



प्रेमानंद महाराज आज देश के सबसे चर्चित आध्यात्मिक चेहरों में शामिल हैं। करोड़ों लोग उनके प्रवचन सुनते हैं, उनसे आध्यात्मिक मार्गदर्शन लेते हैं और उनके आश्रम से जुड़ते हैं। लेकिन जैसे-जैसे लोकप्रियता बढ़ी है, वैसे-वैसे उनके आश्रम और उनके कथनों को लेकर सवाल भी सामने आने लगे हैं।
सबसे ताजा सवाल मशहूर शिक्षिका नीतू मैम ने उठाए हैं। उन्होंने प्रेमानंद महाराज के उस कथन का संदर्भ लेते हुए सवाल किया कि अगर ‘राधा-राधा’ नाम जपने से अकाल मृत्यु नहीं होती, तो फिर उनके शिष्य बताए जाने वाले रसिक दुलारी शरण की इतनी दुखद मौत कैसे हुई?
यह सवाल किसी की आस्था को चुनौती देने के बजाय उस दावे की सीमा पर सवाल उठाता है। क्या किसी मंत्र या नाम का जाप मनुष्य को मृत्यु से बचाने की गारंटी दे सकता है? अगर ऐसा दावा किया जाता है तो उसका आधार क्या है और उसकी सीमा क्या है?
रसिक दुलारी शरण की मौत ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। उनकी मौत की परिस्थितियों को लेकर पुलिस जांच कर रही है और नए CCTV फुटेज सामने आने के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। रिपोर्टों के अनुसार मौत से पहले की गतिविधियों और घटनाक्रम की जांच जारी है।
इसके साथ ही प्रेमानंद महाराज के आश्रम से जुड़े अन्य विवाद भी चर्चा में हैं। एक किशोर के लापता होने के मामले में उसका परिवार आश्रम से जानकारी और सहयोग की मांग करता रहा; बाद में पुलिस ने उसे दूसरे आश्रम से बरामद किया। इस मामले में आश्रम की भूमिका को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है, क्योंकि पुलिस के मुताबिक उस किशोर के आश्रम में ठहरने का रिकॉर्ड सामने नहीं आया था।
अब एक और बेहद चौंकाने वाला दावा सामने आया है—विराट कोहली को प्रेमानंद महाराज के आश्रम बुलाने के लिए कथित तौर पर ₹5 करोड़ दिए गए। यह दावा फलाहारी महाराज की ओर से किया गया है और इसको लेकर मीडिया में व्यापक चर्चा है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ₹5 करोड़ के भुगतान का कोई स्वतंत्र, सार्वजनिक और सत्यापित प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे ‘विराट कोहली को ₹5 करोड़ देकर बुलाया गया’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा; फिलहाल यह एक आरोप/दावा है।
विराट कोहली और अनुष्का शर्मा का प्रेमानंद महाराज से मिलना हालांकि सार्वजनिक रूप से दर्ज है। दोनों कई बार उनसे मिलने वृंदावन पहुंचे हैं। विवाद रकम को लेकर है, क्या वास्तव में इस मुलाकात के लिए ₹5 करोड़ का भुगतान हुआ था?
नीतू मैम ने इसी व्यापक संदर्भ में एक और बुनियादी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि चीन जैसे देशों में लोग शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और skills पर जोर देते हैं, जबकि भारत में बड़ी संख्या में लोग चमत्कार, बाबाओं और धार्मिक संस्थाओं के नाम पर धन खर्च करते हैं।
यहां असली बहस आस्था बनाम नास्तिकता की नहीं है।
बहस यह है कि क्या किसी भी धार्मिक दावे को सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लिया जाए क्योंकि उसे कोई लोकप्रिय संत या आध्यात्मिक व्यक्ति कह रहा है?
क्या किसी बाबा के कथन पर सवाल करना धर्म-विरोधी होना है?
क्या ‘चमत्कार’ कहे जाने वाले दावों की वैज्ञानिक और तार्किक जांच नहीं होनी चाहिए?
और क्या भारत को शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, तर्क और skills को उतनी ही गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए जितनी गंभीरता से वह धार्मिक आस्था को लेता है?
प्रेमानंद महाराज के समर्थकों का अपना पक्ष है। आश्रम ने रसिक दुलारी की मौत के मामले में लोगों से अपुष्ट सूचनाओं और अफवाहों से बचने तथा जांच पूरी होने का इंतजार करने की अपील की है।
लेकिन सवाल पूछना किसी के खिलाफ फैसला सुनाना नहीं है।
रसिक दुलारी की मौत की पूरी सच्चाई जांच से सामने आएगी। विराट कोहली को ₹5 करोड़ दिए जाने का दावा सच है या नहीं, इसका जवाब प्रमाण देंगे। आश्रम से जुड़े दूसरे आरोप सही हैं या निराधार, यह भी जांच और तथ्य ही तय करेंगे।
लेकिन एक समाज के रूप में सवाल पूछने का अधिकार क्यों छोड़ा जाए? आस्था रखिए, लेकिन सवाल भी कीजिए। चमत्कार सुनिए, लेकिन प्रमाण भी मांगिए।
बाबाओं का सम्मान कीजिए तो उनके दावों की जांच करने का अधिकार भी बचाकर रखिए। क्योंकि सवाल आस्था के खिलाफ नहीं है। सवाल उस दावे के खिलाफ है, जो बिना प्रमाण के सत्य मान लिए जाने की मांग करता है।

