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पानी के धंधे में अडानी की एंट्री: इंदौर की मौतें घटना थी या प्रयोग? देखें वीडियो

वर्ल्ड बैंक की एक चर्चित रिपोर्ट बताती है कि जिन देशों में पानी की आपूर्ति निजी कंपनियों को सौंपी गई, वहां 5 वर्षों के भीतर पानी की कीमतें 30 से 60 प्रतिशत तक बढ़ गईं। बोलीविया और दक्षिण अफ्रीका इसके बड़े उदाहरण हैं। पहले बुनियादी ढांचे को निजी हाथों में सौंपा गया, फिर धीरे-धीरे आम लोगों की ज़रूरत को मुनाफे के उत्पाद में बदल दिया गया।

अब सवाल यह है कि क्या वही मॉडल भारत में दोहराया जा रहा है?

मध्य प्रदेश के इंदौर में गंदे पानी से लोगों की मौत महज़ एक लापरवाही थी या फिर यह उस बड़े प्रयोग की झलक है, जिसमें पानी को व्यापार की वस्तु बनाया जा रहा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि देश में पानी के निजीकरण की रफ्तार तेज़ हो चुकी है।

पानी के कारोबार में कॉरपोरेट एंट्री

देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में शामिल अडानी समूह ने 2023-25 में पानी के क्षेत्र में करीब 15,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है। यह निवेश महज़ इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में पानी भी बिजली, कोयला और हवाई अड्डों की तरह एक कॉरपोरेट प्रोडक्ट बन सकता है। जानकारी के मुताबिक,

  • मुंबई
  • लखनऊ
  • वाराणसी
  • अहमदाबाद

जैसे बड़े शहरों में पानी की सप्लाई व्यवस्था में अडानी समूह की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यानी नलों तक पहुंचने वाला पानी अब सीधे-सीधे कॉरपोरेट प्रबंधन के दायरे में आ रहा है।

कोयले के बाद अब पानी?

आलोचकों का कहना है कि जिस तरह पहले कोयले और ऊर्जा क्षेत्र में निजीकरण के नाम पर प्रयोग किए गए, अब वही मॉडल पानी पर लागू किया जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोयला न मिले तो विकल्प हो सकता है, लेकिन पानी के बिना जीवन संभव नहीं।

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट यही चेतावनी देती है कि जब पानी जैसी बुनियादी जरूरत को मुनाफे से जोड़ा जाता है, तो:

  • कीमतें बढ़ती हैं
  • गुणवत्ता पर समझौता होता है
  • गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है

इंदौर की घटना: चेतावनी या संकेत?

इंदौर में गंदे पानी से हुई मौतें इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। क्या यह सिर्फ सिस्टम की नाकामी थी, या फिर उस ढांचे का नतीजा, जहां जवाबदेही सरकार से खिसककर कंपनियों तक पहुंच रही है?

जब पानी का नियंत्रण जनता के बजाय कॉरपोरेट बोर्डरूम में तय होगा, तो सवाल उठता है— जवाबदेही किसकी होगी?

पानी मुनाफा नहीं, मौलिक अधिकार

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि पानी को मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि व्यापारिक अवसर के रूप में। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट और भारत में उभरती घटनाएं यही संकेत दे रही हैं कि अगर समय रहते सवाल नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में नल से पानी नहीं, बिल की चिंता पहले आएगी।


इंदौर में गंदा पानी से मौत एक घटना थी या फिर एक प्रयोग… क्योंकि यही प्रयोग पहले कोयला पर किया था! अब पानी के व्यापार में भी अडानी कूद गए हैं। 15000 करोड़ का निवेश यही संकेत दे रहा है! मुम्बई, लखनऊ, वाराणसी और अहमदाबाद में पानी की सप्लाई अब अडाणी जी कर रहे है।- अशोक डनोदा, पत्रकार

मोदी है तो मुमकिन है! अडानी को अमीर बनाने के लिए सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी कोल कंपनी कोल इंडिया जिसने 2014-15 में 10000 करोड़ का टैक्स देने वाली कंपनी महारत्न से सम्मानित होने वाली कंपनी को ठिकाने लगा दिया!

हमें इसका पता भी नहीं चलने दिया गया, तस्वीर कोयले की कमी की दिखाई गई, जबकि कोल इंडिया का उत्पादन तो साल दर साल बढ़ रहा था।

मीडिया के ज़रिए जनभावनाएं बदली गईं, और कोरोना काल में सारे नियम-कायदे अडानी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए बदल दिए गए। 2021 की इस बड़ी धांधली पर कुणाल कामरा ने शानदार रिसर्च की है!

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