
मनीष दुबे-
दिल्ली के करीब आधा दर्जन मीडियाकर्मियों के साथ अप्रैल 2016 को एक वाकया हुआ। देश की राजधानी में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार का ज़ोर था। पार्टी के नेता और सलाहकार जीत के जोश में थे, सत्ता की ताकत का रस चख चुके थे। जो पत्रकार उनकी हाँ में हाँ मिलाते, उन्हें इनाम में ‘एक्सक्लूसिव खबरें’ मिलतीं, और जो सवाल पूछते या खिलाफत में लिखते, उसे ग्रुप से बाहर किया जाने लगा!
18 अप्रैल 2016 को दिल्ली सरकार के तीन महत्वपूर्ण व्हाट्सएप ग्रुपों से आधा दर्जन पत्रकारों को निकाल बाहर कर दिया गया। ये वो ग्रुप थे जिनमें सरकारी सूचनाएँ सीधे तौर पर पत्रकारों तक पहुँचती थीं। ABP न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार जैनेंद्र कुमार, NDTV के पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला, आजतक के राहुल मिश्र, दैनिक जागरण के विजयेंद्र शर्मा, PTI के मनोज जोशी और इंडियन एक्सप्रेस के संदीप ठाकुर को बिना कोई कारण बताए ग्रुप से हटा दिया गया।
निकालने की असली वजह क्या थी?
असल में ये पूरा मामला रवीश रंजन शुक्ला के एक ब्लॉग से जुड़ा था, जिसका शीर्षक था – “सवालों पर आंखें तरेरते सरकारी सलाहकार”
इस ब्लॉग में उन्होंने दिल्ली सरकार के मीडिया सलाहकारों पर निशाना साधते हुए लिखा था: “प्रिय सलाहकारों, आप संदेशवाहक (पत्रकार) को निशाना बनाते रहिए और उन्हें गंदे नामों से नवाजते रहिए… दिल्ली, बधाई हो कि तुम्हारे पास ऐसे सलाहकार हैं।”
यह ब्लॉग दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद लिखा गया था, जिसमें मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मीडिया सलाहकार नागेंद्र शर्मा ने रवीश रंजन शुक्ला के सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया था।
शुक्ला ने सीधे-सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र नहीं किया, लेकिन उनकी पोस्ट ने सरकार के अंदर खलबली मचा दी। नतीजा? उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप से बाहर कर दिया गया।

इसके बाद ABP न्यूज़ के जैनेंद्र कुमार ने जब इस मामले का स्क्रीनशॉट ट्विटर पर साझा किया, तो सरकार के खिलाफ प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया। देखते ही देखते आजतक, दैनिक जागरण, PTI और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों को भी ग्रुप से बाहर कर दिया गया।
AAP के मीडिया सलाहकारों की प्रतिक्रिया : “हमारे ग्रुप, हमारी मर्ज़ी!”
नागेंद्र शर्मा ने सफाई दी: “दिल्ली सरकार का कोई आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप नहीं है। ये ग्रुप मेरे सहयोगियों – अरुणोदय प्रकाश और अमरदीप तिवारी – द्वारा निजी तौर पर चलाए जाते हैं। ये उनके निजी नंबर हैं और वे अपने हिसाब से तय कर सकते हैं कि ग्रुप में किसे रखना है और किसे नहीं।”
अरुणोदय प्रकाश ने तर्क दिया: “मैं खुद 12 साल तक पत्रकार रहा हूँ। यह ग्रुप मैंने पत्रकारों की सुविधा के लिए बनाया था, लेकिन यह कोई सरकारी मंच नहीं है। कुछ लोग झूठी बातें फैला रहे हैं। हम मीडिया के प्रति पूरी तरह सहयोगी हैं, चाहे सुबह 7 बजे हो या रात 12 बजे।”
हालांकि, सच यह था कि आम आदमी पार्टी तब जीत के नशे में थी और उसे आलोचना बर्दाश्त नहीं थी।
फरवरी 2025 : अब जनता ने AAP को ही “रिमूव” कर दिया!
आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता से बाहर हो चुकी है। तब जो पार्टी पत्रकारों को व्हाट्सएप ग्रुप से निकाल रही थी, आज जनता ने ही उसे ‘रिमूव’ कर दिया।
अब कोई प्रवक्ता व्हाट्सएप ग्रुप का “एडमिन” बनने का घमंड नहीं कर रहा। अब कोई मीडिया सलाहकार पत्रकारों को ब्लॉक नहीं कर रहा। अब वे खुद मीडिया से छिपते फिर रहे हैं, हार के बाद स्पष्टीकरण देने को मजबूर हैं।
किसी ने ठीक ही कहा है – “व्हाट्सएप ग्रुप से हटाने से सत्ता की उम्र नहीं बढ़ती, उसे बचाने के लिए जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है।”
तो क्या सिखाया इस पूरे घटनाक्रम ने?
2016 में पत्रकारों को बाहर करने वाली सरकार ने 2025 में खुद को बाहर पाया। ये बताता है कि–
- सत्ता स्थायी नहीं होती, घमंड का अंत होता ही है।
- पत्रकारों को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि इतिहास उन्हें और धारदार बना देता है।
- और सबसे अहम – जनता ही असली “एडमिन” होती है।
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