Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

एक मजबूर पत्रकार मजदूर दिवस पर चला गया!

नवेद शिकोह-

पत्रकार आखिर मजदूर दिवस क्यों मनाते हैं? क्या पत्रकार मजदूर होता है? मजदूर दिवस पर पत्रकारों में अक्सर ऐसी बहस छिड़ती है। निष्कर्ष कभी नहीं निकलता। लखनऊ के खुद्दार सहाफी फैज़ान मुसन्ना ने आज मजदूर दिवस पर बेबसी की मौत के साथ दुनिया से रुखसत होकर इस पुरानी बहस को निष्कर्ष पर ला दिया। बीमारी ऐसी थी कि मंहगे इलाज की जरूरत थी। दुनिया वाले, कौम वाले और हम पेशा बिरादरी इलाज की भारी रकम का इंतेजाम नहीं कर सकी, और फैजान साहब ने बिना गिला-शिकवा किए दुनिया को अलविदा कह दिया।

अभी कुछ दिनों पहले अपने बड़े भाई हुसैन अफसर साहब, सीनियर सहाफी की अपील पढ़ कर हम सबने मिल कर उनके लिवर ट्रांसप्लांट के लिए लगभग 4.50 लाख रुपए उनके खाते में जमा कराए थे लेकिन ज़रूरत 15 लाख की थी जिसके लिए मुख्यमंत्री कोष में अप्लाई करना था जो आचार संहिता के कारण इलेक्शन के बाद ही संभव था।

फैज़ान भाई ने बड़ी लड़ाई की लेकिन अंततः वो हार गए । उनकी फेसबुक वाल उनकी निराश और हताशा बयान करती है। ये वक़्त इस बात को सोचने का है कि समाज का। चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता के कुलीन व्यवसाय में ऐसे ईमानदार पत्रकारों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा के प्रबंध क्यों नहीं है? उनके मुफ्त इलाज की सुविधाएं क्यों नहीं हैं? क्यों उनको अप्रशिक्षित मज़दूरों से भी कम वेतन मिलता है? क्यों समाज उनके।साथ नहीं आता।

फैज़ान मुसन्ना की मौत एक प्रहार है उन सभी के मुंह पर, जो पत्रकार होने का दम्भ भरते हैं और अपने साथी को मरने देते हैं। ये मौत, न केवल एक ईमानदार पत्रकार की धनाभाव और मुफलिसी के कारण हुई मौत है, बल्कि दोस्ती, ब्यवहारिकता, सामाजिक मूल्यों, रिश्तों की मौत है।

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि फैज़ान भाई, हम अपने सभी संभव प्रयासों के बाद भी आपको बचा न सके।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन