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प्रेस फ्रीडम डे : हंस पत्रिका के इस दुर्लभ अंक में दर्ज पत्रकार अब कितने ‘फ्री’ रह गए हैं?

मनीष दुबे-

ज ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ है, जिसे मनाने के लिए हम अब सोशल मीडिया तक सीमित रह गए हैं. लेकिन क्या सही मायनो में आज पत्रकरिता उतने ही फ्रीडम में है जितनी 10-12 साल पहले हुआ करती थी. आवाज आएगी.. नहीं. तो दिमाग पर जोर डालिए और सोचिए कि ऐसा क्या और क्यों हुआ. दलाली और विज्ञापन की गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच वो पत्रकारिता कहां गुम हो गई जो पहले हुआ करती थी. बिकाऊ मीडिया से गोदी मीडिया तक का सफर किसने और कैसे तय किया, ये भी यक्ष प्रश्न है.

ऐसे में मुंशी प्रेमचंद्र द्वारा स्थापित (1930) ‘पत्रिका हंस का एक दुर्लभ संस्करण’ याद आता है, जो राजेंद्र यादव के संपादक रहते बेहद मेहनत के बाद प्रकाशित हुआ था. जनवरी 2007 के इस हंस पत्रिका के अंक में उस वक्त के चुनिंदा पत्रकारों ने अपनी लेखनी से छाप छोड़ी थी. लेकिन तब से अब तक पत्रकारिता बहुत बदल गई है. सही मायनो में पत्रकारिता राजनीति की भेंट चढ़ गई है. कुछ खुद ही बिक गए तो कुछ दबाव बनाकर खरीद लिए गए. जो नहीं बिके उनका इतिहास बनेगा.

बहरहाल आप हंस पत्रिका का साल 2007 में प्रकाशित ये दुर्लभ अंक देखें और पढ़ें कि किन-किन पत्रकारों के नाम इसमें दर्ज हैं. और इनमें से आज कितने ‘फ्री’ रह गए हैं.

कठपुतलियों का खेल : राजेन्द्र यादव
प्रेत पत्रकारिता : विजय विद्रोही, आज तक
ब्रेकिंग न्यूज़ : राणा यशवंत, आज तक
डर लागे अपनी उमरिया से : राकेश कायस्थ, जब तक
खेल : संगीता तिवारी, स्टार न्यूज
दीवारें फांदते स्पाइडरमैन : रवीश कुमार, एनडीटीवी

एक एंकर का इश्क : शाज़ी ज़मां, स्टार न्यूज़
कैसी-कैसी लड़कियां : प्रियदर्शन, एनडीटीवी
बम विस्फोट : संजीव पालीवाल, आईबीएन 7
काटो… काटो… काटो : दीपक चौबे, आईबीएन 7
स्याह-सफेद : शालिनी जोशी, बॉबीसी
फ्राइडे : अजीत अंजुम, बीएजी फिल्म्स

उसका लौटना : राजेश बादल, बीएजी फिल्म्मा
एक दूजे के लिए : प्रमिला दीक्षित, आज तक
गुरुदेव : अविनाश, एनडीटीवी
होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे : अमिताभ, आजक
टारगेट : मुकेश कुमार, स्वतंत्र
कितने मरे : विनोद कापड़ी, स्टार न्यूज़

ट्रैकशॉट : संजय नंदन, स्टार न्यूज
सिंडिकेट : प्रभात शुंगलू, आईबीएन 7
यू टर्न : नीरेंद्र नागर, आज तक
अनुभव की अभिलाषा : रवि पाराशर, जी न्यूज़
कथा अनंता : पम्मी बर्थवाल, स्वतंत्र
मृगमरीचिका : आशुतोष, आईबीएन 7

उबकाई : रवीन्द्र त्रिपाठी, बीएजी फिल्म्स
कौवे : गोविंद पंत रेस्तरां, आज तक
डर : देव प्रकाश, आईबीएन 7
विस्फोटक : सुधीर सुधाकर, बीएजी फिल्म्स
दिव्या, मेरी जान : पंकज श्रीवास्तव, स्टार न्यूज़
मैनेजर जावेद हसन : इकबाल रिज़वी, आईबीएन 7

आमने -सामने

ख़बरें-खबरों से लड़ती हैं : कमर वहीद नक्वी
हम पागल हो गए हैं : राजदीप सरदेसाई
दर्शक जो देखेगा, दिखाएंगे : उदयशंकर
यह न्यूज़ चैनलों की अंगड़ाई का दौर है : दिबांग

आधी-ज़मीन

टीवी पत्रकारिता में स्त्री : अलका सक्सेना

तमाशा मेरे आगे

औरतें करती हैं मर्दों का शोषण : वर्तिका नंदा
खूबसूरत लड़कियां भी मेहनत करती हैं : श्वेता सिंह
दर्शकों की पसंद महिला एंकर्स : रूपाली तिवारी
शक्ल ठीक मतलब नहीं कि अक़्ल बुरी : शाज़िया इल्मी
अरे, आज बहुत काम कर रही हो : ऋचा अनिरुद्ध

विमर्श

चालाक और हमलावर मीडिया : रामशरण जोशी
समाचार चैनल उर्फ जनता क्या चीज़ है : आनंद प्रथान

पंचायतनामा

स्टिंग ऑपरेशन पर हायतौबा क्यों : अजीत अंजुम
समाज और बाज़ार के वीच समाचार : पुष्पेन्द्रपाल सिंह

अंदाज़-ए-हकीकत

अखबार और टीवी न्यूज़ : अरुण पांडेय
डीडी न्यूज़ की रामकहानी : वीरेंद्र मिश्र
बाज़ार के लोकतंत्र में चैनल : आलोक पुराणिक

विकल्प

अलजजीरा की चुनौती : मुकेश कुमार
लघुकथाएं : समरेन्द्र सिंह

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