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रिश्वतखोरी मामले में गौतम अडानी की मुश्किलें बढ़ीं! देखें नोटिस

रिश्वतखोरी से जुड़े एक मामले में अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अमेरिकी नियामक संस्था United States Securities and Exchange Commission (SEC) ने अदालत को बताया है कि भारत सरकार के माध्यम से भेजे गए अदालती समन को पिछले 14 महीनों से आगे नहीं बढ़ाया जा सका, जिसके बाद अब ई-मेल के जरिए समन भेजने की अनुमति मांगी गई है।

SEC और अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) की ओर से पेश वकील क्रिस्टोफर एम. कोलोराडो ने अदालत को अवगत कराया कि भारत के कानून मंत्रालय से इस संबंध में कई बार ताजा जानकारी मांगी गई, लेकिन अब तक कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला है। अदालत को बताया गया कि इसी कारण अब गौतम अडानी और सागर अडानी को ई-मेल के माध्यम से अदालती समन भेजने का अनुरोध किया गया है।

इस पूरे मामले को लेकर भारत की राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने जानबूझकर गौतम अडानी और सागर अडानी तक अमेरिकी अदालत के नोटिस नहीं पहुंचने दिए। कांग्रेस ने इस दावे के समर्थन में नोटिस से जुड़े कुछ दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं और सवाल उठाया है कि आखिर 14 महीनों तक यह प्रक्रिया क्यों रोकी गई।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब अमेरिकी एजेंसियां SEC और DOJ लगातार संपर्क में थीं, तब भी भारत सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। पार्टी ने सवाल किया है कि क्या यह देरी महज प्रशासनिक है या इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण है।

हालांकि, इस पूरे प्रकरण पर अब तक न तो अडानी समूह की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है और न ही भारत सरकार या कानून मंत्रालय की तरफ से कोई स्पष्ट बयान दिया गया है।

मामला अब अमेरिकी अदालत के समक्ष है और यदि ई-मेल के जरिए समन भेजने की अनुमति मिलती है, तो यह अडानी समूह के लिए कानूनी मोर्चे पर एक नया मोड़ साबित हो सकता है।


कांग्रेस समर्थित एक्स हैंडल INC TV का ट्वीट-

अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) और न्याय विभाग (DOJ) के वकील क्रिस्टोफर एम कोलोराडो ने अदालत को बताया कि भारत के कानून मंत्रालय से ताजा जानकारी मांगी गई थी, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।


रिश्वत खोरी मामले में अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी की मुश्किलें बढ़ी..

अमेरिकी अदालत द्वारा भेजे गए अदालत के समन को मोदी सरकार द्वारा 14 महीने तक रोके जाने के बाद United States Securities and Exchange Commission (SEC) ने अब अदालत में कहा है कि अडानी को ईमेल जरिए अदालती समन भेजा जाय। गौतम अडानी और सागर अडानी को मोदी सरकार ने अब तक नोटिस क्यों नहीं भेजा?


इंडिया अवेकेंड नामक हैंडल का ट्वीट-

उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के मामले में अब भारत सरकार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या अमेरिकी अदालत द्वारा भेजे गए समन को समय पर तामील न कराकर मोदी सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से एक अपराध में मदद की?

आरोप है कि अमेरिका की एक अदालत ने हेग कन्वेंशन के तहत भारत सरकार से अनुरोध किया था कि वह गौतम अडानी को समन पहुंचाए। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस समन को लेकर अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया पर आपत्ति जताई गई, जिसके चलते यह नोटिस आगे नहीं बढ़ पाया।

इस बीच, अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि गौतम अडानी पर अमेरिका में करोड़ों डॉलर की कथित धोखाधड़ी के आरोप हैं। आरोपों के मुताबिक, अडानी ने अमेरिकी निवेशकों से जुटाई गई राशि का इस्तेमाल भारत में सोलर पावर परियोजनाओं के लिए रिश्वत देने में किया। अमेरिकी कानून के तहत यह एक गंभीर आपराधिक कृत्य माना जाता है, जिसमें दोष सिद्ध होने पर 20 साल तक की सजा का प्रावधान है।

अब अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (DoJ) ने संकेत दिया है कि वह समन को ई-मेल और अन्य वैकल्पिक माध्यमों से भेजने की प्रक्रिया शुरू करेगा। जानकारों का कहना है कि यदि कानूनी प्रक्रिया में सहयोग नहीं हुआ, तो आगे चलकर गौतम अडानी को फरार आरोपी (फ्यूजिटिव) घोषित करने की कार्रवाई भी शुरू हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि गौतम अडानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी उद्योगपति माने जाते हैं और इसी कारण भारत सरकार की भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है। विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या एक प्रभावशाली कारोबारी को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया को कमजोर किया गया?

हालांकि, इस मामले में अब तक न तो प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से और न ही अडानी समूह की तरफ से इन आरोपों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। भारत सरकार भी समन तामील न होने के मुद्दे पर स्पष्ट जवाब देने से बचती नजर आ रही है।

मामला अब अमेरिकी अदालत और जांच एजेंसियों के अगले कदम पर टिका है। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि यह केवल कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा विवाद है या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठेंगे।


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