सिंगरौली (मप्र): अरावली से लेकर सिंगरौली और सुंदरगढ़ तक, विकास की एक ही परिभाषा थोप दी गई है—जहाँ कॉर्पोरेट मुनाफ़ा दिखे, वहीं जंगल उजाड़ दो, पहाड़ काट दो और आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर दो। मध्यप्रदेश का सिंगरौली आज इसी ‘विकास मॉडल’ की सबसे क्रूर तस्वीर बन गया है, जहाँ अडानी के खनन हितों के लिए हजारों एकड़ जंगल साफ किए जा रहे हैं, हाथी कॉरिडोर और दुर्लभ वन्यजीवों के आवास को कागज़ों में मिटा दिया गया है और जल-जंगल-ज़मीन बचाने उठी आवाज़ों को पुलिस की बंदूकों से दबाया जा रहा है। सवाल साफ है—क्या यह विकास है या लोकतंत्र, प्रकृति और आदिवासी अस्तित्व की सुनियोजित कुर्बानी?
अरावली हो, मध्य प्रदेश का सिंगरौली हो या ओडिशा का सुंदरगढ़, जहाँ कॉर्पोरेट को, अडानी को मुनाफ़ा दिखता है, वहीं ज़मीन छीनी जाती है। जंगल काटे जाते हैं, लोग बेघर होते हैं, इसे ही विकास कहा जाता है। – संदीप यादव
अपूर्व भारद्वाज-
साधो ये अडानी का देश। अगर आप इस देश के जल, जंगल, जमीन और पर्वत के लिए ज़रा भी सोचते हैं तो आवाज उठाइये।
विकास के नाम पर हजारों एकड़ जंगल साफ, अरावली पहाड़ खतरे में, देश के आदिवासी–गरीब की ज़मीन कौड़ियों के दाम बेच दी गई। लेकिन किसी मीडिया में खबर नहीं… कोई हलचल नहीं…
लेकिन— कल एमपी के सिंगरौली में जो हुआ, तस्वीरें चीख–चीखकर बता रही हैं—इस देश में जल–जंगल–ज़मीन की लड़ाई अगर कोई पार्टी लड़ रही है, तो वो कांग्रेस है। बाकी सब चुप हैं… और सरकार ने सबकुछ अडानी को बेच दिया है।
हंसराज मीणा-
सिंगरौली में 10 हजार एकड़ जंगल काटकर “अडाणी देश” बसाया जा रहा है। आदिवासियों से स्कूल, आजीविका और जल – जंगल -जमीन छीन ली गई। पेड़ों की चीखें विधानसभा में भी गूंजीं, लेकिन प्रशासन उद्योगपतियों की ढाल बना खड़ा है। सिंगरौली सिर्फ कोयला नहीं, आदिवासियों का अस्तित्व बचाने की लड़ाई है। मध्यप्रदेश के सिंगरौली में अडानी के खनन हित बचाने के लिए जिले को पुलिस छावनी बना दिया गया है।

जो आदिवासी अपने जल–जंगल–ज़मीन की रक्षा कर रहे हैं, सरकार उन्हें ही खतरा मान रही है। जब जनता की आवाज़ दबाने के लिए इतनी फोर्स खड़ी करनी पड़े तो समझिए लोकतंत्र नहीं, तानाशाही चल रही है।
कमलेश्वर पटेल-
सिंगरौली में क्या भाजपा सरकार जानवरों का जीवन भी अड़ानी के लिए संकट में डाल रही है?
सिंगरौली की घिरोली कोयला खदान को मंजूरी देने के लिए रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में हेरफेर किया गया, जबकि यही इलाका हाथी कॉरिडोर और 18 दुर्लभ वन्य प्राणियों का प्राकृतिक आवास है।
वन विभाग के रिकॉर्ड कुछ और कहते हैं, लेकिन टेंडर के बाद कागजों में हाथी कॉरिडोर को 5 किमी दूर दिखा दिया गया। सवाल उठाने पर अधिकारी बयान देने से बच रहे हैं।
करीब 1400 हेक्टेयर वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई शुरू हो चुकी है। यह विकास नहीं, बल्कि जंगल और वन्यजीवों की सुनियोजित बलि है। क्या भाजपा सरकार उद्योगपतियों के आगे नतमस्तक हो गई है?


