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सुख-दुख

अलविदा रामदुलार… कुछ खबरें ऐसी होती हैं जिन्हें लिखना एक पत्रकार के लिए भी आसान नहीं होता!

विजय विनीत-

रामदुलार, आपकी बेबाक कलम अब भी मेरे सामने है…!

कुछ खबरें ऐसी होती हैं जिन्हें लिखना एक पत्रकार के लिए भी आसान नहीं होता। कुछ खबरों के सामने शब्द जैसे ठहर जाते हैं, भावनाएं उमड़ती रहती हैं और मन बार-बार उस सच को स्वीकार करने से इनकार करता है, जिसे आंखें पढ़ चुकी होती हैं। रामदुलार यादव के निधन की खबर मेरे लिए ऐसी ही खबर है। यह सिर्फ एक पत्रकार के चले जाने की सूचना नहीं है, बल्कि उस साथी के बिछड़ जाने का गहरा दुख है, जिसके साथ मैंने लंबे समय तक काम किया, जिसकी पत्रकारिता को करीब से देखा और जिसकी बेबाक कलम को मैंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाते हुए महसूस किया। आज रामदुलार हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बेबाक कलम अब भी मेरे सामने है। उनकी वही साफगोई, वही सवाल करने की आदत, वही खबर के भीतर छिपे सच को तलाशने की बेचैनी और वही आम आदमी के पक्ष में खड़े होने का साहस बार-बार याद आ रहा है।

Man in a pale yellow shirt speaking into a handheld microphone at an outdoor event.
दिवंगत पत्रकार रामदुलार जी

जब मैं जनसंदेश टाइम्स का संपादक था, उसी दौर में रामदुलार ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। मैंने उन्हें पत्रकारिता के फील्ड में उतारा था। उस समय शायद यह अंदाजा नहीं था कि पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश करने वाला यह युवक आगे चलकर अपनी एक अलग पहचान बनाएगा। उनमें शुरुआत से ही कुछ ऐसा था, जो उन्हें दूसरों से अलग करता था। उनके भीतर सवाल थे, समाज को देखने की एक अपनी दृष्टि थी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जो बात उन्हें गलत लगती थी, उसके खिलाफ बोलने से वह पीछे नहीं हटते थे।

पत्रकारिता की तकनीक सीखी जा सकती है, खबर लिखने का तरीका सीखा जा सकता है, लेकिन बेबाकी किसी किताब से नहीं सीखी जा सकती। वह भीतर से आती है और रामदुलार के भीतर यह बेबाकी पहले से मौजूद थी। पत्रकारिता ने उसे केवल शब्द दिए और धीरे-धीरे वही बेबाकी उनकी पहचान बन गई।

मेरे अधीन काम करते हुए रामदुलार ने बहुत कुछ सीखा, लेकिन सच यह भी है कि उन्होंने अपनी मेहनत और अपनी दृष्टि से पत्रकारिता को अपने ढंग से जिया। वह केवल निर्देशों का पालन करने वाले पत्रकार नहीं थे। खबर को लेकर उनकी अपनी समझ थी, अपनी राय थी और अपनी असहमति भी थी। किसी खबर को लेकर चर्चा होती तो वह अपनी बात पूरी स्पष्टता के साथ रखते थे। कई बार बहस होती थी, कई बार उनकी बात से असहमति भी होती थी, लेकिन आज उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि उनकी यही बेबाकी उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने पत्रकारिता को सिर्फ मिशन की तरह नहीं लिया। उनके लिए खबर का मतलब महज किसी घटना का विवरण नहीं था। खबर के पीछे खड़ा आदमी उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण था। गरीब की परेशानी, किसान की चिंता, मजदूर की मजबूरी और ग्रामीण समाज की उपेक्षा उन्हें भीतर तक प्रभावित करती थी। वह चाहते थे कि जिन लोगों की आवाज सत्ता और व्यवस्था के शोर में दब जाती है, उनकी आवाज अखबार के जरिए सामने आए।

रामदुलार की पत्रकारिता में गांव की मिट्टी की गंध महसूस होती थी। उन्होंने गांव को बाहर से नहीं देखा था, गांव को जिया था। शायद इसीलिए किसान उनके लिए कोई आंकड़ा नहीं था, बल्कि एक चेहरा था, एक परिवार था, जिसकी अपनी उम्मीदें और परेशानियां थीं। किसी गरीब की समस्या उनके लिए सिर्फ एक छोटी खबर नहीं होती थी। वह उसके पीछे की पूरी कहानी तलाशने की कोशिश करते थे। उनकी रिपोर्टिंग में आम आदमी का दर्द दिखाई देता था और यही उनकी पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता थी।

रामदुलार अच्छे पत्रकार थे, लेकिन केवल पत्रकार होना उनकी पूरी पहचान नहीं थी। वह एक अच्छे जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट भी थे। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन से उनका जुड़ाव इसी व्यापक सोच का हिस्सा था। वह जानते थे कि गांव और कस्बों में काम करने वाला पत्रकार किन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभाता है। संसाधन सीमित होते हैं, सुविधाएं कम होती हैं, लेकिन जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी होती है। ग्रामीण पत्रकारों के सम्मान, अधिकार और उनकी समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता बताती थी कि वह पत्रकारिता को सिर्फ अपने रोजगार तक सीमित नहीं मानते थे। उनके लिए पत्रकारिता समाज के प्रति एक जिम्मेदारी थी और ग्रामीण पत्रकारिता उस जिम्मेदारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा।

रामदुलार का अपना जीवन भी संघर्षों से निकला था। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया था। जिंदगी ने उन्हें बहुत कम उम्र में अभाव और जिम्मेदारियों से परिचित करा दिया था। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी राह खुद बनाई। पत्रकारिता के साथ खेती से भी जुड़े रहे। अमरूद और गुलाब की खेती करते रहे। मिट्टी से उनका रिश्ता बना रहा और शायद इसी मिट्टी से जुड़े रहने ने उनकी पत्रकारिता को भी जमीन से जोड़े रखा। वह लोगों के बीच सहज थे, मिलनसार थे, मृदुभाषी थे और बातचीत में एक आत्मीयता थी। यही कारण था कि लोग उन्हें सिर्फ पत्रकार के रूप में नहीं, अपने बीच के आदमी के रूप में देखते थे।

नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। महज 45 वर्ष की उम्र में रामदुलार का चले जाना भीतर तक झकझोर देने वाला है। यह जाने की उम्र नहीं थी। यह तो जीवन को और विस्तार देने की उम्र थी। परिवार के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी था। पत्नी के साथ जीवन की लंबी यात्रा बाकी थी। बेटे और बेटी के सिर पर पिता का हाथ अभी कई वर्षों तक रहना था। पत्रकारिता में अभी बहुत कुछ लिखना बाकी था। गांवों के बहुत से सवाल उठाने बाकी थे। ग्रामीण पत्रकारों के लिए बहुत कुछ करना बाकी था। जिंदगी ने उनकी कहानी को अचानक वहीं रोक दिया, जहां शायद अभी कई अध्याय लिखे जाने बाकी थे।

उनके जाने की खबर सुनकर सबसे पहले मन ने यही कहा कि यह कैसे हो सकता है। जिस व्यक्ति की आवाज इतने वर्षों तक खबरों के बीच सुनाई देती रही, जो किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने के लिए हमेशा तैयार रहता था, जो किसी ग्रामीण समस्या को लेकर बेचैन हो जाता था, वह अचानक कैसे खामोश हो सकता है। लेकिन मृत्यु का सच कितना कठोर होता है कि वह किसी तर्क को स्वीकार नहीं करता। वह अपने साथ आदमी को ले जाती है और पीछे छोड़ जाती है उसकी आवाज, उसकी यादें और उसके लिखे हुए शब्द।

रामदुलार की अंतिम यात्रा का दृश्य तो इस पूरे दुख को और गहरा कर गया। जिस अखबार को उन्होंने अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्षों में ओढ़ा-बिछाया, जिस अखबार के लिए उन्होंने रात-दिन मेहनत की, जिस अखबार के पन्नों पर उन्होंने गरीबों की पीड़ा, किसानों के सवाल और ग्रामीण समाज की समस्याएं लिखीं, उसी अखबार में लिपटकर वह अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़े। इससे ज्यादा मार्मिक संयोग किसी पत्रकार के जीवन में और क्या हो सकता है। जिस कागज पर उनकी कलम दौड़ती थी, आखिर वही कागज उनके पार्थिव शरीर की आखिरी ओट बन गया। जिस अखबार को उन्होंने अपने श्रम और सरोकारों से सींचा, वही अखबार अंत में उन्हें अपने भीतर समेटकर अंतिम विदाई का साथी बना।

मेरे लिए यह दृश्य इसलिए और अधिक पीड़ादायक था, क्योंकि रामदुलार की पत्रकारिता की शुरुआत मैंने अपनी आंखों के सामने देखी थी। कभी मैंने उन्हें पत्रकारिता के फील्ड में उतारा था और आज उसी पत्रकार के लिए श्रद्धांजलि लिखनी पड़ रही है। कभी लगा भी नहीं था कि पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में साथ चलने वाला यह साथी एक दिन इतनी जल्दी हमसे बिछड़ जाएगा। मैंने सोचा था कि उनकी कलम अभी बहुत लंबा सफर तय करेगी। वह और खबरें लिखेंगे, और सवाल पूछेंगे और गांव-किसानों की आवाज बनेंगे। लेकिन आज उनकी कलम हमारे सामने शांत है।

फिर भी मुझे लगता है कि रामदुलार की कलम पूरी तरह खामोश नहीं हुई है। उसकी स्याही अभी सूखी नहीं है। उनके लिखे हुए शब्द हमारे बीच हैं। उनकी खबरों में दर्ज किसान हमारे बीच हैं। उनके सवालों में दर्ज गांव हमारे बीच हैं। उनकी पत्रकारिता में दिखाई देने वाला आम आदमी आज भी हमारे आसपास है। और शायद यही एक पत्रकार की सबसे बड़ी जिंदगी है कि उसके चले जाने के बाद भी उसकी कलम बोलती रहे।

रामदुलार के जाने के बाद मेरे मन में बार-बार उनके साथ बिताए समय की छोटी-छोटी बातें लौटती हैं। किसी खबर को लेकर उनका फोन करना, किसी मुद्दे पर अपनी राय रखना, किसी खबर को प्रमुखता देने की जिद करना, किसी ग्रामीण समस्या को लेकर बेचैनी दिखाना और अपनी बात पर मजबूती से खड़े रहना। अब वह सब स्मृति है। अब फोन आएगा तो उनकी आवाज नहीं होगी। अखबार खुलेगा तो उनकी खबर नहीं होगी। किसी गांव से कोई बड़ी खबर सामने आएगी तो शायद अनायास मन में यह ख्याल आएगा कि रामदुलार होते तो इस खबर को किस नजर से देखते, क्या सवाल पूछते और किस तरह उसे अखबार के पन्ने पर रखते।

यही किसी अपने के चले जाने की सबसे बड़ी पीड़ा है। आदमी चला जाता है, लेकिन उसकी आदतें हमारे भीतर रह जाती हैं। उसकी आवाज याद आती रहती है। उसकी कही बातें बार-बार याद आती हैं। और उसके साथ बिताया समय अचानक जीवन की सबसे कीमती स्मृतियों में बदल जाता है।

रामदुलार मेरे लिए सिर्फ एक अधीनस्थ पत्रकार नहीं थे। वह एक ऐसे साथी थे, जिनकी पत्रकारिता की पहली पारी मैंने शुरू होते देखी और जिन्हें बाद में अपनी पहचान बनाते हुए देखा। एक संपादक के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है कि उसके साथ काम करने वाला व्यक्ति एक दिन अपनी स्वतंत्र पहचान बना ले। लेकिन आज उसी पहचान के साथ एक गहरा दुख जुड़ गया है कि वह व्यक्ति अब हमारे बीच नहीं है।

उनकी पत्नी, उनके बेटे और उनकी बेटी के लिए यह दुख शब्दों से कहीं बड़ा है। उनके लिए रामदुलार कोई पत्रकार नहीं थे, वह घर के सदस्य थे, जीवन का सहारा थे, पिता थे, पति थे। उनके जाने से पैदा हुआ खालीपन शायद जिंदगी भर रहेगा। समय घाव को सहने की ताकत दे सकता है, लेकिन किसी अपने की जगह कभी नहीं भर सकता।

पत्रकारिता ने भी एक संवेदनशील और बेबाक आवाज खो दी है। ग्रामीण पत्रकारिता ने अपना एक साथी खोया है। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन ने अपना एक सक्रिय सदस्य खोया है और मैंने उस साथी को खोया है, जिसे कभी मैंने पत्रकारिता के मैदान में उतारा था और जिसकी कलम को अपनी आंखों के सामने मजबूत होते देखा था।

रामदुलार, आपकी बेबाक कलम अब भी मेरे सामने है। आपकी वह कलम जो किसी दबाव में झुकना नहीं जानती थी, वह कलम जो सवाल पूछती थी, वह कलम जो गांव के आदमी के पक्ष में खड़ी होती थी, वह कलम जो व्यवस्था से असहज सवाल करने का साहस रखती थी। आज वह कलम आपके हाथ में नहीं है, लेकिन आपकी बेबाकी अभी भी हमारे बीच है।

आपने जिंदगी भर दूसरों के दुख की खबर लिखी। आज आपकी खबर लिखते हुए मेरा अपना मन भारी है। कभी आपको पत्रकारिता की राह पर उतारने वाला मैं, आज आपकी अंतिम यात्रा को याद करते हुए खुद को बेहद असहाय महसूस कर रहा हूं। यह सोचकर मन और भी भर आता है कि जिस अखबार के लिए आपने अपनी जिंदगी के इतने महत्वपूर्ण वर्ष दिए, उसी अखबार में लिपटकर आपको अंतिम विदाई मिली। शायद यही आपकी पत्रकारिता यात्रा का सबसे मार्मिक आखिरी वाक्य है।

आपने जिंदगी भर अखबार के लिए लिखा और आखिर में अखबार ही आपकी अंतिम यात्रा का साथी बन गया। रामदुलार, आप चले गए हैं, लेकिन आपकी बेबाकी हमारे बीच रहेगी। आपके सवाल रहेंगे। आपकी खबरें रहेंगी। आपकी ग्रामीण पत्रकारिता की चिंता रहेगी। उन किसानों और गरीबों की यादें रहेंगी, जिनकी आवाज बनने की आपने कोशिश की। मेरे सामने आपकी वह बेबाक कलम हमेशा रहेगी, जिसे कभी मैंने पत्रकारिता के फील्ड में उतारा था और जिसने बाद में अपनी अलग पहचान बनाई।

आपकी सांसें थम गई हैं, आपकी कलम रुक गई है, लेकिन आपके शब्द अभी बाकी हैं। जब भी कोई पत्रकार किसी दबे हुए आदमी की आवाज को अखबार में जगह देगा, जब भी कोई कलम किसी ताकतवर से सवाल पूछेगी, जब भी किसी किसान की पीड़ा खबर बनेगी, मुझे विश्वास रहेगा कि वहां कहीं न कहीं रामदुलार की बेबाक कलम की एक लकीर जरूर मौजूद होगी।

अलविदा रामदुलार…। आपकी कमी हमेशा महसूस होगी…। आपकी याद हमेशा आएगी और आपकी बेबाक कलम…वह अब भी मेरे सामने है…!

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