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पत्रकार हो तो अरुण शौरी जैसा वरना फिर सीधा दलाल हो तो बेहतर है

Sumant Bhattacharya : पत्रकार अरुण शौरी ने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया.. वो भी पहले इस सूची में थे… शौरी ने कहा. मैंने किसी भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया.. पत्रकार हो तो शौरी जैसा….. वरना फिर सीधा दलाल हो तो बेहतर है…. ना शौरी ने इस पर शोर मचाया … और ना ही न्यूज हेडलाइन बनने की कोशिश की… इसे कहते सहिष्णुता. व्यवस्था का वॉच डॉग यदि .. हुकूमत से अनुकंपा लेगा तो.. फिर भौंकेगा किस पर…? शौरी के इस कदम को.. उदार ह्दय और लोकतंत्र को मजबूत करने… के कदम के तौर पर मोदी साहेब को स्वागत करना चाहिए. जाहिर है, अनुकंपा ग्रहण करने वाले… सिर्फ निर्दोष नागरिक समाज पर भौंकते हैं. हुकूमत पर नहीं..

Sumant Bhattacharya : पत्रकार अरुण शौरी ने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया.. वो भी पहले इस सूची में थे… शौरी ने कहा. मैंने किसी भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया.. पत्रकार हो तो शौरी जैसा….. वरना फिर सीधा दलाल हो तो बेहतर है…. ना शौरी ने इस पर शोर मचाया … और ना ही न्यूज हेडलाइन बनने की कोशिश की… इसे कहते सहिष्णुता. व्यवस्था का वॉच डॉग यदि .. हुकूमत से अनुकंपा लेगा तो.. फिर भौंकेगा किस पर…? शौरी के इस कदम को.. उदार ह्दय और लोकतंत्र को मजबूत करने… के कदम के तौर पर मोदी साहेब को स्वागत करना चाहिए. जाहिर है, अनुकंपा ग्रहण करने वाले… सिर्फ निर्दोष नागरिक समाज पर भौंकते हैं. हुकूमत पर नहीं..

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कल मैंने लिखा कि अरुण शौरी ने .. पहले ही चरण में पद्म पुरस्कार से खुद को हटा लिया था.. और कोई शोरशराबा भी नहीं मचाया.. तो कई मित्रों ने अरुण शौरी की पत्रकारीय नैतिकता पर हमला बोल दिया.. और यहां तक कह डाला, शौरी मंत्री पद ना मिलने से रूठे हुए हैं.. मैं जानता हूं, शौरी के बारे में उनकी समझ सेकंडरी सोर्स पर है… चलिए आप मित्रों से एक अनुभव साझा करता हूं.. मैं उस वक्त टाइम्स ऑफ इंडिया में ट्रेनिंग कर रहा था… और शौरी साहेब एक्सप्रेस छोड़ चुके थे.. हम सभी ट्रेनी ग्रुप में शौरी साहेब के ईस्ट एंड वाले घर में गए…

काफी देर तक बात होती रही… बीच-बीच में एक फोन आ रहा था लैंड लाइन पर.. बातचीत रोक कर अरुण शौरी जाते और फिर लौट कर बात करने लगते.. पांच-छह बार के बाद तंग आ गए.. अबकी जब लौटे तो उनके मुंह से निकल ही गया… तंग कर डाला… हम युवा थे, तो बेसाख्ता पूछ बैठे.. किसने सर..? शौरी साहेब ने कहा, राजीव ने.. हमारा तुरंत ही अगला सवाल था, कौन राजीव…?

शौरी साहेब बोले, राजीव गांधी…. अब हम कहां रुकने वाले थे और … तब संपादक भी आज के संपादकों की तरह भौकाल नहीं बांधते थे.. शौरी साहेब ने कहा, राजीव बार-बार एक ही बात पूछ रहा है.. सरकार से समर्थन वापस ले लूं क्या..? हमने फिर पूछा, तो आपने क्या कहा..? शौरी साहेब ने कहा, मैं उससे एक ही बात कह रहा हूं… इस वक्त देश की सरकार सिर्फ स्थायी सरकार की चाहत रखती है.. और उसके बाद राजीव गांधी ने समर्थन वापस ले लिया…. तो यह था शौरी साहेब का कद… उन पर नकारात्मक टिप्पणी करने से पहले गुजरे वक्त पर.. और संपादकों के मयार को अच्छी तरह से जांच परख लिया करें.. आज के संपादकों को देख गुजरे कल के संपादकों… पत्रकारों की हैसियत और नैतिकता को जांचने की जुर्रत कभी ना करें…. बाकि आपकी मर्जी..जो चाहें कहें और जो चाहें लिखें..

Sanjaya Kumar Singh : अरुण शौरी वो संपादक हैं जो उपप्रधानमंत्री की गाली को उन्हीं शब्दों में छाप दिया, तमाम खोजी खबरें छापने के बाद श्रेय लेने की बजाय लिखा कि लोग पूरी फाइल रीसेप्शन पर छोड़ जाते हैं सिर्फ छापने का माद्दा चाहिए और ये भी कि लिखते रहो तो लोगों को याद रहता है वरना लोग भूल जाते हैं। वो किसी गलतफहमी के शिकार कभी नहीं रहे। और पैसे पद के बारे में खुद लिख चुके हैं कि 1988-90 में 20,000 रुपए की पेंशन मिलती थी (वर्ल्ड बैंक से) और शायद अकेले संपादक हैं जो एक्सप्रेस और टीओआई दोनों में काम किया। साथ काम करने वालों को पहले नाम से जानते हैं और खुद को अरुण ही कहलाना पसंद करते हैं। एक्सप्रेस और गुरुमूर्ति की जोड़ी ने रिलायंस की जो बैंड बजाई थी – उसके बाद मौजूदा सरकार में उनके मंत्री बनने की उम्मीद किसी को नहीं होगी। अरुण शौरी को तो नहीं ही। उनका कद मंत्री से बहुत ऊंचा है।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के दिल्ली केंद्र में 1987 में हुई हड़ताल जब खत्म हुई तो शहर में लगे होर्डिंग पर लिखा था, इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता आर बैक – इंसपाइट ऑफ देम। जब इंडियन एक्सप्रेस एसपी-डीएम से नहीं, सीधे प्रधानमंत्री से लोहा लेता था और तब मनमोहन सिंह जैसे भले आदमी प्रधानमंत्री नहीं थे। अरुण शौरी जैसे संपादक हड़ताल खत्म होने के बाद “गुड मॉर्निंग मिस्टर गांधी” जैसा संपादकीय लिखने की हैसियत रखते थे।

जहां तक इंडियन एक्सप्रेस, अरुण शौरी या रामनाथ गोयनका की बात है राजीव गांधी की सरकार गिरने के बाद भी अखबार सरकार का भोंपू नहीं बना। एक हस्ताक्षरित बयान में रामनाथ गोयनका ने कहा था, जहां तक मेरा सवाल है, “मैं सिर्फ यही कहूंगा कि इस तरह का मनमानी के आगे मैं घुटने नहीं टेकूंगा। अपने अंतिम सांस तक मैं आजादी के उन सिद्धांतों के लिए लड़ूंगा जिनके लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में संघर्ष किया था। एक्सप्रेस समूह के प्रत्येक पाठक और इस देश में आजादी से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति मेरा यह वादा है।” अब न ऐसा वादा करने वाले रहे और न वादा करने की हैसियत रखने वाले लोग।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या और संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. Raj

    April 2, 2016 at 9:07 am

    Agree, Stature of Arun Shourie is far higher than any minister in this government. Also, from Shourie to Shekhar Gupta what a decline……..

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