संजय कुमार सिंह
हेडलाइन मैनेजमेंट का सस्ता, फूहड़ और घटिया खेल जारी, इसके लिए विपक्ष को कुछ भी कहा जा सकता है। कहा जाता है ताकि खबर बने तो आरोप मजबूत लगे और विरोध किया जाए तो वो अपने काम नहीं पाएंगे
आज की कुछ प्रमुख खबरें हैं- 1) पश्चिम बंगाल में पहले चरण के लिए और तमिलनाडु में चुनाव प्रचार पूरा हुआ 2) कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है 3) आज पहलगाम हमले के एक साल हो गए, मारे गए लोगों की याद में स्मारक बना है 4) विदेशी कंपनी ने जेवर हवाई अड्डा बनाया विदेशी सीईओ नहीं रख सकती 5) मणिपुर में हिंसा जारी, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और केरल की पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट, सात मरे। इनके अलावा दो और खबरें हैं। इनमें एक अमेरिका-ईरान युद्ध से संबंधित है जो कई अखबारों में लीड है। दूसरी खबर ऐसी है जो मेरे एक ही अखबार, अमर उजाला की सेकेंड लीड है। हालांकि, कई अन्य में पहले पन्ने पर तो है ही। इसका शीर्षक है, खरगे ने मोदी को बताया आतंकी फिर दी सफाई, मैंने ऐसा नहीं कहा। उपशीर्षक है, कांग्रेस अध्यक्ष बोले – मैंने आतंकी नहीं बल्कि कहा था कि उनकी राजनीति भय पैदा करती है। पश्चिम बंगाल चुनाव के सिलसिले में भाजपा के कई विज्ञापन हैं जिनमें भाजपा ने भय दूर करने की बात की है। उसने तृणमूल की सरकार में भय यानी डर होने का आरोप लगाया है। बांग्ला में डर को भय ही कहते हैं। भाजपा पश्चिम बंगाल में सरकार बनने पर भरोसा कायम करने का वादा कर रही है। ऐसे में अगर खरगे की जुबान फिसल ही गई और प्रधानमंत्री के बारे में कुछ गलत कह ही दिया तो यह इतनी बड़ी खबर कैसे है?
खासकर तब जब वे मुकर गए या स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि मैंने ये नहीं वो कहा। मुझे लगता है कि आतंकवादी भी कहा तो गलत हो या नहीं, अखबार की नौकरी करने वालों को यह याद करना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस और कांग्रेस के लोगों के बारे में कब-कब क्या-क्या कहा है। आतंकवाद की कम से कम एक आरोपी को सांसद बनाया फिर वे मुकदमे से बरी हो गईं। इसी तरह, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के सभी आरोपी बरी हो गए, सरकार ने ऊपरी अदालत में अपील नहीं की। अदालत ने सीबीआई की जांच पर भी टिप्पणी की थी। पर ये सब पुराने मामले हैं। लेकिन पत्रकारिता की नौकरी करने वालों को पता होना चाहिए और भले आपकी नौकरी भाजपा सेवा की हो या भाजपा की सेवा के कारण ही हो तो भी, इसे पहले पन्ने पर छाप देना पर्याप्त होता, सेकेंड लीड बनाने की जरूरत नहीं थी। लेकिन भाजपा के हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रभाव है कि आज यह खबर कई अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। मणिपुर में हिंसा जारी है, भीड़ पुलिस से भिड़ गई और बुलडोजर न्याय करने वाली सरकार मणिपुर मामले में वर्षों से किंकर्तव्यविमूढ़ है फिर भी बंगाल में भरोसा कायम करने की बात कर रही है। ना चुनाव आयोग को परवाह है ना मीडिया को मतलब है। भाजपा चुनाव जीतने के लिए जो सब कर रही है या आतंकवाद के मामलों में उसका जो रुख रहा है उसमें सरकार के प्रमुख को विपक्षी दल के प्रमुख ने अगर आतंकी कह दिया तो यह याद रखा जाना चाहिए कि कंप्रोमाइज्ड और सीआईए प्लांट भी कहा जा चुका है। उसपर कोई विरोध नहीं है, जवाब नहीं है। सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है और मधु किश्वर के खिलाफ भी कार्रवाई सरकार या भाजपा ने नहीं शुरू की है। किसी अधिवक्ता की एफआईआर है और यह घोषित तौर पर भाजपा की ओर से नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के अध्यक्ष (कौन हैं, कैसे हैं और कब बने आप जानते हैं) ने कहा है कि अपनी इस बात (या प्रधानमंत्री के अपमान) के लिए कांग्रेस अध्यक्ष खरगे माफी मांगें। अमर उजाला ने बताया है कि नितिन नवीन ने कहा, आतंकी जैसे शब्दों का इस्तेमाल कांग्रेस की गिरती राजनीति की पराकाष्ठा है। …. नितिन नवीन ने और भी बहुत कुछ कहा है लेकिन जो दिलचस्प या विवादास्पद है वह है, ….. जनादेश का अनादर है, जिन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पीएम मोदी को चुनकर अपना विश्वास जताया है। भाजपाई योजना और प्रचार शैली की यह खबर आज नवोदय टाइम्स में करीब तीन कॉलम में है। देशबन्धु में यह खबर सिंगल कॉलम में है और इसका शीर्षक है, खरगे के बयान पर भाजपा ने किया पलटवार। असल में भाजपा के कई प्रवक्ता और नेता इस मामले में कूद पड़े हैं। टाइ्म्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम की खबर है। शीर्षक है, खरगे ने प्रधानमंत्री को ‘आतंकी’ कहा, भाजपा ने बिना शर्त माफी की मांग की। इंडियन एक्सप्रेस में यह तीन कॉलम में है। शीर्षक है, खरगे ने प्रधानमंत्री को आतंकी कहा, स्पष्ट किया; भाजपा ने आलोचना की, आज चुनाव आयोग से मिलना है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, ‘आतंकी’ (कहने का विवाद): प्रधानमंत्री पर खरगे की टिप्पणी चुनाव आयोग को शिकायत का कारण बनी। द हिन्दू, द टेलीग्राफ और दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।
मुझे लगता है कि भाजपा ने महिला आरक्षण के मामले में संसद का विशेष सत्र बुलाकर, उसे परिसीमन से जोड़कर जल्बाजी में पास कराने की जो चाल चली उसमें कांग्रेस का नाराज होना स्वाभाविक है और कांग्रेस को इसका विरोध करने का पूरा हक है। निश्चित रूप से शब्दों का चयन सोच समझ कर किया जाना चाहिए लेकिन उसकी अपेक्षा दोनों तरफ से है। अखबारों का काम है कि वे वास्तविकता रिपोर्ट करें और राय बताएं तो बता दें कि उनकी राय है लेकिन खबरों में पक्षपात नहीं हो। वास्तविकता ऐसी नहीं है। भाजपा विपक्ष को महिला विरोधी बताने की कोशिश कर रही है और आरक्षण का श्रेय लेने की कोशिश भी की है। मेरा मानना है कि इसकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और संतुलित नहीं हुई है। आज भी नहीं है। जहां तक महिला आरक्षण का मामला है, इसकी शुरुआत कांग्रेस ने की थी और तब उसे विपक्ष का समर्थन नहीं मिला। अब कांग्रेस समर्थन देने को तैयार है लेकिन उसके समर्थन का उपयोग कहीं और करने की कोशिश है। तथ्य यह है कि महिला आरक्षण का विचार नया नहीं है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण अनिवार्य किया जा चुका है। संसद और विधानसभाओं में आरक्षण देने का विधेयक पहली बार 1996 में पेश किया गया था, लेकिन राजनीतिक सहमति के अभाव में यह वर्षों तक लंबित रहा।
पंचायती राज संस्थाओं में महिला आरक्षण के मिश्रित लेकिन महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, इससे बड़ी संख्या में महिलाएं पहली बार राजनीतिक प्रक्रिया में आईं, स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी बढ़ी और शिक्षा, स्वास्थ्य व जल जैसी बुनियादी मुद्दों पर ध्यान बढ़ा।
हालांकि, “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियां भी सामने आईं, जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति और परिजन निर्णय लेते देखे गए। इसके बावजूद, कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि समय के साथ महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि हुई है। इससे देश और जनता को क्या लाभ हुआ, जन प्रतिनिधियों की गुणवत्ता में सुधार और उसके लाभ या हानि पर चर्चा भी मुद्दा होना चाहिए था लेकिन वह सब नहीं रहा और अचानक 12 वर्षों बाद इसे पास कराने की कोशिश शुरू कर दी गई। हालांकि, महिला आरक्षण लागू न हो पाने के कई कारण बताए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं—राजनीतिक दलों के बीच सहमति की कमी, आरक्षण के भीतर आरक्षण (जैसे ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा) की मांग, और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन (परिसीमन) से जुड़ी जटिलताएं। सरकार इन्हें दूर करके काम करने की बजाय राजनीति करने या उसका लाभ लेने की कोशिश में है। अब इस कानून के क्रियान्वयन को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया है। इस पर विपक्ष के कई सवाल हैं।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने इस कानून को “ऐतिहासिक” बताते हुए कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि उसने अपने लंबे शासनकाल में इसे लागू नहीं किया। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर बताया और मतदान से पहले राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जिसकी शिकायत की गई है लेकिन लाभ की उम्मीद नहीं है। कांग्रेस का कहना है कि महिला आरक्षण की बुनियादी पहल उसी ने की थी और पंचायत स्तर पर इसे सफलतापूर्वक लागू भी किया गया। विपक्ष का आरोप है कि मौजूदा सरकार इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने और यह धारणा बनाने की कोशिश कर रही है कि कांग्रेस महिला आरक्षण के खिलाफ रही है। वास्तविकता यह है कि महिला आरक्षण अब केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन चुका है। एक ओर इसे ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके क्रियान्वयन की समयसीमा और राजनीतिक प्रस्तुति पर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन कंप्रोमाइज्ड से लेकर एप्सीटन से मिलने वाले को मंत्री बनाना और बनाए रखना मुद्दा नहीं बन रहा है। पाकिस्तान मुद्दा बन जाता है लेकिन शपथग्रहण में नवाजशरीफ को बुलाना, बिना बुलाए जाना हो या ऑपरेशन सिन्दूर अचानक शुरू होना और बंद होना हो – मुद्दा नहीं बनता है। राजनीतिक करियर बर्बाद कर सकने की ट्रम्प की धमकी और उसके बाद की स्थितियों में जो हो रहा है वह क्या है, समझना मुश्किल नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


