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इंटरव्यू

हे पुरुष, तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं : डा. रूपा जैन

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर एटा जिले की जानी मानी गाइनेकोलॉजिस्ट, भ्रूण हत्या के विरोध में और महिलाओं-बच्चियों की शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए लंबे समय से काम कर रहीं चर्चित डॉक्टर रूपा जैन ने साक्षात्कार में जो कुछ कहा है, उसे उनके शब्दों में यहां रख रहा हूं…

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर एटा जिले की जानी मानी गाइनेकोलॉजिस्ट, भ्रूण हत्या के विरोध में और महिलाओं-बच्चियों की शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए लंबे समय से काम कर रहीं चर्चित डॉक्टर रूपा जैन ने साक्षात्कार में जो कुछ कहा है, उसे उनके शब्दों में यहां रख रहा हूं…

ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है, कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं : डा. रूपा जैन

पहले तो मैं आज तक यह बात समझ नहीं पाई हूँ कि लड़का लड़कियों में इतना भेदभाव क्यों हैं? बेटी बचाओ, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… क्या नॉनसेंस है। बेटी बेटा दोनों बराबर हैं। जो जीव गर्भ में आ गया उसे जन्म देना ही होगा। देयर शुड बी ए ला अगेंस्ट डिटरमिनेशन ऑफ़ प्रिगनैन्सी। वन्स यू हेव कन्सीवड यू हेव टू गिव बर्थ, में इट बी अ बॉय और गर्ल। बेटिया पिता को कितनी प्यारी होती हैं, ये बात एक पिता से ज्यादा कौन जानता है। यदि बेटियां बचानी हैं तो मेंटीलिटी पुरुषों की नहीं, औरतों की मैंटीलिटी को रिफाइंड करना पड़ेगा। 

जब तक एक औरत औरत को मजबूत नहीं करेगी, यह समस्या हल नहीं हो सकती। मैं अपने इतने साल के डॉक्टरी करियर में दावे के साथ कह सकती हूँ कि एक भी बाप ने चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, मुझसे आकर यह नहीं कहा कि लड़की हुई तो मुझे नहीं चाहिए। मैं पूरे समाज से गुहार नहीं करती क्योंकि समाज बहुत ही अनस्टेबल विषय है। पर मैं सिर्फ हरेक गर्भवती माँ से ये विनती करती हूँ कि अपने पेट में पलने वाले बच्चे को इश्वर का अंश समझकर उसकी रक्षक बनें, भक्षक नहीं। 

एक औरत की ताकत इश्वर को भी झुका सकती हैं तो इस समाज के नियम क्या चीज हैं। एक नारी में पुरुष से ज्यादा अधिक आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति होती है। बच्चे को पैदा करने में जो दर्द माँ को होता हैं वह एक हार्ट अटैक के दर्द से भी ज्यादा होता है। ये समाज मेल डोमिनेटेड नहीं, फीमेल डोमिनेटेड है साहब। यदि फीमेल डॉमिनेशन नहीं होता तो एक औरत ये फैसला नहीं लेती कि बच्ची को गिरवाना है। इग्नोरेंस इज द रुट ऑफ़ आल ईविल। बच्चों को पढ़ाओ, चाहे वह बेटी हो या बेटा हो। बेटे को पढ़ाओगे तो ये जन्म सुधर जाएगा और बेटी को पढ़ाओगे तो आने वाली पुश्तें सुधर जायेगी।

मैं एक बात जानती हूं। एक झूठ यदि १०० बार बोला जाए तो बात सच लगने लगती है। पुरुष इस सच्चाई को जानते थे कि स्त्री हमसे १००० गुना ज्यादा ताकतवर है। वो बहुत चालाक थे। इसलिए उन्होंने जोर जोर से बार बार बोलना शुरू कर दिया औरत करजोर है, उसे ताकतवर बनाओ, औरत लाचार है इसकी रक्षा हमें करनी है। ये पुरुष बुद्धिजीवियों ने इस सोसाइटी को मेल डोमिनेटेड का नाम दे दिया।

आज मैं इस बात को जोर जोर से और १०० बार बोलती हूं और हर औरत से कहती हूँ कि वह भी यही बोले कि ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है। कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं। तुम हमारी रक्षा क्या करोगे? हम अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं। तुम्हे भी संभाल लेते हैं और तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं। आ जाओ और अपनी सच्चाई सबके सामने लाओ। अब समय आ गया है कि बेटी बेटा, औरत पुरुष का अलाप बंद होना चाहिए। दोनों ईश्वर की रचना हैं। दोनों कुदरत का हिस्सा हैं। दोनों को अपना कार्य करने दो और यदि तुम मर्दों को औरत से ज्यादा समझते हो तो फिर ये रिजर्वेशन का मुद्दा कहाँ से आ जाता है आदमियों के लिए?

मैं तो यह चाहती हूँ कि सब रिजर्ववेशन ख़त्म हो जाने चाहिए। सिर्फ एक रिजर्वेशन हो- फीमेल रिजर्वेशन। औरतों के लिए करके दिखाओ तो हम जानें कि तुम्हें औरतो की कितनी चिंता है। फिर देखिये कौन सा ऐसा परिवार है जो बेटी को नहीं पढ़ायेगा। ५० प्रतिशत मेल के लिए और ५० प्रतिशत फीमेल के लिए। हो जाने दो आमने सामने की टक्कर। बदल जाने दो समाज को। 

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा / कासगंज
मो. ९४५६०३७३४६

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