श्याम मीरा सिंह
पत्रकार रवि नैयर को अड़ानी के डेफमेशन केस में एक साल की सजा सुनाई गई है। ये बड़ा विचित्र है कि तमाम मामलों में आरोप लगने के बाद भी मोदी सरकार अड़ानी को बचा लेती है। और जाँच तक शुरू नहीं की जाती।
वहीं पत्रकारों को जेल में डालने के लिए क्रिमिनल डिफ़ेमेशन का यूज किया जा रहा है। बताइए एक पत्रकार की रिपोर्ट्स को छोड़कर उसके ट्वीट्स के लिए एक साल की सजा। ये भी बड़ा अटपटा है कि अड़ानी की तरफ़ से ज़्यादातर डेफमेशन केसेज गुजरात की लोकल कोर्ट्स में फाइल किए जा रहे हैं।
रवि नायर की पत्रकारिता… पत्रकार रवि नायर को केवल ट्वीट के लिए सज़ा नहीं दी गई है। पत्रकार के रूप में रवि नायर की मूल पहचान खोजी पत्रकारिता है। रवि का काम ट्विटर की दुनिया से आगे ज़मीनी, संजीदा है। फ़्रंटलाइन में भी आप उनके लेख पढ़ सकते हैं। -दयाशंकर मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार

दीपक शर्मा-
मानहानि के मुकदमें में खोजी पत्रकार रवि नायर को एक साल की सजा बेहद असाधारण फैसला है। ये सजा गुजरात में मंसा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अडानी द्वारा दायर एक केस में सुनाई है।
ये संयोग है कि गुजरात की ही अदालत ने राहुल गांधी को भी इससे पहले मानहानि के मामले में सजा सुनाई थी।
रवि नायर देश के जाने माने financial investigative पत्रकार हैं। उन्होंने अडानी से लेकर अंबानी और कई बड़े उधोगपतियों के सरकार से सांठगांठ पर कई खुलासे किये हैं।
उम्मीद है हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में रवि नायर की कलम को इंसाफ मिलेगा।
मोहन बुलानी-
अडानी के खिलाफ ट्वीट्स पड़े भारी: पत्रकार रवि नायर को एक साल की जेल!
गांधीनगर (गुजरात): अडानी समूह के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने के मामले में स्वतंत्र जांच पत्रकार रवि नायर को बड़ा झटका लगा है। मानसा मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को उन्हें आपराधिक मानहानि का दोषी ठहराते हुए एक साल की साधारण कैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
यह मामला अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) की शिकायत पर आधारित है। कंपनी ने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2020 से जुलाई 2021 तक रवि नायर ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कई ट्वीट्स और http:/adaniwatch.org पर लेख पोस्ट किए, जो झूठे, गुमराह करने वाले और बदनाम करने वाले थे। कोर्ट ने इन पोस्ट्स को अडानी समूह की साख बिगाड़ने की सुनियोजित साजिश करार दिया। जज ने कहा कि ये निष्पक्ष आलोचना नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई बदनामी थी।
रवि नायर द वायर, न्यूजक्लिक और द हिंदू जैसे माध्यमों में लिख चुके हैं और ऑस्ट्रेलियाई एनजीओ से जुड़ी अडानी वॉच वेबसाइट पर अडानी की गतिविधियों की जांच रिपोर्ट्स प्रकाशित करते रहे हैं। उनके ट्वीट्स में अडानी को “बबल” बताना, सरकारी सांठगांठ के आरोप और ऑफशोर निवेशकों से जुड़े दावे शामिल थे।
नायर के वकील ने दावा किया कि ये सार्वजनिक हित में थे, कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ और मानसा कोर्ट का क्षेत्राधिकार ही गलत था। लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। जज ने जोर दिया कि पत्रकार होने की आड़ में बदनामी का अधिकार नहीं मिलता; सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
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Ketan Virani
February 13, 2026 at 8:19 pm
तो उसमें गलत क्या है अदानी गुजराती है गुजरात से है अहमदाबाद में रहते है तो केस कहां से करेंगे पाकिस्तान से तो नहीं करेंगे?