहने पर उन्होंने इस्तीफा दिया था। फिर पीछे हटना मेरे स्वभाव में नहीं था। बस, मैंने भी इस्तीफा दे दिया।

नोटिस पीरियड पूरा होते ही हम अपने नए वेंचर को आकार देने में जुट गए। दिन-रात बैठकें होने लगीं। हम क्या करेंगे? पहले से मौजूद मीडिया संस्थानों की भीड़ में अपनी अलग जगह कैसे बनाएंगे? लोग हम पर भरोसा क्यों करेंगे? ऐसे तमाम सवालों पर लंबी चर्चा हुई।

धीरे-धीरे एक खाका तैयार हुआ। फंड का इंतजाम पहले ही कर लिया था, इसलिए उस चिंता से हम काफी हद तक मुक्त थे। इसके बाद अनुभवी साथी जुड़े। मजबूत टीम बनी। और फिर शुरू हुई द सूत्र की असली यात्रा।

हमारा लक्ष्य शुरुआत से साफ था। हमें सिर्फ नंबरों की दौड़ में नहीं भागना था। हमें ब्रांड बनना था। हमारी सबसे बड़ी चिंता यह नहीं थी कि व्यूज कितने आएंगे। हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि लोग हम पर कितना भरोसा करेंगे।

आज यह कहते हुए मन गर्व और कृतज्ञता से भर जाता है कि जनता ने हमें हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा प्यार और भरोसा दिया है। हमें इस बात का भी गर्व है कि द सूत्र की खबरों को न केवल प्रादेशिक मीडिया, बल्कि नेशनल मीडिया भी फॉलो करता है। इस बात से हमें संतोष मिलता है कि हम सही रास्ते पर हैं। इन 5 सालों में कई उतार-चढ़ाव भी आए। खबरों से आहत राजनेता भी मिले। अफसरों की नाराजगी भी झेली। पुलिस का सामना भी हुआ और अदालत में मुकदमे भी लगे। इसके अलावा डिजिटल मीडिया की बदलती दुनिया ने भी कई बार परीक्षा ली, लेकिन हनुमान जी की कृपा से हर मुश्किल आसान होती गई।

आज द सूत्र सिर्फ एक मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं है, यह भरोसे, संघर्ष, साहस और सपनों की कहानी है। यह उन सभी साथियों की मेहनत का परिणाम है, जिन्होंने इस यात्रा में अपना पसीना, समय और विश्वास लगाया है।

आज इस 5वीं वर्षगांठ पर मैं अपने सभी पाठकों, दर्शकों, शुभचिंतकों, टीम के साथियों और परिवार का दिल से आभार व्यक्त करता हूं।

बस हनुमान जी से यही प्रार्थना है कि द सूत्र की यह यात्रा आगे भी इसी तरह सच्चाई, साहस और विश्वास के साथ जारी रहे।

जय हनुमान!!
जय द सूत्र!!

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