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सुख-दुख

गर्मियों के दिन, गांव की पगडंडियां और यशवंत का ये गाना (देखें वीडियो)

गर्मी की छुट्टियां वैसे तो ज्यादातर मध्यवर्गीय शहरियों के लिए ओह उफ्फ हाय का सबब होती हैं लेकिन मेरे लिए रोमांच और पुर्नजीवन का मौसम. खड़ी दुपहरिया से रोमांस का तजुर्बा जिन्हें हो वे जानते होंगे कि धधकते सूर्य महाराज दरअसल दोस्त ज्यादा लगते हैं, किसी दुख-दुर्दशा की वजह कम. दुनियादार लोग छिपने, पड़े रहने, सो जाने को बाध्य हुए पड़े हों और हम दिल हूम हूम करे गाते हुए भांय भांय बोलते सन्नाटे वाले रास्ते को उपलब्ध हों. फिर नौजवान धूप के कड़क तेवर संग कदमताल करते बाग बगीचा लांघते किसी पेड़ के नीचे किसी उपन्यास के पात्रों संग जीते मरते कई घंटों तक खुद की देह से निर्वासित रहें.

गर्मी की छुट्टियां वैसे तो ज्यादातर मध्यवर्गीय शहरियों के लिए ओह उफ्फ हाय का सबब होती हैं लेकिन मेरे लिए रोमांच और पुर्नजीवन का मौसम. खड़ी दुपहरिया से रोमांस का तजुर्बा जिन्हें हो वे जानते होंगे कि धधकते सूर्य महाराज दरअसल दोस्त ज्यादा लगते हैं, किसी दुख-दुर्दशा की वजह कम. दुनियादार लोग छिपने, पड़े रहने, सो जाने को बाध्य हुए पड़े हों और हम दिल हूम हूम करे गाते हुए भांय भांय बोलते सन्नाटे वाले रास्ते को उपलब्ध हों. फिर नौजवान धूप के कड़क तेवर संग कदमताल करते बाग बगीचा लांघते किसी पेड़ के नीचे किसी उपन्यास के पात्रों संग जीते मरते कई घंटों तक खुद की देह से निर्वासित रहें.

सबसे करीब और करीबी अपना गमछा लगता है, जिसे आप कपड़े का एक सीधा सरल टुकड़ा भले कह लें पर अपन के लिए यह बहुरुपिया किसी साथी से कम नहीं. सर से लेकर पांव तक, सूखे से लेकर गीले तक, विविध रूप-रंगों में यह साथ काम आता है और निष्प्राण होते हुए भी बता जाता है कि दरअसल तुम मनुष्य हो निरे बुद्धू. इतनी सी बात भी न समझ पाए कि तुम्हारे सबसे करीबी वो हैं जो तुमसे संवाद नहीं करते या जो चुपचाप तुम्हें सब कुछ देते मुहैया कराते हैं. दबे पांव जीभ निकाले पीछे पीछे चला आ रहा मेरा सहयात्री कुत्ता जताता ही नहीं कि वह बारीक नजर रखे हुए हैं बाकी खतरों आशंकाओं पर. वह कभी ठहर कर दोनों कान खड़े कर दूर दूर तक की तरंगें पकड़ डिकोड करता है कि कौन इसमें खतरे वाली हैं और कौन शुभ शुभ. वह अपनी तईं आरपार का निर्णय लेकर चीजों को इस पार या उस पार कर चुपचाप मुझे फालो करता चलता रहता है. कभी वही बहुत तेज किसी झुरमुट की तरफ दौड़ता नजर आता तो कभी ठहर कर किसी तरफ मुंह उठा कर गुर्राता भोंकता.

जब लोग हवाओं को लू का नाम देने लगते हैं तो किसी बरगद पीपल तले विविध भारती पर मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम सुनते कब सूरज गुडबाय बोल पश्चिम में लटक जाते हैं, पता ही नहीं चलता. झींगुर की चीं चां और सियारों के हुआं हुआं के बीच रात पौने नौ बजे आकाशवाणी के वाराणसी केंद्र से प्रसारित समाचार संध्या से देश दुनिया के थोड़े बहुत शुभ अशुभ हाल जान उस पर विचारने मथने की शुरुआत करते ही हैं कि सरसराती मीठी हवाओं की थाप से शरीर का साथ छोड़ दिमाग किसी दूसरी दुनिया में चला जाता है जहां से वापिस सुबह पांच साढ़े पांच बजे तब आता है जब सूरज गुडमार्निंग कह मुस्कराते हुए सिर पर खड़ा हो चुका होता है. सच कहूं तो सुनता पढ़ता बहुत दिनों से था कि जो तुम तलाश रहे हो वह तुम्हारे ही पास है, कहां भटकते फिरते हो लेकिन इसे जी पाना मेरे लिए इन दिनों की ही बात है. ऐसे ही दिन रात वाले किसी एक क्षण के एकांत में यह महान सिंगल सिंगर शूटिंग संपन्न हुई… 🙂

गाने का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=af8jzVmZcwI

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के संपादक हैं. संपर्क: [email protected]

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1 Comment

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  1. krishna murari

    June 4, 2016 at 9:05 am

    सबसे करीब और करीबी अपना गमछा लगता है, जिसे आप कपड़े का एक सीधा सरल टुकड़ा भले कह लें पर अपन के लिए यह बहुरुपिया किसी साथी से कम नहीं. सर से लेकर पांव तक, सूखे से लेकर गीले तक, विविध रूप-रंगों में यह साथ काम आता है और निष्प्राण होते हुए भी बता जाता है कि दरअसल तुम मनुष्य हो निरे बुद्धू.

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