यशवंत सिंह-
बारह साल तक नरेंद्र मोदी की सत्ता का सबसे बड़ा हथियार एक छवि थी। यह कि यह सरकार झुकती नहीं, माफी नहीं मांगती, और किसी मंत्री की कुर्सी विपक्ष के शोर से नहीं हिलती। नोटबंदी हो, किसान आंदोलन हो या 2024 का NEET लीक, सरकार ने हर बार यही संदेश दिया कि फैसले दिल्ली के एक दफ्तर में होते हैं, सड़क पर नहीं।
2026 में यह तिलिस्म टूटता दिख रहा है। जुलाई में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़नी पड़ी। अक्टूबर आते-आते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सुप्रीम कोर्ट के कठघरे में हैं, उनके अपने दोनों साथी आयुक्त उनके फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कर चुके हैं, और राहुल-प्रियंका गांधी चुनाव आयोग के बाहर से हिरासत में उठाए जा रहे हैं। किसी सत्ता के पतन की शुरुआत ऐसे ही होती है: पहले डर टूटता है, फिर साख, फिर सत्ता।
धर्मेंद्र प्रधान की कहानी सिर्फ एक पेपर लीक की कहानी नहीं है। 3 मई को 22 लाख से ज़्यादा बच्चों ने NEET दी, और 12 मई को परीक्षा रद्द हो गई। CBI ने जिन लोगों को पकड़ा उनमें NTA की ओर से नियुक्त विषय-विशेषज्ञ तक शामिल थे, यानी पेपर बाहर से चोरी नहीं हुआ, भीतर से बेचा गया। जांच में यह भी सामने आया कि यही गिरोह 2025 का पेपर भी लीक कर चुका था। और यह सब उसी मंत्री की नाक के नीचे हुआ, जिसके रहते 2024 में भी NEET लीक हुआ था। दो साल में दो बार देश की सबसे बड़ी परीक्षा बिक गई, फिर भी सरकार की पहली प्रतिक्रिया इस्तीफा नहीं, “कमांड चेन में चूक” जैसा सरकारी जुमला थी।
सरकार ने बचाव की हर तरकीब आज़माई। परीक्षा दोबारा कराई, वायुसेना के विमानों से पेपर पहुंचाए, पूरे देश में टेलीग्राम तक बंद कर दिया। लेकिन जिस चीज़ को रोकना था, वह रुकी नहीं: छात्रों का गुस्सा। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरें आईं, और जंतर-मंतर पर एक नया, गैर-पारंपरिक युवा आंदोलन खड़ा हो गया, जिसे न कांग्रेस का मुखौटा कहकर खारिज किया जा सका, न देशद्रोही बताकर दबाया जा सका। हफ्तों के धरने के बाद 25 जुलाई को प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। उनके पत्र में भी वही पुराना सुर था कि “कुछ तत्वों” ने छात्रों को गुमराह किया। पर इस्तीफा अपने आप में सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति था। आंदोलन के नेता अभिजीत दिपके ने उस दिन जो कहा, वह मोदी सरकार के लिए सबसे खतरनाक वाक्य था: अगर लोग डरें नहीं, तो किसी का भी इस्तीफा लिया जा सकता है।
अगर प्रधान सरकार की लापरवाही का प्रतीक थे, तो ज्ञानेश कुमार उसकी नीयत पर सवाल बन गए हैं। फरवरी 2025 में वे उस नए कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त बने, जिसने चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया और प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को बहुमत दे दिया। राहुल गांधी ने तभी असहमति नोट दिया था। तब इसे विपक्ष की आदतन शिकायत कहकर टाल दिया गया। आज वही सवाल सुप्रीम कोर्ट में गूंज रहा है।
सितंबर में आई रिपोर्ट ने पूरी कहानी पलट दी। आरोप विपक्ष का नहीं, आयोग के भीतर का है: दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की कि फैसले उनकी जानकारी के बिना आयोग के नाम पर लिए जा रहे हैं। मतदाता सूची की SIR में करोड़ों नाम कटने के आरोप, नए मतदाताओं के फॉर्म 6 में पूर्वजों से जुड़ाव जैसी शर्त चुपके से जोड़ने का आरोप, बंगाल में 16 लाख से ज़्यादा अपीलें बिना साथी आयुक्तों की मंज़ूरी के दायर करने का आरोप। 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को खुली अदालत में कहना पड़ा कि अदालत ने कोई बदला हुआ फॉर्म 6 मंज़ूर नहीं किया, और रिकॉर्ड से देखा जाएगा कि बदलाव किसने किया। किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए इससे शर्मनाक टिप्पणी शायद ही हो।
और सरकार? वह अब भी ढाल बनकर खड़ी है। संसद में हटाने का पहला नोटिस स्पीकर और सभापति ने खारिज कर दिया, दूसरा महीनों से राज्यसभा में धूल फांक रहा है, तीसरा तैयार है। 6 अक्टूबर को विपक्ष के सांसद चुनाव आयोग तक मार्च करना चाहते थे, तो उन्हें बैरिकेड और पुलिस बसें मिलीं। जो सरकार एक संवैधानिक संस्था के मुखिया से सवाल पूछने वाले सांसदों को हिरासत में ले, वह यह दावा नहीं कर सकती कि उस संस्था से उसका कोई लेना-देना नहीं। ज्ञानेश कुमार का बचाव अब सरकार का सबसे महंगा बचाव बन चुका है, क्योंकि यहां दांव पर एक मंत्री की कुर्सी नहीं, चुनाव की विश्वसनीयता है।
इन दोनों प्रकरणों को अलग-अलग हादसे मानना भूल होगी। दोनों में एक ही ढांचा है: संस्था भीतर से सड़ती है, सरकार आंख मूंदकर बचाव करती है, और जब तक मानती है तब तक भरोसा जा चुका होता है। शिक्षा व्यवस्था युवाओं के भविष्य का दरवाज़ा है, चुनाव आयोग लोकतंत्र का। मोदी सरकार के दौर में दोनों दरवाज़ों की चाबियों पर सवाल उठ रहे हैं। जब किसी सत्ता के सामने सवाल सिर्फ नीतियों पर नहीं, बल्कि परीक्षा और चुनाव जैसी बुनियादी चीज़ों की ईमानदारी पर उठने लगें, तो वह सत्ता अपने सबसे खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुकी होती है।
दूसरा संकेत डर का खत्म होना है। मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा पूंजी निवेश यही था कि विरोध करने वाला अकेला पड़ जाए। पर कॉकरोच जनता पार्टी जैसा आंदोलन, जो खुद को “कॉकरोच” कहकर उसी तिरस्कार को हथियार बना रहा है, बताता है कि Gen Z अब इस डर को नहीं मानता। प्रधान का इस्तीफा लेने के बाद वही आंदोलन अब “जंतर-मंतर 2.0” का नारा देकर ज्ञानेश कुमार के पीछे है। सरकार एक बार झुक चुकी है, और राजनीति में एक बार झुकना अगली मांगों का न्योता होता है।
तीसरा संकेत विपक्ष की बदली हुई ज़मीन है। अब तक विपक्ष के आरोप “हारे हुए लोगों का रोना” कहकर खारिज हो जाते थे। अब उनके पास सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां हैं, CBI की गिरफ्तारियां हैं, चुनाव आयुक्तों की अपनी आपत्तियां हैं। बंगाल और असम की जीत भी इस शोर को दबा नहीं पाई, उलटे “वोट चोरी” के आरोप उन्हीं जीतों पर सवाल बनकर लौट रहे हैं। जो जीत अपने ही रेफरी की साख पर टिकी हो, वह जीत भी कमज़ोरी में बदल जाती है।
भाजपा के रणनीतिकार कहेंगे कि सरकार के पास लोकसभा में बहुमत है, बंगाल जीत लिया, CEC को हटाने लायक संख्या विपक्ष के पास नहीं, और प्रधान का इस्तीफा जवाबदेही का सबूत है। यह सब तकनीकी रूप से सही है। पर पतन हमेशा संख्या के गिरने से शुरू नहीं होता। वह तब शुरू होता है जब सत्ता का नैतिक अधिकार खिसकने लगता है, जब उसके फैसलों पर अदालतें सवाल पूछने लगती हैं, उसके अपने अफसर फाइलों पर असहमति लिखने लगते हैं, और सड़क पर खड़ा नौजवान उससे डरना छोड़ देता है। 2026 में ये तीनों चीज़ें एक साथ हो रही हैं।
प्रधान गए, यह पहली ईंट थी। ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट का जवाब, संसद का तीसरा नोटिस और आज जंतर-मंतर पर जुटती भीड़ तय करेगी कि दूसरी ईंट कब खिसकती है। मोदी सरकार चाहे जितना बचाव करे, इतिहास शायद 2026 को उस साल के रूप में याद रखेगा जब अजेय दिखने वाली सत्ता पहली बार डगमगाती नज़र आई।



