मिर्जापुर | उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में प्रस्तावित अडानी समूह के 1600 मेगावाट थर्मल पावर प्लांट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ददरी खुर्द गाँव में बनने वाली इस परियोजना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने गम्भीर आपत्तियाँ दर्ज की हैं।
12 अप्रैल 2025 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आयोजित जनसुनवाई में पारदर्शिता की भारी कमी और जन सहभागिता को लेकर सवाल उठाए गए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जनसुनवाई को केवल औपचारिकता बनाकर पेश किया गया, जिसमें विरोध की आवाजों को दबाया गया और केवल परियोजना के समर्थकों को ही बोलने का मौका दिया गया।
पूर्व-नियोजित सुनवाई और कानूनी उल्लंघन के आरोप
पर्यावरणीय समूह “विंध्यन इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फ़ाउंडेशन” ने सुनवाई को “पूर्व नियोजित” बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। नियमों के अनुसार, प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य होती है, लेकिन कई ग्रामीणों को इस सुनवाई की जानकारी ही नहीं दी गई।
परियोजना स्थल और पर्यावरणीय चिंता
यह पावर प्लांट मिर्ज़ापुर के ददरी खुर्द गाँव में 365.19 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित है, जो विंध्य क्षेत्र के घने जंगलों और जैवविविधता से भरपूर इलाक़े के निकट स्थित है। यह इलाक़ा स्लॉथ भालू, तेंदुआ, मगरमच्छ, गिद्ध, उल्लू और ईगल जैसे संरक्षित जीवों का आवास है, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित हैं।
हालाँकि, अडानी समूह ने दावा किया है कि परियोजना में कोई वन भूमि शामिल नहीं है, केवल 8.35 हेक्टेयर क्षेत्र जल पाइपलाइन और सड़क निर्माण के लिए लिया जाएगा। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों और स्क्रॉल.इन की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह दावा भ्रामक है। 1952 की गजट अधिसूचना और 2020 की वन विभाग रिपोर्ट इस क्षेत्र को वन भूमि के रूप में दर्ज करती हैं, जहाँ बांस और पलाश के जंगल फैले हुए हैं।
एनजीटी की सक्रियता और कानूनी हस्तक्षेप
अगस्त 2024 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और अडानी समूह को नोटिस जारी किया। फरवरी 2025 में एक याचिका की सुनवाई के दौरान आरोप लगाए गए कि अडानी समूह ने बिना वैध पर्यावरणीय मंजूरी के निर्माण कार्य शुरू कर दिया और भारी मशीनरी से जंगल को समतल किया गया।
जल और आजीविका पर संकट की आशंका
परियोजना को हर वर्ष 6.4 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होगी, जिसकी आपूर्ति सिंगरौली (मध्य प्रदेश) से होगी। कोयला आधारित इस संयंत्र के लिए बड़ी मात्रा में पानी की ज़रूरत होगी, जिससे मिर्ज़ापुर जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में खेती और पीने के पानी पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
भूमि अधिग्रहण में धोखाधड़ी के आरोप
स्थानीय ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाए हैं कि कंपनी ने भूमि अधिग्रहण में धोखाधड़ी की है। डाउन टू अर्थ की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, कई किसानों ने दावा किया था कि अडानी समूह ने उनकी ज़मीन धोखे से अधिग्रहण की। यह विवाद अब भी बरकरार है और लोगों में अपने आजीविका को लेकर गहरी चिंता है।
विवादों से भरा इतिहास और राजनीतिक पृष्ठभूमि
यह पहला मौका नहीं है जब मिर्ज़ापुर में थर्मल पावर प्रोजेक्ट विवादों में आया हो। 2011 में वेल्सपन एनर्जी को इसी स्थान पर 1320 मेगावाट पावर प्लांट के लिए मंज़ूरी मिली थी, लेकिन 2016 में एनजीटी ने उस मंज़ूरी को गलत और अधूरी जानकारी के आधार पर रद्द कर दिया था।
इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। स्थानीय विधायक रामशंकर सिंह पटेल ने जनसुनवाई में इस परियोजना को विकास और रोजगार का वाहक बताया, लेकिन विंध्य बचाओ आंदोलन जैसे संगठनों ने इसे दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुक़सान की चेतावनी दी है।
सत्ता-संरक्षण और कॉरपोरेट हितों की भूमिका
मार्च 2025 में द रिपोर्ट्स कलेक्टिव ने खुलासा किया कि राजस्थान और महाराष्ट्र में बीजेपी सरकारों ने अडानी समूह के पक्ष में विशेष टेंडर जारी किए। मिर्ज़ापुर में भी स्थानीय लोगों को संदेह है कि जनसुनवाई में अडानी के पक्ष में माहौल तैयार किया गया और सरकारी तंत्र की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
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