Rama Shankar Singh-
1- 14 बरस पहले पंद्रह अगस्त के दिन ही गुजरात में नकली लाल क़िला बना कर समानांतर स्वतंत्रता दिवस मनाया गया
2- राजघाट पर गैस क़ीमतों के विरोध स्वरूप डॉंस हुआ
3- ईंधन की बढ़ी क़ीमतों पर संसद में बैलगाड़ी पर बैठकर प्रवेश किया गया
हमने पिछले साठ बरसों में ऐसे ही सैंकड़ों दृ्श्य लोकतांत्रिक प्रतिरोध के भारत में देखे हैं जिन पर कभी कोई पुलिस कार्यवाही नहीं होती थी – गिरफ़्तारी और हिरासत भी नहीं! ये सब भारतीय लोकतंत्र , विरोध करने की संवैधानिक आजादी और राजनीतिक सहिष्णुता के दृश्य थे !
आज इन्हीं सब तरीकों से सत्ता में आये राजनीतिक दल का संसद में और बाहर का रवैया चिंता पैदा करता है । महिला सांसदों समेत विपक्षी नेताओं को सड़क पर पुलिस के द्वारा घसीटना किस भारतीय परम्परा का निर्वहन करना है ? एक संविधिक संस्था द्वारा अलोकतांत्रिक तरीकों से चुनाव प्रभावित करने की कारगुज़ारियों पर प्रतिपक्ष व जनता द्वारा विरोध का हक है और रहेगा !

याद रखना – कभी भी किसी के पास अनंतकाल तक गद्दी टिकी नहीं रहती ! शासक और सत्ता का आना जाना लगा रहता है और रहना भी चाहिये ।
यमराज का बुलावा भी किसी के लिये निश्चित नहीं होता । नश्वर चीज़ के लिये ऐसा लगाव न किसी का चला है और न ही चलेगा।
इसी देश ने 17 बरस ऐसे प्रधानमंत्री को देखा था जिसकी लोकप्रियता मृत्यु के साथ ही गयी थी । इसी प्रधानमंत्री के लिये विपक्ष के नेता और भाजपा के पितृपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने आँसू बहाये थे । और 10 साल तक अपार लोकप्रियता हासिल कर चुकी लेकिन असहिष्णु बनते ही दूसरी प्रधानमंत्री सत्ता हार चुकी थी । गलती मानने पर वे दोबारा चुनी गयीं और कुल 14 बरस प्रधानमंत्री रहीं । एक प्रधानमंत्री तो अब तक का सबसे बड़ा तीन चौथाई संसदीय बहुमत जीत कर अगले ही चुनाव में अपनी सरकार नहीं बना सका था । चौथा प्रोफेसर और ग़ैरराजनीतिक प्रधानमंत्री दस साल रहा जिस पर कलंक का एक भी छींटा नहीं लगा । पांचवें छँटे सातवें आठवें नौवें दसवें ग्यारहवें और बारहवें प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक पद्धति से आये गये लेकिन एक ने भी जबरन पद पर बने रहने के लिये अमर्यादित काम नहीं किये । बहुत बड़े उग्र विरोध प्रदर्शन संसद के बाहर भीतर भी हुये और देश भर में लेकिन सांसदों को महिलाओं को कभी भी सड़क पर पुलिस द्वारा घसीटा नहीं गया।

यदि पार्टी , संगठन , सासंद और कार्यकर्ता अनुशासन के नाम पर मौन रहेंगे तो इमरजेंसी जैसा कलंकित राजनीतिक इतिहास लिखेंगे जिस पर दशकों तक विरोध का सिलसिला चलेगा ।
मैंने अपने युवा राजनीतिक जीवन का एक हिस्सा ( 1969-77) अति लोकप्रिय प्रधानमंत्री के विरोध में जेल और भूमिगत रहते बिताया है कि लोकतंत्र जीवित रहे । आज मैं 75 बरस का होने वाला हूँ लेकिन लोकतंत्र के लिये अपना जीवन होमने के लिये तैयार हूँ चाहे कितना ही मैं वैचारिक सिद्धांत रूप से सभी पार्टियों के खिलाफ होऊं !
अंतिम बात – समय रहते गलती का अहसास और परिमार्जन अच्छी दृष्टि से याद किया जाता है । भारत में लोकतंत्र खत्म या सीमित करने का कोई प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता !

