वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने अपने अदभुत पापा को यूं दी श्रद्धांजलि

अलविदा डेविड कॉपरफील्ड. ये उपमा जस्टिस सुरेश दत्त झा के लिए है जो संयोग से हमारे पिता थे. वो अकसर खुद अपनी तुलना डेविड कॉपरफील्ड से करते थे. उन्होंने बड़ी कठिनाइयों में अपना शुरुआती जीवन गुजारा था पर इससे कभी वह विचलित नहीं हुए. उल्टे, यह उनकी ताकत बना. उन्होंने आगे बढने के लिए मेहनत की, अपनी लाचारी का रोना नहीं रोया. यह जरूर है कि वह अपने रिश्तेदारों के घर रहकर पढे थे. जाहिर है उन्हें बड़ी दिककतें पेश आई होंगी पर उनके चेहरे पर कभी किसी के लिए शिकन नहीं देखी, उपेक्षा नहीं देखी.

वह बताते थे कि पहली बार अपने अमीर भाई का जूता सुधरवाकर जब उन्होंने पहना तो उन्हें लगा था कि वह हवा में उड रहे हैं. कैसे वह रोज शाम अपनी इकलौती शर्ट धोकर पहनते थे. उन्हें कभी जरूरत महसूस ही नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट जज के बराबर उपलोकायुक्त के पद पर रहे थे वो. कई बार हमें लगता कि पापा इतने सीधे और सरल क्यों हैं. कहीं वो इस दुनिया से परे किसी दूसरी दुनिया से तो नहीं आए हैं? हम उनके परम मित्र और मध्यप्रदेश के डीजीपी रहे दिवंगत आईपीएस अधिकारी आनंद कुमार से यह पूछते कि बदमाश से बदमाश आदमी उन्हें बुरा क्यों नहीं लगता तो अंकल कहते कि यह तुम्हारे पापा का न्यायिक नजरिया है जो तब तक किसी को बदमाश नहीं मानता जब तक कि यह साबित न हो जाए. उन्हें कभी किसी पर गुस्सा आता था या नहीं, यह भी हम कभी नहीं समझ पाए. वह बड़े अच्छे किस्सागो थे. उनके पास किस्सों का खजाना था और वह ऐसे दिलचस्प तरीके से सुनाते कि कोई ऊब नहीं सकता था.

कानून के सिपहसालार

वह कानून के बड़े पाबंद थे और अपने काम के लिए किसी की परवाह नहीं करते थे. कभी देश के किसी सर्वोच्च नेता का चर्चित बेटा उनके पीछे पड़ गया था. उसकी कर्नाटक की बहुचर्चित खानों में दिलचस्पी थी और वह अपने किसी समर्थक को वह खान दिलाना चाहता था. पर पापा तो पापा ठहरे. उन्होंने टका सा जवाब दे दिया कि जो भी होगा नियम-कानून से. धमकियों के दौर चल पड़े पर वो जरा भी विचलित नहीं हुए. इसी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि हम लोग पेरिस कन्वेंशन के सदस्य बन जाएं. उदारवाद की दिशा में यह पहला कदम था. पर उस जमाने में पापा को ये बात जंची नहीं. उनके हिसाब से यह संधि विकसित देशों के लिए उपयोगी थी. हम जैसे पिछड़े देश में दवाइयों के बाजार में इसका सदस्य बनते ही हाहाकार मच जाता. इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी बातें थी इसमें जिससे अपनी अर्थव्यवस्था बैठ जाती. उन्होंने जब अपनी यह राय इंदिरा जी के सामने रखी तो वह मान गर्इं. बौद्धिक संपदा का वो जमाना कुछ और था. नेता और मंत्री अफसरों की राय को वजन देते थे. विधि मंत्रालय में पापा के पास कम से कम 20 मंत्रालय थे. इन सभी मंत्रालयों को वही सलाह देते थे. एक बार मध्यप्रदेश के किसी मुख्यमंत्री से भी उन्होंने कहा था कि कानून बनाना कोई भुट्टा भूनना नहीं है. इसका पूरे देश और दुनिया पर असर पड़ता है.

कहानी पर बवाल

फिल्म उद्योग से जुडे किसी लेखक शायद ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर एक बार बवाल मच गया. यह कहानी उस जमाने की बहुचर्चित पत्रिका सारिका में छपी थी और इसका शीर्षक किसी समुदाय विशेष के नाम पर था. देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे. माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर आपात कानूनी राय मांगी. विधि मंत्रालय में तो सबके हाथ-पांव फूल गए. हिंदी जानने वाला कोई शख्स था नहीं जो उसका अनुवाद करता. शाम के छह बज रहे थे. मरते क्या न करते. विधि सचिव वेंकटसूर्या दौड़े-दौड़े पापा से मदद मांगने आए. पापा ने कहानी पढ कर अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया तो पता लगा कि कहानी अधूरी है. इसकी शुरुआत का हिस्सा आया ही नहीं है. खैर किसी तरह उसका गायब भाग पहुंचा और अनुवाद के बाद पता लगा कि कहानी तो उस कौम की तारीफ में है. सरकार यूं ही घबरा रही है. लोग वहम को हवा दे रहे हैं. तब जाकर प्रदर्शन ओर विरोध का दौर थमा. उस दिन वेंकटसूर्या ने उन्हें संकट मोचक कहा था और बाद में वो उन्हें वापस जाने देने को तैयार नहीं थे.

गोपनीयता की रक्षा

पापा की बड़ी तमन्ना थी कि वह अंग्रेजी न्यूज रीडर बनें. सुबह उठते ही वह अकले ही आल इंडिया रेडियो की तर्ज पर अखबार पढते. उनके पास सूचना प्रसारण मंत्राालय भी था. लिहाजा सेंसर बोर्ड वगैरह में दखल रखते थे. कई बार हमें वो अप्रदर्शित फिल्मों की कहानी सुनाते और उस परचर्चा भी करते थे. ‘गांधी’ फिल्म के रोजमर्रा के डेवलपमेंट का मुझे पता रहता. रिचर्ड एटनबरो से समझौता उन्होंने कराया था. पर जब मैं पत्रकार बन गई तो वो मुझसे गोपनीयता बरतने लगे. यह भी कहते कि बेटा तुम्हें अलग रहना पडेगा. जब लड़कियों को लोग घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे तब वह पूछते कुछ इंतजाम हुआ तुम्हारा? पर इसी बीच मेरा विवाह पत्रकार अनंत मित्तल से हो गया और वो नौबत टल गई. मुझे ही नहीं, अपनी सभी संतानों के वो मन की बात करते. हमें रोकते-टोकते नहीं थे कि इतनी रात को कहां चली या इत्ती देर कहां थी. उन्हीं की हौसला अफजाई की वजह से मैं पाटलिपुत्र टाइम्स में काम करने पटना गई थी. और लोग थे कि उसका सबब समझने की बजाय मुझे बहुत तंगहाल मजबूर लड़की समझने लगे थे जिसके घर खाने-पीने को नहीं है. कुछ लोग मुझे घर से भागा हुआ समझते थे. मुझे लोगों की बुद्धि पर तरस आता था. लड़कियों का घर पर एक गिलास पानी निकालना उन्हें पसंद नहीं था. वह अपनी बहू का भी घरेलू काम करना पसंद नहीं करते थे. वह कहते कि ये सेवाएं तो खरीदी जा सकती हैं. शायद इसीलिए उनका आखिरी वाक्य था कि लडकियां काम-धाम छोड़कर आने की हड़बड़ी न करें. सीधे तेरही पर आएं. पर पापा की जैसे इतनी बातें नहीं मानीं, एक और सही. हम वक्त पर पहुंचकर उनके अंतिम दर्शन करने में कामयाब हो गए.

अखबारों की आजादी

अखबार की दुनिया में उनका बड़ा अमूल्य योगदान है. कांग्रेस सरकार इंडियन एक्सप्रेस से परेशान थी. जब जागरण कानपुर से बाहर निकलना चाहता था तो उन्हें सुनहरा मौका मिल गया. जागरण के बहाने इंडियन एक्सप्रेस पर रोक लगाने का विचार चल पड़ा. पापा के पास कानूनी राय के लिए यह मसला आया. तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री उनसे ऐसी राय चाहते थे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. पापा ऐसा लिख दें कि एक्सप्रेस के सारे संस्करण सिमट जाएं. पूरे अध्ययन के बाद पापा ने कहा कि यह ठीक नहीं होगा. इससे संविधान में दिए बुनियादी अधिकारों पर आंच आएगी. और मामला टल गया. सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो उसकी दलील खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने भी पापा की ही राय को आधार बनाते हुए फैसला दिया. आज देश में अखबारों के बहुसंस्करणों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें मेरे पिता न्यायमूर्ति एसडी झा का भी दिमाग लगा है.

कानून में जनभागीदारी

वह मुझे हर हफ्ते स्टोरी आइडिया दिया करते थे. वैसे वो आर्थिक, राजनीतिक और विेदेशी मामलों के बढिया जानकार थे पर उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी गहरी समझ थी. जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में मैने लंबे समय तक कानूनी पहलुओं पर जो लिखा उसमें उनकी खासी मदद मिलती रहती थी. मार्च में वो मुझे बता रहे थे कि कैसे अदालतों से जनता की भागीदारी समाप्त कर दी गई है. वो ज्यूरी सिस्टम की बात कर रहे थे. कह रहे थे कि किसी दिन घंटे भर बात करके मुझे नोट करवा देंगे. इस बात को कई महीने गुजर गए तो बोले बेटा उस पर तो फिल्म भी बन गई है. यही मौका है लिख डालो. वह नानावती कांड पर बनी अक्षय कुमार की फिल्म ‘रूस्तम’ की चर्चा कर रहे थे. उनका कहना था कि सीआरपीसी में अब भी ये प्रोविजन है. मैंने उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. पापा के पास वक्त नहीं था इसलिए वो जोर दे रहे थे और मेरे पास भी वक्त नहीं, लिहाजा मैं कोताही किए जा रही थी. वह दस साल पहले से कह रहे थे कि गंगा पर कोई काम करो और अब गंगा पर चारों ओर काम हो रहा है. एक बार मेरे पति की स्टोरी ‘कार है या कामधेनु’ का स्टोरी आइडिया भी उन्हीं का था. उन्होंने बताया कि कार निर्माण में कितनी बार एक्साइज ड्यूटी लगती है.

अतिथि प्रेमी

हमारे पापा अंदर से बेहद कड़क और दिखने में बहुत सुकुमार थे. उन्हें बहुत जल्दी एलर्जी हो जाती थी. उनकी खासियत ये थी कि वह कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और हम लोगों को भी ऐसा करने से रोकते थे. दिल्ली में हमारे पास मध्यप्रदेश जैसा बंगला नहीं था और मेहमानों का तांता लगा रहता था. उनकी अदालत में अर्जी लगाई- पापा पढाई में बडी दिक्कत होती है, तो बोले- किस्मत वालों के घर मेहमान आते हैं. कल से मुंह बनाओ तो कोई नहीं झांकेगा. ये लोग कहीं भी ठहर सकते हैं, किसी होटल में, भवन में, नेताओं के अहाते में भी ठहर सकते हैं, तुम्हारे ही यहां क्यों आते हैं? हमारे घर को दिल्ली में पड़ोसी मध्यप्रदेश भवन कहने लगे थे.

पदों से वैराग्य

उन्हें किसी पद से मोह नहीं था. न हीं नेताओं से मिलना-जुलना पसंद करते थे. बस काम से काम. वह कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा, कर्नाटक की पूर्व राज्यपाल रमादेवी और राजदूत गिरीश चंद्र  मेहरा जैसे यशस्वी अफसरों के समकालीन थे. रमा देवी ने तो उनके साथ विधि मंत्रालय और कस्टम ट्रिब्यूनल में काम भी किया था. उन्हें पद और पैसे का मोह छू भी नहीं गया था. वह कोई पद लेना ही नहीं चाहते थे वरना न्यायपालिका और कार्यपालिका में उनकी जो पकड़ थी उसमें उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था. उनके जैसा अनुभव न्यायपालिका में विरलों के पास ही होगा. वह फौजदारी और दीवानी कानून तक सीमित आम जज नहीं थे. अपने जीवनकाल में उन्होंने सात बार मध्यप्रदेश के विधिसचिव का पद ठुकराया था. वह तब गए जब वह पद उनके लिए अपग्रेड करके प्रधान सचिव का बनाया गया. इसके अलावा उन्होंने विधानसभा सचिव, इंडिस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और राष्ट्रीय महत्व का एमआरटीपी कमीशन के अध्यक्ष का पद ठुकराया था. एमआरटीपी के अध्यक्ष पद पर समयबद्ध नियुक्ति न कर पाने के लिए तब भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी थी. मुझे याद है मैं उन दिनों नवभारत टाइम्स में थी और ये खबर इकनॉमिक टाठमस में बैनर लीड छपी थी. तब यह पद बेहद ताकतवर था पर कुछ अखबारों ने उन्हें तब विश्वनाथ प्रताप सिंह का महज इसलिए करीबी बता दिया था कि वह उन जैसी टोपी लगाते थे. पापा इससे बेहद विचलित हो गए थे. सच्चाई यह थी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनका कभी कोई साबका ही नहीं पड़ा था.

धान का कटोरा नहीं, भंडार

वह अंग्रेजी के विद्वान थे, इस नाते कई बातों की उनकी अपनी समीक्षा होती थी. जैसे उन्हें छत्तीसगढ को धान का कटोरा कहने पर बडी आपत्ति थी. उनका कहना था कि हमारे यहां तो कटोरा भिक्षा का प्रतीक है. पढने लिखने से जी चुराने वालों को कहते हैं ना- जो ना माने बडों की सीख, ले कटोरा मांगे भीख. अंग्रेजी के ‘राइस बोल’ का सीधा अनुवाद करना ठीक नहीं है. इसे धान का भंडार कहना चाहिए. इसके लिए वह कई शब्दकोश भी देखकर मुझे बताते थे. इस पर मेरा नवभारत में लेख छपा था. ज्ञान का अथाह भंडार और प्रेम का सागर थे मेरे पापा. वह ऐसी-ऐसी बातें बताते जो कई बार हमारी समझ से परे होती. जीवन का तजुर्बा तो बहुतों के पास होता है पर गजब की दृष्टि मिली थी उन्हें. माया मोह से दूर वह वास्तव में इस दुनिया की शख्सियत नहीं थे. वरना आधा दर्जन आकर्षक पदों का मोह छोड़ने के लिए बड़ी हिम्मत और मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए.

पापा दस साल और चल सकते थे. लेकिन उनकी कोई इच्छा अधूरी नहीं थी. पद, पैसा और प्रतिष्ठा भी भरपूर कमा चुके थे.

मुझसे उन्होंने कहा था कि मेरा काम पूरा हो गया है. मेरा शोक मत करना.

ऐसे पापा को इरा, शिप्रा, विक्रमादित्य, स्मिता और शेफाली का प्रणाम.

इरा झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं. उनसे संपर्क irajha2@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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