Horrific story of a press photographer.
Shouldn’t Delhi police be charged for attempt to murder?-Seema Chisti
नई दिल्ली। दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों के लिए पुलिस की ओर से जारी सुरक्षा सलाह के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के फोटो जर्नलिस्ट तरुण रावत ने 7 अक्टूबर को प्रदर्शन की कवरेज के दौरान अपने साथ हुई घटना को बेहद भयावह अनुभव के तौर पर दर्ज किया है।
रावत के मुताबिक, वह जनपथ-अशोका रोड राउंडअबाउट पर कांग्रेस सांसदों के उस मार्च की कवरेज कर रहे थे, जो SIR में कथित अनियमितताओं के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर की ओर जा रहा था।
वहां भारी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बल तैनात थे। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की कार्रवाई के बीच बेहतर तस्वीरें लेने और पूरे घटनाक्रम को साफ तौर पर देखने के लिए रावत कुछ अन्य फोटो पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को ले जाने के लिए लगाई गई एक बस की छत पर चढ़ गए। कुछ NSUI कार्यकर्ता भी बस की छत पर मौजूद थे। लेकिन अचानक बस चल पड़ी।
सबसे खतरनाक बात यह थी कि बस की छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ी या उतरने का सुरक्षित रास्ता नहीं था। पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों को आवाज लगाकर बस रोकने को कहा। कैमरे हवा में लहराकर सड़क पर मौजूद लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की, लेकिन बस नहीं रुकी।
बस फरोजशाह रोड की तरफ मुड़ गई और उसकी रफ्तार बढ़ती गई। छत पर मौजूद पत्रकारों को अपनी जान बचाने के लिए पेट के बल लेटना पड़ा, क्योंकि रास्ते में पेड़ों की निचली डालियां लगातार सिर और शरीर से टकराने का खतरा पैदा कर रही थीं।
रावत ने लिखा कि बस की रफ्तार बढ़ने के साथ ही डर और बढ़ता गया। वह अपने साथी फोटो पत्रकारों को नीचे रहने और सावधान रहने के लिए कहते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि ITO चौराहे पर शायद बस रुकेगी।
आखिरकार बस तिलक मार्ग स्काईवॉक के पास रुकी और पत्रकारों तथा प्रदर्शनकारियों को नीचे उतरने का मौका मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, बस की छत पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने बाद में बस के टायरों की हवा निकाल दी, ताकि बाकी लोगों को भी सुरक्षित तरीके से नीचे उतरने के लिए समय मिल सके।
पुलिस की एडवाइजरी और जमीन पर पत्रकार की जान का खतरा
इस घटना से कुछ दिन पहले ही दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिए एडवाइजरी जारी की थी। पुलिस ने पत्रकारों से पहचान-पत्र साथ रखने और पुलिस कार्रवाई में बाधा न डालने के साथ-साथ प्रदर्शन स्थल से “उचित और सुरक्षित दूरी” बनाए रखने की सलाह दी थी।
विडंबना यह है कि जिस पुलिस ने पत्रकारों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सलाह दी, उसी पुलिस की कार्रवाई के दौरान एक फोटो पत्रकार पुलिस की बस की छत पर फंस गया और उसे तेज रफ्तार बस में पेड़ों की डालियों से बचते हुए अपनी जान बचानी पड़ी।
रावत के मुताबिक, पुलिस की इस安全 दूरी वाली सलाह का पालन करने के कारण वह राहुल गांधी की हिरासत की तस्वीरें भी नहीं ले सके।
क्या पुलिस की लापरवाही की जांच होगी?
इस घटना पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बस की छत पर पत्रकार और अन्य लोग मौजूद थे तो पुलिस या बस चालक को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी? पत्रकारों की आवाज सुनने और बस रोकने की उनकी कथित कोशिशों के बावजूद बस क्यों चलती रही? और अगर पुलिस को पता था कि लोग बस की छत पर हैं, तो बस को चलाने की अनुमति किसने दी?
इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आ सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर सीधे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पुलिस ने पत्रकारों की हत्या का प्रयास किया। लेकिन यदि पत्रकारों की मौजूदगी और उनकी जान को खतरे की जानकारी होने के बावजूद बस चलाई गई, तो यह गंभीर लापरवाही और संभावित आपराधिक जिम्मेदारी की जांच का विषय जरूर बनता है।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब जंतर-मंतर और दिल्ली में प्रदर्शनों की कवरेज को लेकर पत्रकारों और पुलिस के बीच तनाव पहले ही बढ़ा हुआ है। 3 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे और दिल्ली पुलिस ने उनकी शिकायतें क्राइम ब्रांच को जांच के लिए भेजी हैं।
प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं, पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है और पत्रकारों की जिम्मेदारी घटनाओं को दर्ज करना। लेकिन कानून-व्यवस्था संभालने वाली कार्रवाई के दौरान अगर पत्रकारों की जान ही खतरे में पड़ जाए, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।

