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सुख-दुख

पार्थ सुसाइड कांड और CM आफिस : कातिल ही मुंसिफ है!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

सुसाइड नहीं सुसाइडल होना है सही रास्ता

  • मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई युवा की खुदकुशी से नहीं मिल जाएंगी अंधों को आंखें
  • जीते जी जिन्होंने अन्याय किया, उन्हीं कातिलों से मरने वक्त अपने लिए न्याय की गुहार लगाना खुदकुशी से भी बड़ी नादानी

कोई व्यक्ति और वह भी युवा, जब आत्महत्या करता है तो इस उम्मीद में सुसाइड नोट छोड़ जाता है कि जिन लोगों के अन्याय और उत्पीड़न के कारण वह जान दे रहा है, उसके मरने के बाद देश का कानून और सिस्टम उन्हें सजा देगा.
लेकिन ऐसी उम्मीद, वह भी बीजेपी के राज में रखना, उस व्यक्ति की उतनी ही बड़ी नादानी कही जाएगी, जितनी बड़ी आत्महत्या करना है. यह तो कोई बच्चा भी समझ सकता है कि मुख्यमंत्री कार्यालय में अगर योगी आदित्यनाथ की नाक के ठीक नीचे चिराग तले अंधेरा है तो जान देने के बाद वहां महज एक सुसाइड नोट से कोई रोशनी नहीं आने वाली.

तब भी मुख्यमंत्री की सोशल मीडिया और आईटी सेल में कर्मचारी पार्थ श्रीवास्तव ने अपनी जान देकर अपने सुसाइड नोट में नाम लिखकर उन अत्याचारियों और दुराचारियों को सजा दिलाने की इच्छा मुख्यमंत्री से जताई… वह कितना नादान था, जो यह नहीं समझ सका कि जो अफसर मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठकर जो गोरखधंधा व अन्याय कर रहे हैं, वह अगर मुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं है तो इसका सीधा मतलब है कि मुख्यमंत्री अक्षम हैं…और उसके जान दे देने से वह अचानक काबिल होकर न्याय नहीं करने लग जाएंगे.

अगर कार्यालय में व्याप्त हर गोरखधंधा मुख्यमंत्री या उनके किसी चहेते अफसर की शह पर हो रहा था तो फिर तो उसके जान देने का और भी कोई तुक नहीं बनता. कातिल को ही मुंसिफ समझने की भूल तो आत्महत्या से भी बड़ी नादानी है. बेहतर तो यही होता कि वह युवा खुल कर जंग का ऐलान करता. कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसको आत्महत्या की हद तक सताने वालों के खिलाफ हर संभव प्लेटफॉर्म पर युद्ध छेड़ देता.

ऐसे बड़े और ताकतवर लोगों से डर कर सरेंडर करना या जान दे देना तो इन लोगों की मन की मुराद पूरी करना होता है.
काश कि पार्थ तुमने भी जिंदगी खत्म करने की बजाय लड़ते लड़ते मरने का हौसला जगा लिया होता. सोशल मीडिया, मीडिया, कोर्ट, विभाग… सिस्टम में ही न जाने कितनी जगह ऐसी हैं, जहां कहीं न कहीं तो इन अत्याचारियों की गर्दन दबोची जा सकती थी.

हर लड़ाई की शुरुआत अकेले और कमजोर अवस्था में ही करनी पड़ती है. मगर धीमे धीमे साथ देने वाले आपका हौसला देखकर सामने आने लगते हैं क्योंकि लड़ाई चाहे कितने ताकतवर दुश्मन से क्यों न हो मगर अपनी जान- माल, परिवार और सम्मान सभी को प्यारा होता है. जब अपनी जान, परिवार, माल और सम्मान खतरे में दिखने लगता है तो बड़े बड़े सूरमा रहम की भीख मांगने लगते हैं. जरूरत इस बात की है कि लड़ाई पूरे दिल से और सुसाइडल होकर लड़ी जाए.

मगर ध्यान रहे कि यहां शब्द भले ही एक हो लेकिन सुसाइडल यानी कि आत्मघाती होने और सुसाइड करने में योद्धा और बिना लड़े हथियार डाल देने का भारी अंतर है.

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