‘तहलका’ के तरुण तेजपाल की सजा पर केए शाजी की यह टिप्पणी पढ़ने लायक है। अखबारों, पत्रिकाओं और इस लिहाज से किसी भी संस्थानों के मुखिया की केन्द्रीय, ‘लार्जर देन लाइफ’ छवि अलोकतांत्रिक तो होती ही है, साथ ही मुखिया के संकट में फंसते ही संस्थाओं को समाप्त कर देती है।
मैं अपने ‘तहलका’ के दौर को याद करते हुए शाजी की बातों से सहमत हूं। इस टिप्पणी को पत्रकारिता के मित्रों को जरूर पढ़ना चाहिए।
-राकेश
केए शाजी-
तरुण तेजपाल की दोषसिद्धि: एक पत्रकार के लिए यह सिर्फ फैसला नहीं, वर्षों से चले आ रहे नैतिक द्वंद्व का अंत है
एक पत्रकार के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब किसी खबर को उसकी अपनी यात्रा से अलग कर पाना संभव नहीं होता। आज का दिन मेरे लिए ऐसा ही एक दिन है।
2013 के यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा तरुण तेजपाल को दोषी ठहराए जाने की खबर ने ऐसी कई यादें फिर से सामने ला दी हैं, जिनके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे इतने लंबे समय तक मेरे साथ रहेंगी।
यह फैसला मेरे लिए सिर्फ एक आपराधिक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं है। हममें से कई लोगों के लिए, जिन्होंने कभी उनके साथ काम किया था, यह वर्षों से चले आ रहे एक लंबे और पीड़ादायक नैतिक द्वंद्व का भी अंत है।
मैं तहलका एक विचार के कारण आया था मैंने ‘तहलका’ इसलिए ज्वाइन किया था क्योंकि मैं एक विचार में विश्वास करता था।
मैं वायनाड के एक छोटे से गांव से आया था। मलयालम माध्यम से पढ़ाई की थी और मेरे पास पत्रकारिता के जुनून के अलावा शायद कुछ भी नहीं था। मेरी पीढ़ी के कई युवा पत्रकारों की तरह मैं भी तहलका को उस न्यूजरूम के रूप में देखता था, जिसने भारतीय पत्रकारिता को बदल दिया था।
तहलका ने हमें दिखाया था कि पत्रकार सरकारों, कॉरपोरेट घरानों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और सत्ता के हर मजबूत केंद्र से सवाल कर सकते हैं। उसने खोजी पत्रकारिता को फिर से निडर बनाया था। और इस पूरी क्रांति के केंद्र में तरुण तेजपाल थे।
वह करिश्माई थे, बौद्धिक रूप से बेहद तेज थे और लोगों को अपनी बात से प्रभावित करने की असाधारण क्षमता रखते थे। उनमें यह पहचानने की अद्भुत क्षमता थी कि कौन-सी कहानी बाकी लोग नजरअंदाज कर रहे हैं और कौन-सा पत्रकार उस कहानी को सामने ला सकता है।
उन्होंने युवा पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से सोचने, स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने और असहज करने वाली सच्चाइयों का पीछा करने के लिए प्रेरित किया। उनके साथ काम करना किसी पत्रकारिता स्कूल से मिलने वाली शिक्षा से कम नहीं था।
हममें से कई लोग उनके कारण बेहतर रिपोर्टर बने। उन्होंने हमें ज्यादा सोचने, गहराई से पढ़ने और नैतिक विश्वास के साथ लिखने के लिए मजबूर किया।
ये यादें सच हैं। और जो कुछ बाद में हुआ, उसके कारण मैं इन यादों को मिटा नहीं सकता। लेकिन एक दूसरी सच्चाई भी उतनी ही वास्तविक है
2013 में लगे आरोपों ने सिर्फ एक चर्चित संपादक पर गंभीर अपराध का आरोप नहीं लगाया था। इन आरोपों के केंद्र में वह व्यक्ति था, जिसने अपना सार्वजनिक जीवन दूसरों से जवाबदेही मांगने में लगाया था। इस विरोधाभास को नजरअंदाज करना असंभव था।
जिस तरुण तेजपाल को मैंने सराहा था, उन्होंने न्याय, मानवाधिकार, लैंगिक समानता और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ बेहद प्रभावशाली तरीके से लिखा था।
तहलका ने शक्तिशाली राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों, कॉरपोरेट नेताओं और धार्मिक हस्तियों को कटघरे में खड़ा किया था।
हम मानते थे कि कोई भी व्यक्ति सवालों और जांच से ऊपर नहीं है। हम मानते थे कि सत्ता को कठिन सवालों के जवाब देने ही होंगे। और फिर अचानक वही सवाल हमारे अपने दरवाजे पर आ खड़े हुए।
यह सिर्फ सहमति का सवाल नहीं था… आरोपों का सबसे परेशान करने वाला पहलू उनके पीछे मौजूद भरोसे का टूटना था।
यह कोई अनजान व्यक्ति के साथ हुई घटना नहीं थी। अदालत के निष्कर्षों के मुताबिक, इसमें एक युवा महिला सहकर्मी शामिल थीं, जो भारत के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक के अधिकार क्षेत्र में काम कर रही थीं।
यह सिर्फ सहमति का सवाल नहीं था। यह भरोसे, मार्गदर्शन, पेशेवर जिम्मेदारी और उस जिम्मेदारी का सवाल था जो हर संपादक पर अपने से कम उम्र और अनुभव वाले सहयोगियों के प्रति होती है।
यह अपने सबसे निजी और परेशान करने वाले रूप में शक्ति का दुरुपयोग था। जिस संस्था ने दूसरों से सच सुनने को कहा, उसे अपने न्यूजरूम में भी सुनना था
तहलका ने देश से कहा था कि पीड़ितों की आवाज सुनी जानी चाहिए। लेकिन जब वही आवाज उसके अपने न्यूजरूम से आई, तो संस्था खुद असमंजस में दिखाई दी। जिस पत्रिका ने पाखंड को उजागर करके अपनी विश्वसनीयता बनाई थी, उसे अब अपने ही भीतर मौजूद पाखंड का सामना करना पड़ा।
जिस संपादक ने हमें सिखाया था कि कोई भी पद इतना शक्तिशाली नहीं होता कि उसकी जांच न हो सके, वही अब उस शक्ति के दुरुपयोग के मामले में दोषी ठहराया गया है। हममें से जिन लोगों ने वहां काम किया था, उनके लिए यह पीड़ा सिर्फ पेशेवर नहीं थी।
यह बेहद व्यक्तिगत थी। क्या मुझे तहलका में बिताए वर्षों का अफसोस है? नहीं।
मुझे वहां की गई पत्रकारिता पर आज भी गर्व है। सैकड़ों रिपोर्टर्स, एडिटर्स, फोटोग्राफर्स, रिसर्चर्स, डिजाइनर्स और दूसरे कर्मचारियों ने मिलकर उस संस्था को बनाया था।
उन्होंने संघर्ष वाले इलाकों में यात्रा की, भ्रष्टाचार को उजागर किया, देश के अनदेखे गांवों से रिपोर्टिंग की और देश के सबसे शक्तिशाली हितों को चुनौती दी। वह काम उनका है।
एक व्यक्ति की भयावह विफलता के कारण उस पत्रकारिता को मिटाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन इस त्रासदी से हमें सही सबक सीखना होगा
कोई भी संपादक, चाहे वह कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, संस्था से बड़ा नहीं होना चाहिए। किसी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए। न्याय की बात करने वाले किसी व्यक्ति को उन मानकों से छूट नहीं मिल सकती, जिन्हें वह दूसरों पर लागू करने की मांग करता है।
पत्रकारिता की विश्वसनीयता सिर्फ शानदार खोजी रिपोर्टों से नहीं बनती। वह इस बात से भी बनती है कि पत्रकार अपने जीवन में कितनी ईमानदारी से उन मूल्यों को जीते हैं और अपने साथ काम करने वाले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
पत्रकारिता का सबसे बड़ा खतरा सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, हीरो-वर्शिप है हम अक्सर बुद्धिमत्ता को चरित्र समझ लेते हैं।
प्रभावशाली भाषा को ईमानदारी समझ लेते हैं। सार्वजनिक जीवन में साहस को निजी जीवन की शालीनता समझ लेते हैं। लेकिन ये एक चीज नहीं हैं। ये कभी एक चीज नहीं थीं।
आज का फैसला सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि जिन सिद्धांतों का हम अपनी खबरों में इस्तेमाल करते हैं, वे हमारे अपने न्यूजरूम में भी लागू होने चाहिए।
न्याय चुनिंदा नहीं हो सकता। नारीवाद सिर्फ दिखावे की चीज नहीं हो सकता। जवाबदेही संपादक के केबिन के दरवाजे पर खत्म नहीं हो सकती। मैंने तहलका से पत्रकारिता सीखी, लेकिन उसके पतन से उससे भी कठिन सबक
जिस न्यूजरूम में मैंने पत्रकारिता के कुछ बेहतरीन सबक सीखे, उसी के पतन ने मुझे एक सबसे कठिन सबक भी दिया— सच्चाई पर खड़ी संस्थाएं भी तब बिखर सकती हैं, जब वे खुद उन मूल्यों पर अमल करना बंद कर दें, जिनका वे दुनिया के सामने प्रचार करती हैं।
मैं तरुण तेजपाल को उस संपादक के रूप में याद करता हूं, जिसने पूरी एक पीढ़ी को सत्ता से सवाल करना सिखाया।
मैं उन्हें उस व्यक्ति के रूप में भी याद करता हूं, जिसने एक युवा सहकर्मी के भरोसे को तोड़ा, उन मूल्यों को धोखा दिया जिनकी वह वकालत करते थे और उन लोगों को भी निराश किया, जो मानते थे कि पत्रकारिता को उस समाज से बेहतर होना चाहिए, जिसे वह बदलना चाहती है।
इतिहास इन दोनों चेहरों को याद रखेगा।
उसे ऐसा करना भी चाहिए।
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