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आज के अखबार : आस्था पर आघात… और लाल कपड़ा लेकर रेल पटरियों पर अमर उजाला की दौड़

संजय कुमार सिंह

आज अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, आस्था पर आघात … गाय की चर्बी, मछली के तेल से बन रहा था तिरुपति का प्रसाद। यह खबर मेरे सात अखबारों में सिर्फ अमर उजाला में लीड है। हिन्दी के दूसरे अखबार, नवोदय़ टाइम्स में यह लीड के बराबर में टॉप पर, दो कॉलम में है। अखबार ने खबर के साथ मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की फोटो के साथ उनके बयान को उपशीर्षक बनाया है, हम शुद्ध की का इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी एक तरफ प्रयोगशाला रिपोर्ट के हवाले से आस्था पर आघात की खबर और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री का आश्वासन कि हम शुद्ध घी का इस्तेमाल कर रहे हैं (चर्बी का प्रयोग पहले होता था)। यह खबर अंग्रेजी के किसी अखबार में लीड नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में चार कॉलम में और टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक वही है जो मामला है, तिरुपति लड्डू के घी में लार्ड (सुअर की चर्बी का अंश), टैलो (पशुवसा) : प्रयोगशाला रिपोर्ट।  

इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, “तिरुपति के लड्डुओं पर आंध्र प्रदेश में हंगामा : टीडीपी के लोकेश ने कहा घी में फिश ऑयल, बीफ टैलो”। यहां शीर्षक से साफ है कि मामला राजनीति का है और उसमें अगर प्रसाद में जानवरों की चर्बी का उपयोग हुआ है तो यह आस्था का मामला हो सकता है। लेकिन प्रयोगशाला की रिपोर्ट अंग्रेजी में है और फिश ऑयल को हिन्दी में मछली का तेल लिखा गया है। मैंने रेपसीड की हिन्दी ढूंढ़ी उसका मतलब सफेद सरसो लिखा है। इसपर मुझे वह गाना याद आया, इंग्लीश इज़ अ वेरी फन्नी लैंग्वेज। पर यहां मेरा मकसद टैलो और लार्ड का बचाव करना नहीं है। हालांकि, इसपर मुझे खाद्य वस्तुओं में मिलावट की एक पुरानी घटना याद आ रही है। तब वनस्पति तेल के एक लोकप्रिय ब्रांड में जानवरों की चर्बी मिली होने की खबर आई थी। इसके बाद सरसो तेल में मिलावट का मामला भी सामने आया था। तब कहा गया था कि एक लोकप्रिय ब्रांड के सरसो तेल में मिलावट से लोगों को ड्रॉप्सी बीमारी का खतरा होता है। यह मामला कोई पहला नहीं था औऱ कहा जाता है कि 1877 में पहली बार इसका पता चला था।

आप इसे जैसे देखिये यह खाने-पीने की चीजों में मिलावट और व्यापारियों की मुनाफाखोरी का मामला है और इसे ऐसे ही देखा व रोका जाना चाहिये। यह मामला भी ऐसा ही है। मिलावट तेल या घी में है। जांच लड्डू की हुई है और इसलिए लड्डू में भी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लड्डू बनाने या बनवाने वाले मिलावट कर रहे थे या मुनाफाखोरी कर रहे थे। आस्था से खिलवाड़ तो वो नहीं ही कर रहे थे। हां, सरकार का काम है यह सुनिश्चित करना कि खाद्य पदार्थों में मिलावट न हो और मिलावट वाला तेल बाजार में है तो वह मिलावट का मामला है, आस्था का नहीं लेकिन अखबार के लिए लीड तय करना एक मुश्किल काम है। आमतौर पर अखबार वाले अपना काम ठीक नहीं करते हैं। इसलिए दूसरों के काम को भी नहीं देखते हैं। नौकरी करना अलग बात है।

सच यह है कि मिलावट के मामले बंद नहीं नहीं हुए हैं। सरकार की कोशिशों और दिखावों के बावजूद जारी है। मिलाई वही चीज जाती है जो मिल जाये, आसानी से पता नहीं चले। सरकार और सरकारी विभागों का काम है कि समय-समय पर बाजार में बिक रहे उत्पादों की जांच हो और उपभोक्ताओं को शुद्ध उत्पाद मिलना सुनिश्चित किया जाये। लेकिन मोटा चंदा लेने वाली सरकारें यह सब कैसे सुनिश्चित करेंगी? इलेक्टोरल बांड के खुलासे के समय तो खबर थी कि सरकारी नोटिस के बाद इलेक्टोरल बांड से भुगतान हुआ और नोटिस पर आगे कार्रवाई नहीं हुई। कायदे से इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिये थी। पर ना सरकार ने कोई कार्रवाई की और ना जनता ने मांग की या दबाव बनाया।

इसलिए लड्डू में चर्बी मिले होने की खबर से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। इन दिनों खबरों का जो हाल है उसमें बहुत सारी लीड को फॉलो नहीं किया जा रहा है। खबरों का फॉलोअप तो होता ही नहीं है। खोजी खबरों के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है, खतरा और जोखिम ऊपर से। खबरों पर कार्रवाई नहीं होना, लीपापोती और हिन्डबर्ग की तरह आरोप झेलने की अलग मजबूरी है। इसमें कितनी खबरें रोज छूट रही हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। घाटी में दस साल बाद वोट पड़े लेकिन खबर थी, एक देश एक चुनाव की। यह देश की राजनीति है जिसके मुखिया प्रशासन छोड़कर राजनीति ही करते हैं। आलम यह है कि राहुल गांधी को दादी का हालकरने और उनकी जीभ काटने पर ईनाम की घोषणा करने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कांग्रेस अध्यक्ष, मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी तो जवाब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिया।

कायदे से प्रधानमंत्री को संबोधित चिट्ठी का जवाब प्रधानमंत्री, उनके कार्यालय की ओर से सरकारी होना चाहिये। वे गृहमंत्री को यह काम सौंप सकते थे और तब गृहमंत्रालय की ओर से भी जवाब हो सकता था। अगर भाजपा को लगता है कि पत्र में राजनीति है और खुला पत्र था तो ऐसा माना जा सकता है लेकिन जो मुद्दे हैं उसका प्रशासनिक जवाब भी जरूरी है। राजनीति का विकल्प तो है ही। वह तो 10 साल से चल रहा है और अब रेल दुर्घटनाओं को भी साजिश कहा जाने लगा है। मुद्दा यह है कि साजिश रोकना भी सरकार का ही काम है। आतंकवाद साजिश ही है और सरकार हाथ-पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकती है। अमेरिका का उदाहरण सामने है कि एक वारदात के बाद दूसरी नहीं हुई है। लेकिन यहां लापरवाही को साजिश से ढंकने की कोशिशें चल रही हैं। इसी सरकार में रेल दुर्घटना की जांच रेल सुरक्षा आयुक्त से नहीं करवाकर सीबीआई से करवाई गई। पर दुर्घटनाएं कम नहीं हुईं। आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर चार कॉलम की एक खबर है, “अब यूपी के रामपुर में जनशताब्दी पलटाने की साजिश”। उपशीर्षक है, “ट्रैक पर मिला खंभा, लोको पायलट ने आपातकालीन ब्रेक लगाकर रोकी ट्रेन।”

खबर में सिर्फ घटना का विवरण है, साजिश का नहीं और इसलिए जाहिर है, साजिश आशंका हो सकती है। असल कारण कुछ और हो सकता है। साजिश की खबर पहले पन्ने पर चार कॉलम में छपती जब साजिश कामयाब नहीं हुई तब चार कॉलम की खबर साजिश की कहानी को जायज बनाने और लोगों को इसका यकीन दिलाने की कोशिश हो सकती है। वरना दुर्घटना के बाद सीबीआई की जांच में क्या मिला और उससे निपटने के लिए क्या किया गया या नहीं किया गया वह खबर होती। यही नहीं, अगर साजिशों के कारण रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं तो उन्हें रोकने, पकड़ने के लिए काम होना चाहिये और खबर इसपर होनी चाहिये कि सरकार इस दिशा में क्या कर रही है। अखबारों का काम यह नहीं है कि सरकार की सोच और बचाव को प्रचार दे। अखबारों का काम है सरकार के काम का प्रचार करना या बताना कि सरकार को इस कारण से ऐसा करना चाहिये, इसे रोकने की कोशिश करनी चाहिये इसके लिए सरकार ये कर रही है या नहीं कर रही है। पर अखबारों की यह मजबूरी या सेवा रेखांकित की जाये तो लोगों को अघोषित इमरजेंसी का अहसास होगा।   

आज की दूसरी प्रमुख लीड पन्नून मामले में अमेरिकी कोर्ट द्वारा सरकार, एनएसए को समन किये जाने की है। भारत ने कहा है कि यह अनावश्यक है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लगभग इसी शीर्षक से लीड है। फ्लैग शीर्षक है, खालिस्तान समर्थक की हत्या की ‘साजिश’। उपशीर्षक है, इस मामले से जुड़ा व्यक्ति गैरकानूनी संगठन का प्रतिनिधित्व करता है। मुझे लगता है कि इस कुतर्क में कोई दम नहीं है। अव्वल तो हत्यारे की हत्या आप नहीं कर सकते हैं। यहां आरोप हत्या करवाने की साजिश का है और इसका बचाव नहीं किया जा सकता है। आत्मरक्षा में हत्या हो जाये तो यह सुनिश्चित किया जायेगा कि हत्या बचाव में ही है डर कर नहीं की गई है। वैसे तो य़ह कानूनी मामला है लेकिन सबको पता होना चाहिये कि मां, बच्चे को जन्म देने के बाद मार नहीं सकती है। इसलिए अगर हत्या की कोशिश का मामला है तो है। सरकार की इस दलील से और भी शंका होती है कि कहीं पन्नून के मामले में भी ‘बुलडोजर न्याय’ तो नहीं किया जा रहा था और अगर किया जा रहा हो तो मामला सही ही है पर खबर बड़ी है और अमर उजाला ने आस्था के मामले को महत्व दिया है।

यह खबर आज नवोदय टाइम्स में लीड है पर मूल खबर की बजाय सरकार का पक्ष ही शीर्षक है। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में ही सरकार का भी पक्ष रखा है लेकिन नवोदय टाइम्स ने सरकार के ही पक्ष को शीर्षक बनाया है। दोनों अलग चीजें हैं। अखबार अपने विवेक से काम करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसमें वे किसी को बदनाम भी कर सकते हैं और पीड़ित के पास कोई राहत नहीं है। जो कुछ व्यवस्था है उसमें राहत पाना बहुत मुश्किल है और जो बदनामी हो जाती है उसे खत्म नहीं किया जा सकता है। आजकल अखबार सरकार की बदनामी नहीं करते, नागरिकों की हो जाये तो चलता है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है, अधपन्ने पर लीड के साथ तीन कॉलम में हैं। शीर्षक है, भारत ने पन्नून (के मामले में) आरोपों को खारिज किया। लीड प्रधानमंत्री के अमेरिकी दौरे से संबंधित है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर अधपन्ने पर है और यहां तो सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, पन्नून मामले में मुकदमा अनावश्यक है, केंद्र ने कहा। हिन्दू में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, अमेरिकी कोर्ट के समन जारी करने के बाद भारत ने कहा पन्नून मामला निराधार है।

आपको याद होगा कि अमेरिका में खालिस्तानी नेता  गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोपी भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता को चेक रिपब्लिक से प्रत्यर्पण के बाद अमेरिका ले जाया गया है। 52 वर्षीय निखिल गुप्‍ता के खिलाफ पिछले साल नवंबर में मुकदमा दाखिल किया था। गुप्ता पर भारत सरकार के एक कर्मचारी के साथ मिलकर खालिस्तानी अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने का आरोप है। पन्नून अमेरिका में रहते हैं और उनके पास अमेरिकी तथा कनाडा की दोहरी नागरिकता है। निखिल गुप्‍ता ने खुद पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। ऐसे में इस खबर की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

आज की तीसरी बड़ी खबर या लीड पश्चिम बंगाल में डॉक्टर्स की हड़ताल खत्म होना है। टेलीग्राफ के साथ आज यह हिन्दू में लीड है। अमर उजाला में यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, 42 दिन बाद जूनियर डॉक्टर्स की हड़ताल खत्म, आंदोलन जारी रहेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड आज बिल्कुल अलग है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने कश्मीर में प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार को लीड बनाया है। शीर्षक है, “मोदी ने कहा (मतदान के लिए) ज्यादा लोगों की भागीदारी से नये कश्मीर का पता चलता है”। आप जानते हैं कि एक देश, एक चुनाव के प्रयास और प्रचार के बीच कश्मीर में 10 साल बाद चुनाव हो रहे हैं और यह 370 हटाने पर पहला जनादेश होने वाला है। भाजपा ने राज्य में लोकसभा के कई सीटों पर चुनाव लड़ा ही नहीं, विधानसभा में भी कइयों पर नहीं लड़ रही है और यह 1996 के बाद सबसे कम सीटों पर है। राज्य में 90 सीटों के लिए तीन चरणों में मतदान है। पहले चरण का मतदान हो चुका है और प्रधानमंत्री ने जो कहा उसमें यह शीर्षक है। खबर में बताया गया है कि रात साढ़े ग्यारह बजे के आंकड़े के अनुसार 61.13 प्रतिशत मतदान हुआ था। 370 हटाने के बाद जब कश्मीर को भी भारत के दूसरे राज्यों की बराबरी में ले आना था तो पांच साल बाद मतदान का यह प्रतिशत बहुत ज्यादा तो नहीं है। लेकिन खबर है। मैं इसे संपादकीय विवेक कहता हूं। हालांकि, कहा प्रधानमंत्री ने है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर (प्रधानमंत्री का कश्मीर में चुनाव प्रचार) सेकेंड लीड है। इसके अनुसार, नरेन्द्र मोदी या प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस का जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान का एजंडा लागू नहीं करने देंगे। इस खबर का इंट्रो है, पाकिस्तान के मंत्री ने हाल में अनुच्छेद 370 को फिर से बहाल करने की नेशनल कांफ्रेंस की अपील का समर्थन किया था। कहने की जरूरत नहीं है कि अनुच्छेद 370 को हटाना भाजपा का मुद्दा था और कई साल से था। इसे उसने देश भर में भुनाया है और हटाने से उसे कश्मीर में कोई लाभ नहीं हुआ है। ऐसे में उसके पास कहने के लिए  कुछ और है नहीं तथा जो कहा उसमें से सर्वश्रेष्ठ को अखबारों ने लीड बनाया है। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, “जम्मू कश्मीर फिर से बनेगा राज्य : मोदी”। आप समझ सकते हैं कि राज्य में भाजपा की क्या हालत होगी। उसी ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाया। पांच साल ना कुछ किया ना लोगों की मांगों पर ध्यान दिया। अब चुनाव से पहले अपने ही किये को सुधारने के दावे पर वोट मांगना पड़ रहा है। आम तौर पर पत्रकार भाजपा नेताओं को सवाल पूछकर परेशान कर देते लेकिन भाजपा नेताओं से कोई सवाल नहीं पूछता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड दूरसंचार कंपनियों की अपील से संबंधित है। इसके अनुसार एक लाख करोड़ रुपये के बकाये की गणना फिर से करने की दूरसंचार कंपनियों की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। खबर के अनुसार वोडाफोन इंडिया और एयरटेल को यह राशि मार्च 2031 तक चुकानी होगी। वैसे तो यह बिजनेस पेज की खबर है और टेलीग्राफ ने इसे बिजनेस पेज पर भी लीड नहीं बनाया है। पर एक लाख करोड़ रुपये का मामला है और सुप्रीम कोर्ट की यह खबर एयरटेल तथा वोडाफोन के लिए बड़ा झटका है। सरकारी राजस्व से संबंधित फैसलों में सरकार की दिलचस्पी से संबंधित एक खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुख्य न्यायाधीश के घर पर गणेश पूजा करते प्रधानमंत्री की फोटो के साथ छापी थी और बताया था खनिज की रायल्टी के मामले में नौ जजों की पीठ के फैसले पर सरकार पुनर्विचार चाहती है। और अब यह खबर। इस बीच सरकार और प्रधानमंत्री तो मुख्यमंत्री के घर जाने का बचाव कर ही चुके हैं। कांग्रेस से भाजपा में गये, प्रोफेसर गौरव बल्लभ भी प्रधानमंत्री के बचाव में लेख लिखा है। पायनियर में छपा अपना लेख साझा करते हुए उन्होंने लिखा था, यह संविधान की सुरक्षा और देश के कल्याण की साझी प्रतिबद्धता है। मेरा मानना है कि लोकतंत्र के अगर चार पाये कहे जाते हैं तो यह दलील दी जा सकती है कि चारों मिलकर काम करें तो मजबूत हो जायेंगे पर पाया मजबूत होगा तो लोकतंत्र कैसे मजबूत होगा और यह पुल  के चार पायों को मिलाकर एक करने से होगा क्या। लेकिन गलत दलीलों से अपनी बात मनवाकर राजनीति करना, कामयाब रहना अलग खेल है और जनता की सेवा बिल्कुल अलग।

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