नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2026। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने दिल्ली पुलिस की उस एडवाइजरी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों से संस्थान का वैध पहचान-पत्र या PIB/DIP मान्यता कार्ड साथ रखने और उसे साफ दिखाए रखने को कहा गया है। उन्होंने लिखा कि अब बस एक कानून बाकी है- कि भारत में आप पत्रकारिता नहीं कर सकते।
रवीश का यह पोस्ट पत्रकार अनिश कुमार के उस ट्वीट को कोट करते हुए आया, जिसमें कहा गया था कि PIB कार्ड मुख्य रूप से सरकारी इमारतों तक पहुंच के लिए सुरक्षा-जांच वाली मान्यता है। यह अपने आप में पत्रकारिता करने का लाइसेंस नहीं है, और यह उन पत्रकारों के लिए है जो मंत्रालयों व विभागों की कवरेज करते हैं।
अनिश कुमार ने यह भी लिखा कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने नियामक ढांचे में चलते हैं, जबकि यूट्यूब, इंस्टाग्राम और X जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए ऐसा अलग ढांचा नहीं है, इसलिए वहां की सामग्री को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देखा जाना चाहिए।
रवीश ने इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि गोदी चैनलों के बाहर पत्रकारिता का जो असंगठित क्षेत्र खड़ा हुआ है, उसे MSME की तरह “नोटबंदी” कर कमजोर किया जाएगा। उन्होंने पुलिस पर भी सवाल उठाया। लिखा कि जिस पुलिस ने आज तक अपना पहचान-पत्र नहीं दिखाया, वही सादे लिबास में लाठी-डंडा लेकर प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी थी और उन्हें मार रही थी।
यह टिप्पणी 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुई घटना के बाद आई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन की कवरेज कर रहे कई स्वतंत्र और डिजिटल पत्रकारों से पुलिस ने PIB कार्ड मांगा।
द वायर हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक, संस्थान का प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद कुछ पत्रकारों को रोका गया, धक्का-मुक्की हुई और हिरासत में लेने की कोशिश की गई। तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। दिल्ली पुलिस ने 4 अक्टूबर को कहा कि शिकायतें क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई हैं। ACP विवेक भगत का नाम भी इस विवाद में आया है।
इसी पृष्ठभूमि में 5 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने “The story matters, So does how you get it” शीर्षक से पत्रकारों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें चार बातें प्रमुख हैं: संस्थान का वैध ID या PIB/DIP कार्ड साथ रखें, कार्ड साफ दिखाई दे, पुलिस कार्रवाई में बाधा न डालें, और तनाव वाली स्थिति में सुरक्षित दूरी से कवरेज करें।
रवीश इससे पहले भी इसी एडवाइजरी पर लिख चुके हैं कि सार्वजनिक प्रदर्शन में पहचान-पत्र की जरूरत क्या है, और इस संदेश की आड़ में स्वतंत्र पत्रकारों पर पहचान-पत्र बनवाने का दबाव बनाया जा रहा है।
द वायर हिंदी ने केंद्रीय मीडिया प्रत्यायन दिशानिर्देश, 2022 का हवाला देते हुए लिखा है कि PIB मान्यता कोई आधिकारिक या विशेष दर्जा नहीं देती। सामान्य श्रेणी में कम से कम पांच साल का अनुभव और दिल्ली-एनसीआर निवास जैसी शर्तें हैं। फ्रीलांस श्रेणी में अनुभव की मांग और ज्यादा है। यानी PIB कार्ड न होना किसी को पत्रकार मानने से इनकार करने का आधार नहीं माना जाता।
इस बहस के दोनों पक्ष सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। एक तरफ तर्क है कि भीड़ वाले प्रदर्शन में पहचान-पत्र पत्रकार और उपद्रवी में फर्क करने का जरिया है। दूसरी तरफ सवाल है कि क्या सरकारी मान्यता के बिना रिपोर्टिंग करना अब व्यावहारिक रूप से मुश्किल किया जा रहा है।
मूल खबर-

