आग अख़बार के फाउंडर हैदर अली का इंतेक़ाल

-नवेद शिकोह-

उत्तर प्रदेश के जाने-पहचाने उर्दू अखबार “आग” के फाउंडर हैदर अली का शनिवार की रात इंतेक़ाल हो गया। एरा मेडिकल कॉलेज ग्रुप के पब्लिकेशन उर्दू दैनिक आग और हिन्दी दैनिक इन्किलाबी नज़र का मैनेजमेंट देखने के साथ वो मान्यता प्राप्त राज्य मुख्यालय पत्रकार भी थे।

51 वर्षीय हैदर साहब करीब पिछले तीन साल से कैंसर से पीड़ित थे। शुरुआत में वो मुंबई स्थित टाटा अस्पताल और दिल्ली भी इलाज करवाने गये, इसके बाद वापस लौटकर वो लखनऊ में कैंसर से लड़ रहे थे।

वो अपने पीछे दो बेटों और बूढ़े मां-बाप को छोड़ गये। आज इतवार सुबह ठाकुरगंज स्थित अब्बास बाग़ की कर्बला में मरहूम को सुपुर्दे ख़ाक किया जायेगा।

अखबार की दुनिया की ये आलराउंडर शख्सियत आग जैसी थी, जिसे कहीं भी लगा दो धधकने लगती थी। एडोटोरियल, डीटीपी, फोटो प्रोसेसिंग, प्रिंटिंग, सैर्कुलेशन, मार्केटिंग, ब्रॉन्डिंग, एच.आर, एकाउंट.. जैसे प्रबंधन के हर हुनर में वो माहिर थे।

करीब 13-14 बरस पहले हैदर अली साहब से पहली बार मुलाकात हुई थी। मैं एक इवनिंगअखबार मे संपादक था। वहां के हालात खराब हो चुके थे। मेरे पास बहुत आफर थे लेकिन बचे-खुचे नये लड़कों को कहीं एड्जस्ट करने की फिक्र थी। मित्र और सीनियर साथी शाहिद ख़ान भी नये नये शुरू हुए उर्दू आग चले गये थे। फिर मुझे बुलाया गया। मैं राजी नहीं हुआ, क्योंकि उर्दू सहाफत से मेरा कोई वास्ता नहीं था।

बताया गया कि आग के साथ एक हिंदी पुलाउट लॉन्चिंग के लिए मालिक ने आपको बुलाया है। मैंने इवनिंग अखबार में संपादक की जिम्मेदारी नामचीन वरिष्ठ पत्रकार रवि वर्मा साहब को सौंपी। आग के आफिस पंहुचा तो वहां एडोटोरियल के दो वरिष्ठ साथी थे। एक मित्र शाहिद ख़ान और कभी मेरे वरिष्ठ रहे अशोक त्रिपाठी जी। इसके अलावा एक आग जैसी अंजान शख्सियत दिखी। उनका नाम हैदर अली था।

वो सारा मैंनेजमेंट देखते थे। उन्हें देखकर ताजुब होता था कि ये शख्स जो मेडिकल कालेज का मुलाजिम रहा है और कल तक अखबार के बारे में कुछ नहीं जानता था वो जुनून के साथ किस तरह अखबार निकालने के हर संघर्ष के आगे डटा है। जब तक मशीन नहीं लगी थी। ऐशबाग स्थिति राष्ट्रीय स्वरूप की मशीन में आग और नजर छपता था।
शुरुआती दौर में हैदर साहब पूरी रात मशीन पर रहते थे, फिर सुबह तड़के सेंटर चले जाते थे। और फिर शाम को काम पर लग जाते थे।

नजर की लॉन्चिंग की तैयारी के दिनों में मैं कभी-कभी उन्हें सुबह ग्यारह बजे से पहले बुला लेता था। मुझे एडोटोरियल स्टॉफ के लिए कुछ पुराने लोगों की भर्ती के लिए उनसे डिस्कस करना होता था।

जो शख्स दिनभर काम करता था, रात भर मशीन पर रहता था, सुबह सेंटर चैक करने जाता था और घर सुबह पंहुचता था। फिर भी उन्हें सुबह बुला लो तो फौरन चले आते थे। बड़े काम के थे इसलिए इतनी जल्दी ऊपर भी बुला लिये गये।

सचमुच हैदर भाई एक मिसाल थे। वो आग थे.. अख़बारी इंन्क़िलाब थे।

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