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गाज़ीपुर GeM टेंडर घोटाला: बीएसए उपासना रानी वर्मा ने लिखा- वंशिका एचआर सर्विसेज पर दर्ज है मुकदमा, फिर किस आधार पर आईओ रोहित कुमार द्विवेदी ने लिखित में क्लीन चिट दे दी?


भ्रष्ट खेल : जांच पूरी नहीं, चार्जशीट दाखिल नहीं, फिर भी जांच अधिकारी रोहित द्विवेदी ने आरोपी फर्म को लाभ पहुँचाने के लिए क्लीन चिट मिलने की झूठी रिपोर्ट बनाकर लखनऊ रवाना कर दिया!

Handwritten official letter in Devanagari with a round seal and signatures at bottom, including stamps on the page.

इसी GeM टेंडर घोटाले की विवेचना में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों के बाद डीआईजी वैभव कृष्ण ने दो विवेचकों को निलंबित किया है। अब यह अपेक्षा की जा रही है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि अधूरी विवेचना के दौरान आरोपी फर्म के पक्ष में टिप्पणी करने का आधार क्या था और इसके पीछे किसकी भूमिका थी।

सुजीत सिंह प्रिंस-

गाज़ीपुर। GeM टेंडर घोटाले में एक और सरकारी दस्तावेज सामने आने के बाद पुलिस विवेचना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी उपासना रानी वर्मा द्वारा लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड को भेजे गए आधिकारिक पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वंशिका एचआर सर्विसेज ग्रुप लिमिटेड द्वारा प्रस्तुत फर्जी/कूटरचित ईपीएफओ संबंधी एफिडेविट के आधार पर कोतवाली गाज़ीपुर में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। साथ ही पत्र में यह भी उल्लेख है कि मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है।  

दूसरी ओर, इसी प्रकरण में तत्कालीन विवेचक उपनिरीक्षक रोहित कुमार द्विवेदी की रिपोर्ट में संबंधित फर्म के बारे में ऐसी टिप्पणी दर्ज की गई, जिससे उसे मुकदमे से बाहर करने या राहत देने की संस्तुति का संकेत मिलता है। जबकि उस समय तक न विवेचना पूरी हुई थी और न ही न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की गई थी।

Official government notice with date, seal, and Hindi text about educator appointment; signed by district education officer.

यही विरोधाभास अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है। जब शिकायतकर्ता विभाग की प्रमुख अधिकारी उपासना रानी वर्मा स्वयं लिखित रूप से कह रही थीं कि आरोपी फर्म के खिलाफ फर्जी ईपीएफओ संबंधी दस्तावेजों के आधार पर एफआईआर दर्ज है, तब विवेचक रोहित कुमार द्विवेदी किस आधार पर आरोपी फर्म को राहत देने वाली रिपोर्ट लिख रहे थे?

Handwritten official letter with stamp and signature, including dates and reference numbers.

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुकदमा दर्ज होने के बावजूद संबंधित फर्म अन्य स्थानों पर सरकारी कार्य प्राप्त करती रही। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जांच को प्रभावित कर आरोपी फर्म को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया?

इस पूरे घटनाक्रम ने अब तक की जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि किसी आरोपी फर्म के विरुद्ध दर्ज मुकदमा लंबित था और विवेचना भी पूरी नहीं हुई थी, तो उसके पक्ष में अनुकूल टिप्पणी करने का आधार क्या था? क्या विवेचक के पास ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य थे जो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं, या फिर जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया?

क्या आरोपी फर्म ने पैसे खिलाये? क्या सिर्फ आईओ ने पैसा खाया या माल ऊपर तक गया? बहुत सारे सवाल हैं जिसके जवाब बाकी हैं। अगर विवेचक का नार्को टेस्ट हो या पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जाँच हो तो सभी सवालों के जवाब मिल पाएंगे।

राहत की बात ये है कि इसी मामले में गड़बड़ी की शिकायत मिलने पर दो विवेचकों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए डीआईजी वैभव कृष्ण ने उन्हें निलंबित किया है। ऐसे में अब यह अपेक्षा की जा रही है कि पूरे GeM टेंडर घोटाले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि आरोपी फर्मों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किन परिस्थितियों में और किसके प्रभाव में किया गया। यूपी के सबसे ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में चर्चित वैभव कृष्ण की नज़र अगर अब इस प्रकरण पर पड़ चुकी है तो दूध का दूध और पानी का पानी होना तय है।

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