बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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स्मृति शेष – अनिल माधव दवे : बौद्धिक तेज से दमकता था उनका व्यक्तित्व

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री अनिल माधव दवे, देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में थे, जिनमें एक बौद्धिक गुरूत्वाकर्षण मौजूद था। उन्हें देखने, सुनने और सुनते रहने का मन होता था। पानी, पर्यावरण, नदी और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े सवालों पर उनमें गहरी अंर्तदृष्टि मौजूद थी। उनके साथ नदी महोत्सवों ,विश्व हिंदी सम्मेलन-भोपाल, अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ-उज्जैन सहित कई आयोजनों में काम करने का मौका मिला। उनकी विलक्षणता के आसपास होना कठिन था। वे एक ऐसे कठिन समय में हमें छोड़कर चले गए, जब देश को उनकी जरूरत सबसे ज्यादा थी। आज जब राजनीति में बौने कद के लोगों की बन आई तब वे एक आदमकद राजनेता-सामाजिक कार्यकर्ता के नाते हमारे बीच उन सवालों पर अलख जगा रहे थे, जो राजनीति के लिए वोट बैंक नहीं बनाते। वे ही ऐसे थे जो जिंदगी के, प्रकृति के सवालों को मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बना सकते थे।

भोपाल में जिन दिनों हम पढ़ाई करने आए तो वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे, विचार को लेकर स्पष्टता, दृढ़ता और गहराई के बावजूद उनमें जड़ता नहीं थी। वे उदारमना, बौद्धिक संवाद में रूचि रखने वाले, नए ढंग से सोचने वाले और जीवन को बहुत व्यवस्थित ढंग से जीने वाले व्यक्ति थे। उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल स्वतः बन जाता था कि उनसे सीखने की ललक होती थी। नए विषयों को पढ़ना, सीखना और उन्हें अपने विचार परिवार (संघ परिवार) के विमर्श का हिस्सा बनाना, उन्हें महत्वपूर्ण बनाता था। वे परंपरा के पथ पर भी आधुनिक ढंग से सोचते थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अविवाहित रहकर समाज को समर्पित कर दिया। वे सच्चे अर्थों में भारत की ऋषि परंपरा के उत्तराधिकारी थे। संघ की शाखा लगाने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक वे हर काम में सिद्धहस्त थे। 6 जुलाई, 1956 को मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर में जन्में श्री दवे की मां का नाम पुष्पादेवी और पिता का नाम माधव दवे था।

गहरा सौंदर्यबोध और सादगीः उनकी सादगी में भी एक सौंदर्यबोध परिलक्षित होता था। बांद्राभान (होशंगाबाद) में जब वे अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन करते थे, तो कई बार अपने विद्यार्थियों के साथ वहां जाना होता था। इतने भव्य कार्यक्रम की एक-एक चीज पर उनकी नजर होती थी। यही विलक्षता तब दिखाई दी, जब वे भोपाल में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में इसे स्थापित करते दिखे। आयोजनों की भव्यता के साथ सादगी और एक अलग वातावरण रचना उनसे सीखा जा सकता था। सही मायने में उनके आसपास की सादगी में भी एक गहरा सौंदर्यबोध छिपा होता था। वे एक साथ कितनी चीजों को साधते हैं, यह उनके पास होकर ही जाना जा सकता था। हम भाग्यशाली थे कि हमें उनके साथ एक नहीं अनेक आयोजनों में उनकी संगठनपुरूष की छवि, सौंदर्यबोध,भाषणकला,प्रेरित करनी वाली जिजीविषा के दर्शन हुए। विचार के प्रति अविचल आस्था, गहरी वैचारिकता, सांस्कृतिक बोध के साथ वे विविध अनुभवों को करके देखने वालों में थे। शौकिया पर्यटन ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा था। वे मुद्दों पर जिस अधिकार से अपनी बात रखते थे, वह बताती थी कि वे किस तरह विषय के साथ गहरे जुड़े हुए हैं। उनका कृतित्व और जीवन पर्यावरण, नदी संरक्षण, स्वदेशी के युगानुकूल प्रयोगों को समर्पित था। वे स्वदेशी और पर्यावरण की बात कहते नहीं, करके दिखाते थे। उनके मेगा इवेंट्स में तांबे के लोटे ,मिट्टी के घड़े, कुल्हड़ से लेकर भोजन के लिए पत्तलें इस्तेमाल होती थीं। आयोजनों में आवास के लिए उनके द्वारा बनाई गयी कुटिया में देश के दिग्गज भी आकर रहते थे। हर आयोजन में नवाचार करके उन्होंने सबको सिखाया कि कैसे परंपरा के साथ आधुनिकता को साधा जा सकता है। राजनीति में होकर भी वे इतने मोर्चों पर सक्रिय थे कि ताज्जुब होता था।

कुशल संगठक और रणनीतिकारः वे एक कुशल संगठनकर्ता होने के साथ चुनाव रणनीति में नई प्रविधियों के साथ उतरने के जानकार थे। भाजपा में जो कुछ कुशल चुनाव संचालक हैं, रणनीतिकार हैं, वे उनमें एक थे। किसी राजनेता की छवि को किस तरह जनता के बीच स्थापित करते हुए अनूकूल परिणाम लाना, यह मध्यप्रदेश के कई चुनावों में वे करते रहे। दिग्विजय सिंह के दस वर्ष के शासनकाल के बाद उमाश्री भारती के नेतृत्व में लड़े गए विधानसभा चुनाव और उसमें अनिल माधव दवे की भूमिका को याद करें तो उनकी कुशलता एक मानक की तरह सामने आएगी। वे ही ऐसे थे जो मध्यप्रदेश में उमाश्री भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान सबको साध सकते थे। सबको साथ लेकर चलना और साधारण कार्यकर्ता से भी, बड़े से बड़े काम करवा लेने की उनकी क्षमता मध्य प्रदेश ने बार-बार देखी और परखी थी।

बौद्धिकता-लेखन और संवाद से बनाई जगहः उनके लेखन में गहरी प्रामाणिकता, शोध और प्रस्तुति का सौंदर्य दिखता है। लिखने को कुछ भी लिखना उनके स्वभाव में नहीं था। वे शिवाजी एंड सुराज, क्रिएशन टू क्रिमेशन, रैफ्टिंग थ्रू ए सिविलाइजेशन, ए ट्रैवलॉग, शताब्‍दी के पांच काले पन्‍ने, संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से, महानायक चंद्रशेखर आजाद, रोटी और कमल की कहानी, समग्र ग्राम विकास, अमरकंटक से अमरकंटक तक, बेयांड कोपेनहेगन, यस आई कैन, सो कैन वी जैसी पुस्तकों के माध्यम से अपनी बौद्धिक क्षमताओं से लोगों को परिचित कराते हैं। अनछुए और उपेक्षित विषयों पर गहन चिंतन कर वे उसे लोकविमर्श का हिस्सा बना देते थे। आज मध्यप्रदेश में नदी संरक्षण को लेकर जो चिंता सरकार के स्तर पर दिखती है , उसके बीज कहीं न कहीं दवे जी ने ही डाले हैं, इसे कहने में संकोच नहीं करना चाहिए। वे नदी, पर्यावरण, जलवायु परिर्वतन,ग्राम विकास जैसे सवालों पर सोचने वाले राजनेता थे। नर्मदा समग्र संगठन के माध्यम से उनके काम हम सबके सामने हैं। नर्मदा समग्र का जो कार्यालय उन्होंने बनाया उसका नाम भी उन्होंने ‘नदी का घर’ रखा। वे अपने पूरे जीवन में हमें नदियों से, प्रकृति से, पहाड़ों से संवाद का तरीका सिखाते रहे। प्रकृति से संवाद दरअसल उनका एक प्रिय विषय था। दुनिया भर में होने वाली पर्यावरण से संबंधित संगोष्ठियों और सम्मेलनों मे वे ‘भारत’ (इंडिया नहीं) के एक अनिवार्य प्रतिनिधि थे। उनकी वाणी में भारत का आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का निरंतर प्रवाह दिखता था। एक ऐसे समय में जब बाजारवाद  हमारे सिर चढ़कर नाच रहा है, प्रकृत्ति और पर्यावरण के समक्ष रोज संकट बढ़ता जा रहा है, हमारी नदियां और जलश्रोत- मानव रचित संकटों से बदहाल हैं, अनिल दवे की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

(लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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नए और जोखिम प्रयोग क़े लिए याद किए जाएंगे संपादक बच्चन सिंह

वरिष्ठ पत्रकार बच्चन सिंह जी का अवसान हिंदी पत्रकारिता के एक युग का अंत है. बच्चन जी दरअसल पुरानी से लेकर अति आधुनिक पत्रकारिता तक के सफर के युग का  प्रतिनिधित्व करते थे. उन्होंने जो मानक स्थापित किये, वह भाषायी पत्रकारिता के 80 के दशक के बाद के एक सौ संपादक भी मिलकर नहीं कर सकते. पत्रकारिता में जो बदलाव को लेकर जो समझ और अनुमान उन्होंने तीन दशक पहले लगा लिए था, वह आज सामने  है.

बच्चन जी ने जिस भी अख़बार में काम किया वहां अपनी दूरदर्शिता की जो छाप छोड़ी वह भूली नहीं जा सकती. वह जिस भी अख़बार में जाते थे, उसका तेवर ही बदल जाता था. भाषा से लेकर हैडिंग तक में वह अख़बार अलग ही पहचान बना लेता था.  मेरा उनके साथ काम करने का लंबा अनुभव रहा है. पत्रकारिता में वह मेरे मार्गदर्शक थे. मैंने उनके जैसा संपादक अपने तीन दशक के पत्रकारिता करियर में कभी नहीं पाया. न गुस्सा और न किसी बात पर खीज. न ईर्ष्या और न किसी के बारे में नुक्ता-चीनी. उनके अधीन काम करने वाले बड़ी से बड़ी गलतियां कर बैठते थे लेकिन अगले दिन जब उनके चैम्बर में सम्बंधित सहयोगी जाता था तो अपने गुस्से को  प्रकट नहीं करते थे. शालीन और कम शब्दों में वह उसे अख़बार में की गयी गलती बता देते थे. सहयोगी इतना शर्मिंदा हो जाता था क़ि उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाता था. काम लेने और करने का अदभुत तरीका था उनका.

मैं 1986 में उनके निर्देश पर जब दैनिक जागरण इलाहाबाद छोड़ कर स्वतंत्र भारत वाराणसी ज्वाइन करने गया तो उन्होंने मुझे खेल से साथ ही फीचर, सेंट्रल डेस्क की जिम्मेदारी दी. लिखने के लिए खूब प्रोत्साहित किया. स्वतंत्र भारत नया नया लांच  हुआ था. उन्ही के नेतृत्व में. बहुत मेहनत  की थे लांच होने के बाद से एक साल तक. 18 घंटे तक हम लोग काम करते थे. और, नतीजा यह निकला क़ि इस  अख़बार ने  वाराणसी में आज को  पीछे कर नंबर 2 में स्थान बना लिया. उस समय वाराणसी में आज और दैनिक जागरण ही बराबर के अख़बार थे और दोनों का सर्कुलेशन लगभग समान था, कभी कोई बढ़त ले लेता था तो कभी कोई, ऐसी हालात में तीसरे अख़बार के लिए गुंजाइश कम ही बचती है, तब बच्चन जी ने अनूठा प्रयोग किया. उन्होंने तय किया क़ि ऐसा अख़बार निकल जाये जो भाषा से लेकर मेकअप तक में एकदम अलग हो. यह एक बड़ा रिस्क भी था. लोग पसंद कर लें, इसकी कोई गारंटी नहीं थी, फिर नए नए प्रयोगों के पक्षधर बच्चन जी ने इस रिस्क को स्वीकार किया.

ले आउट छह कालम का और भाषा एकदम सरल और उसमे अंग्रेजी के भी शब्द. जैसे दौड़ की जगह रेस, दरवाजे की जगह डोर, होनहार की जगह टैलेंट. कुर्सी-मेज की जगह चेयर-टेबल, प्रबंधक की जगह मैनेजर आदि दिए जाने लगे. जब अख़बार में इस तरह के शब्दों को शहर क़े पत्रकारों ने पढ़ा तो उन्होंने आपत्ति जताई और इस हिंदी पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ माना. बच्चन जी का तर्क था क़ि आने वाले समय में लोग क्लिष्ट हिंदी नहीं पढ़ेंगे. वह वही पढ़ना पसंद करेंगे जो बोलते हैं और जो शब्द बोलने में प्रयुक्त होता है, वही अख़बार में भी लिखना चाहिए. उनका यह फैसला सही साबित हुआ और स्वतंत्र भारत ने पाठकों के बीच मजबूती से अपना स्थान बना लिया. इस तरह शब्दों के मामले में  वाराणसी की पारंपरिक हिंदी पत्रकारिता से कुछ हटकर थी बच्चन जी की पत्रकारिता.

ताकतवर लोगों ने की खूब साजिश

स्वतंत्र भारत वाराणसी ने जितने कम समय में जिस तेजी से  सफलता हासिल की थी उसी  तेजी से उसका   दुर्भाग्य पीछे-पीछे दौड़ रहा था. दो साल होते-होते यूनियन ने बोनस की मांग को लेकर हड़ताल कर दी. लेबर ऑफिस ने अख़बार में लॉक आउट घोषित कर  दिया. 26  दिन बाद  लॉक आउट हटा तो अख़बार को फिर से नयी ऊर्जा के साथ मार्किट में लाने की चुनौती थी. इस बार अख़बार फिर आगे बढ़ा लेकिन दूसरे स्थान से काफी दूर ही रहा. दरअसल,  बच्चन जी की सफलता ही उनकी दुश्मन बनती जा रही थी.

लखनऊ में उच्च पदों पर बैठे अख़बार के अधिकारी बच्चन जी के खिलाफ मैनेजिंग डायरेक्टर शिशिर जैपुरिया के कान भरने लगे. उन्हें खतरा इस बात का था क़ि बच्चन जी को कही वाराणसी के साथ ही लखनऊ का भी संपादक न बना दिया जाये. बात-बात पर अख़बार में बिना वजह नुक्स निकाले जाने लगे. बच्चन जी को आभास हो गया था क़ि  साजिश करने वाले काफी ताकतवर हैं, इसलिए उन्होंने  सितम्बर  1988  में इस्तीफा दे दिया है.   कुछ दिन बाद  ही बोनस की मांग को लेकर फिर हड़ताल हो गयी.. इस बार 16  दिन चली. जब हड़ताल ख़त्म हुई और अख़बार छपने लगा तो मार्किट में हम बहुत पीछे हो चुके थे.

पाठकों  ने इस अख़बार से नाता तोड़ लिया था. हॉकर्स ने अख़बार उठाने से इनकार कर दिया. वर्क्स मेनेजर के सी इन्दोरिया को लखनऊ बुलवाया गया और उनसे पूछा गया कि अख़बार को फिर से पटरी पर लाने के लिए क्या किया जा सकता है? इन्दोरिया जी ने सुझाव दिया कि किसी नामी चेहरे को संपादक  बनाकर भेजा जाये तो हो सकता है कुछ लाभ मिल जाये. जाने-माने साहित्यकर ठाकुर प्रसाद सिंह को संपादक बनाया गया. कुछ असर तो दिखा लेकिन तब   तक अख़बार में अनुशासनहीनता बढ़ गयी थी. यूनियन के नाम पर कामचोरी और मनमानी  होने लगी थी. ठाकुर प्रसाद उत्तर प्रदेश के सुचना निदेशक पद से कुछ समय पहले ही रिटायर्ड हुए थे. स्वाभाव से सरल होने के कारण संपादकीय टीम पर वह नियंत्रण नहीं कर सके. और 1987 समाप्त होते-होते जैपुरिया  खानदान ने इस अख़बार को बेच दिया

क्यों थे अन्य संपादकों से अलग?

बच्चन जी को बरेली से दैनिक जागरण लांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी.. अख़बार अक्टूबर 1986 में शुरू होना था. सितम्बर में उन्होंने मुझे स्वतंत्र भारत छोड़कर बरेली पहुँचने को कहा. मैं पहुँच गया. सुबह ऑफिस गया और बच्चन जी मुझे देख बहुत खुश हुए. लेकिन अगले दिन ही कुछ ऐसी स्थिति आ गयी कि मैं जागरण न ज्वाइन करके अमर उजाला ज्वाइन कर लिया. जागरण में प्रस्तावित वेतन से 800  रूपये ज्यादा में. बच्चन जी की महानता देखिए, उन्होंने मुझे न रोका और न बुरा माना. वह तो इस बात पर खुश थे कि मुझे 800 ज्यादा मिल रहे हैं. यही सब गुण बच्चन जी को अन्य संपादकों से अलग करता था.

दंगे की ख़बरों में मृतकों का नाम छपने की परंपरा डाली

अमर उजाला की बरेली मंडल और कुमाऊं (उत्तराखंड) में भरी साख थी. उसके मुकाबले जागरण को जगह बनाना चुनौतीपूर्ण काम था. जागरण लांच होने के 10  दिन बाद (november 1986) में  किसी मामूली बात पर बदायूं (बरेली से 40 km दूर) में दंगा फैल गया.  इतना भीषण दंगा कि कण्ट्रोल नहीं हो पा रहा था. सेना बुलानी पड़ी थी.  बच्चन जी ने कवरेज की वह परंपरा तोड़ी जो कोई भी संपादक हिम्मत नहीं जुटा सकता. उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों के नाम छापे. अमर उजाला ऐसा नहीं कर रहा था. नाम छापने से जागरण को फायदा यह हुआ कि लोग उसे खरीदने लगे.

बरेली के तत्कालीन कमिश्नर डी पी सिंह और आई जी जोन अजय राज शर्मा ने बच्चन जी को फ़ोन करके सलाह दी कि नाम छापने से दंगा नहीं कण्ट्रोल होगा..बच्चन जी ने जवाब दिया कि नाम नहीं छापने से अटकलें और अगवाहें फैलती हैं,  इसलिए लोगों को पता होना चाहिए कि कौन ज्यादा ज्यादती कर रहा है, उसी इलाके में  पुलिस को प्रभावी एक्शन लेना चाहिये. कमिश्नर ने दूसरे दिन फिर फ़ोन किया और चेतावनी दी कि अगर मृतकों का नाम छपा होगा तो वह अख़बार को नहीं बंटने देंगे. बच्चन जी ने कहा, करके देख लीजिये लेकिन आप इसमें सफल नहीं होंगे.  कमिश्नर ने बदायूं में अख़बार की गाड़ी रोककर बंडलों को जब्त करवा दिया. इसका भी जागरण को लाभ मिला. लोगों को लगा कि प्रशासन जान बूझ कर ऐसा कर रहा है.लोगों तक सही बात पहुँचने से रोक रहा है. हलाकि अगले ही दिन प्रशासन को अपनी कार्रवाई वापस लेनी पड़ी.

देश के सभी भाषायी अख़बारों के संपादकों में बच्चन सिंह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दंगो में मृतकों के नाम देने की शुरुवात की. और अब तो बड़े-बड़े अंग्रेजी के भी अख़बार नाम देते हैं.जागरण बरेली मंडल में ठीक-ठाक स्थान बनाने में सफल रहा. दुर्भाग्य से बरेली में भी वह अपनों के ही छल- कपट की राजनीति का शिकार हुए और जागरण छोड़ना  पड़ा  यहाँ कुछ समय संवाद केसरी पत्रिका के साथ जुड़े फिर वाराणसी लौट गए अपने घर. घर में वह किताब लिखने में खुद को व्यस्त रखते थे.

मूल्यांकन नहीं हुआ

बच्चन सिंह जी प्रचार और झूठी  वाहवाही से दूर रहते थे. चापलूसी उनके खून में नहीं थी. अख़बार को बढ़ाने क़े मामले में उनसे बेहतर सोच वाला संपादक मैंने कभी नहीं देखा. उनमे एक मरे हुए अख़बार में प्राण डालने का सामर्थ्य था. वह जितना योग्य थे उतना सौ संपादक मिलकर भी उनके जैसी  योग्यता हासिल नहीं कर सकते हैं. वह तर्क नहीं करते थे. कोई खुद को ज्यादा समझदार बनने  की कोशिश करता था तो उसे भी सम्मान देते थे. उनका फार्मूला था कि युवा ही संपादकीय टीम के ऑक्सीजन होते हैं इसलिए युवा रिपोर्टरों को रिस्क वाले काम सौंपते थे.

उनकी कमजोरी यह थी कि एक बार जिस किसी भी सहयोगी पर विश्वास कर लेते थे तो फिर उससे सम्बन्ध नहीं तोड़ते थे, भले ही वह उन्हें धोखा  क्यों न दे दे? अखबारी दुनिया में बच्चन जी का मूल्यांकन नहीं हुआ. पत्रकारिता का दुर्भाग्य देखिये,  संपादकीय सहयोगियों को हंटर के जरिये  हांकने  की कला में कुख्यात  लोग ग्रुप एडिटर, प्रधान संपादक, एडिटोरियल  प्रेसीडेन्ट जैसे पद पाकर खुद को सुपर जर्नलिस्ट तो मान बैठे. लेकिन अपना  दिमागी संतुलन  कायम नहीं रख सके. इन बड़े पद वाले कथित पत्रकारों में न मर्यादा दिखती है और न शालीनता. दिखता है तो सिर्फ ढोंग और बनावटी व्यक्तित्व. पत्रकारिता में नए और जोखिम प्रयोग के लिए बच्चन जी हमेशा याद किये जायेंगे. उनके साथ और सानिध्य में काम करने वाले उन्हें कभी नहीं भूल सकेंगे.

सम्मान की योजना बनी थी

कुछ दिन पहले ही मैं इलाहाबाद में अपने कुछ पुराने दोस्तों के साथ मिलकर बच्चन जी का जोरदार सम्मान करने की योजना बना रहा था. बच्चन जी की मौत के दो दिन पहले ही मेरी दूरदर्शन के पूर्व संपादक और बच्चन जी क़े मित्र डॉ अशोक त्रिपाठी से इस सम्बन्ध में बात हुयी थी. उन्होंने बच्चन जी के जीवन और कृतित्व पर एक फोल्डर छपाने का सुझाव दिया.  31 जनवरी को सुबह मेरे 35 साल पुराने मित्र डॉ प्रदीप भटनागर (पूर्व संपादक दैनिक भास्कर झालावाड़) ने मुझे फ़ोन कर बताया कि बच्चन जी नहीं रहे. उन्होंने दोपहर में कंपनी बाग़ में शोक सभा बुलाई.  प्रदीप भी बच्चन जी के सानिध्य में काम कर चुके हैं.

इंद्र कांत मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार

9827434787

heritagemental@yahoo.in


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श्रद्धांजलि : बच्चन सिंह और खुरदरी चट्टानों की यादें

खुरदरी चट्टान से जीवन पर / आशा के बादल बरसे जरूर हैं। पर नहीं उगा सके / सुख की एक हरी कोपल भी। और… / मैं बांझ चट्टान की तरह / चुपचाप अड़ा रहा, खड़ा रहा। अपने से ही लड़ता रहा / जीत-हार का फैसला किए बिना / मजबूरी की राह चलता रहा…।

देश के मूर्धन्य पत्रकार और संपादक नरेंद्र मोहनजी की यह कविता दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट में 18 अगस्त 1991 को छपी थी। तराई के सिख आतंकवाद को इंगित करते हुए लिखी गई इस कविता के साथ छपी थी मेरी लीड स्टोरी। शीर्षक था- ‘तराई में लहलहाई आतंक की फसल।’

नरेंद्र मोहनजी की कविता मजबूरी की राह नहीं, मेरी जिंदगी की राह बनी..। मेरे जीवन की प्रेरणा बनी…, आस्था बनी…, जिसमें हकीकत का रंग भरा हमारे गुरु, मार्गदर्शक, यशस्वी पत्रकार और संपादक बच्चन सिंहजी ने। यह बात उन दिनों की है जब मैं दैनिक जागरण के बरेली संस्करण में उनके सानिध्य में आतंकवाद के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, तमाम बिद्रुपों के खिलाफ और समाज की पथरीली चट्टानों से फौलादी इरादों के साथ जंग लड़ने की तरकीब सीख रहा था…।

बुलंद हौसले के पीछे मेरी प्रेरणा और ताकत थे बच्चन सिंहजी। विषय कोई भी हो, लिखने से न कभी रोका, न टोका, बल्कि हर समय खुरदरी चट्टानों पर पथरचट्टी घास उगाने की प्रेरणा देते रहे…। कभी मर्यादा के पहाड़ों पर चढ़ना सिखाया तो कभी जीवन की मजबूरियों का रंग-ढंग समझाया। उनके साथ काम करते हुए अंधेरे बहुत थोपे गए, लेकिन मन का उत्साह, हर स्थिति से मुकाबला करने का तेवर और आगे बढ़ने का हौसला कभी दफ्न नहीं हुआ। हमेशा उमंगों के निर्झर झरनों की तरह बहता रहा। ऊबड़-खाबड़ जिंदगी के बावजूद बारिश के बुलबुलों की तरह सपनों को फूटने नहीं दिया। जिंदगी की पथरीली ढलान पर आशा के बादलों को बरसाने की ताकत किसी और ने नहीं, बच्चन सिंहजी ने ही दी। 

यूं सीखा हौसले का जज्बाः उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में हिंसा और सिख आतंकवाद का नया दौर शुरू हुआ तो बच्चन सिंह ने गोला-बारुदों, असाल्ट रायफलों और बमों से खून की होली खेलने वाले आतंकवादियों से लड़ने के लिए मुझे अपनी टीम का कमांडर चुना। यहां बताना चाहता हूं कि वाराणसी से दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में इंट्री हमें बच्चन सिंहजी ने ही दिलाई थी। दैनिक जागरण के बरेली संस्करण के संपादक बने तो उन्होंने प्रधान संपादक नरेंद्र मोहनजी से सबसे पहले मुझे मांगा। लखनऊ के संपादक विनोद शुक्लाजी की नजर में मेरी इमेज काफी अच्छी थी। वह नहीं चाहते थे कि हम लखनऊ छोड़ें। मगर जब बरेली संस्करण को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने का जिम्मा खुद उन्हें सौंपा गया तो उन्होंने सबसे पहले मुझे ही बरेली बुलाया।

एक अगस्त 1989 को बरेली पहुंचा। खुरदरी और विशाल चट्टानों को पिघलाने के लिए…। शिलाजीत बनाने के लिए…। ऐसा वटवृक्ष लगाने के लिए जो न कभी झुके, न कभी टूटे…। बरेली में बच्चन सिंहजी से जो पहला पाठ सीखा वह था काई जमी और फिसलनभरी चट्टानों की ढलानों पर जांबाज कमांडो की तरह डटे रहने की। कई मौके आए, कई मोड़ आए-हर बार मुझे ही आजमाया गया।

लखनऊ से बरेली पहुंचते ही बदायूं के दंगे की कवरेज का जिम्मा मुझे सौंपा गया। पास हुआ तो बरेली के दंगे में लगा दिया गया। तराई में पंजाब का आतंकवाद छलका तो यथार्थ के कब्रिस्तान में मर्यादा के पहाड़ के बीच से रास्ता निकालने का दायित्व मुझे ही मिला। पत्रकारिता के आसमां में उन्मुक्त पंक्षी की तरह मैं भी उड़ना चाहता था। बुलंद हौसले के साथ जीवन की मजबूरियों को…, अंधेरे के घटाटोप को… छलनी करते हुए आगे बढ़ाता गया। इस दौरान न कभी मर्यादा के पहाड़ को लांघा और न ही पथरीले रास्तों पर फिसला। सपने मन को भाते रहे। बच्चन सिंहजी सिखाते रहे। तरक्की की कोपलें फूंटती रहीं। सिर्फ दिलेरी ही नहीं, हौसला ही नहीं, बोल-चाल की भाषा भी उनसे ही सीखी। पत्रकारिता में बेहद कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दों की मठाधीशी से परहेज करने का गुर उनसे ही सीखा।

अंगारों पर चलने की सिखाई कलाः तराई का सिख आतंकवाद यथार्थ का कब्रिस्तान था। इस कब्रिस्तान में हमने अनगिनत रिपोटर्स लिखी। इस दरम्यान बच्चन सिंहजी ने मुझे दो ऐसे टास्क दिए, जिसे मैं कभी नहीं भुला पाया।

16 अक्टूबर 1991 की रात रुद्रपुर (तब नैनीताल जिले की नगर पालिका थी) में आतंकवादियों ने रात 11.10 बजे रम्पुरा रोड स्थित रामलीला मैदान में ब्लास्ट किया। दर्जनों दर्शक मौके पर मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। तमाम लोगों के शरीर के क्षत-विक्षत अंग सौ-सौ मीटर दूर जा गिरे। घायलों को हल्द्वानी, किच्छा, बाजपुर और बरेली भेजा गया। मुसीबत में फंसे वे लोग जिन्हें रुद्रपुर अस्पताल ले जाया गया। आतंकवादियों ने वहां भी शक्तिशाली बम लगा रखा था। लोगों का हुजूम घायलों को लेकर पहुंचा तो वहां भी ब्लास्ट हो गया। दर्जनों लोग मौके मारे गए।

रात करीब 11.20 बजे खबर बरेली पहुंची तो बच्चन सिंह ने फौरन गाड़ी बुलाई और मुझे फोटोग्राफर के साथ मौके पर रवाना कर दिया। उन दिनों न तो मोबाइल का साधन था, न तार वाला फोन सामान्य रूप से उपलब्ध था। हम रात में ही करीब 72 किमी दूर ऊबड़-खाबड़ रास्ते से रुद्रपुर पहुंचे। घटना की कवरेज की। वहां से लौटे और सिटी संस्करण में हमारी रपटें छपीं। रुद्रपुर कांड में तब तक 70 लोगों की मौत हो चुकी थी। खबरों के अलावा दो पेज तो घटना की तस्वीरें ही छपीं।

अगले दिन 17 अक्टूबर की सुबह नाश्ता भी नहीं कर पाया था, तभी संपादक बच्चन सिंहजी का आदेश मिला- फोटोग्राफर के साथ तत्काल रुद्रपुर पहुंचो। 24 घंटे से जगे थे। भूख से बेहाल थे। बगैर समय गंवाए निकल पड़े टास्क पर। दोबारा साथ में थे हमारे वरिष्ठ साथी शिव प्रसाद सिंहजी (मौजूदा समय में हिन्दुस्तान के गोरखपुर संस्करण में वरिष्ठ समाचार संपादक)। नेकदिल, बेहद संजीदा, दूसरों के दुख-दर्द पर आंसू बहाने वाले। हम रुद्रपुर पहुंचे तो लोगों के अंग-भंग शवों को देख हम सभी की आंखें छलछला उठीं। शाम को हम कवरेज करके लौटे। मेरी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने उस महिला को गिरफ्तार कर लिया, जिसने आतंकवादियों को अपने घर में पनाह दी थी। 

लड़ गए मौत सेः दूसरी घटना एक अगस्त 1992 की है। पीलीभीत जिले के सुदूरवर्ती गढ़ा रेंज के घनघोर जंगल में आतंकवादियों ने 29 ग्रामीणों का अपहरण कर लिया था। ये ग्रामीण उन इलाकों में पहुंच गए थे, जहां आतंकवादियों ने किसी भी हालत में उस तरफ न आने का फतवा जारी कर रखा था। कटरुआ (एक पेड़ की जड़ में निकलने वाला फल) निकालने के चक्कर में भोले-भाले ग्रामीण खौफनाक इलाके की ओर चले गए। गढ़ा रेंज के जंगल से होकर गुजरने वाली सकरिया नदी के पास भिंडरवाला टाइगर फोर्स का मुखिया सुखदेव सिंह उर्फ छोटा छीना ट्रेनिंग कैंप चलाता था। इस जंगल में पीलीभीत जिला पुलिस जाने के बारे में सोचती तक नहीं थी। पीलीभीत के इस जंगल में पुलिस का नहीं, कुख्यात आतंकवादी सुखदेव की समानांतर सरकार चलती थी। उसका राज चलता था और हुक्म (फतवा) भी चलता था।

29 ग्रामीणों के गायब होनों की खबर पुलिस के लिए अबूझ पहेली की तरह थी। तीन अगस्त 1992 को संपादक बच्चन सिंहजी ने मुझे गढ़ा रेंज जाने का निर्देश दिया। मेरे साथ था मेरा सहयोगी अनिल गौरव (अब दुनिया में नहीं)। क्राइम रिपोर्टिंग वही करता था। पगडंडियों के सहारे घंटों हिचकोले खाते हुए हम जंगल में पहुंचे। तक तक रात हो चुकी थी। हर तरफ घुप अंधेरा था। जंगल में अगर कुछ था तो सिर्फ पेड़-पौधे और झाड़ियां। हम गढ़ा रेंज के जंगल में घुस तो गए, लेकिन वापस आने का रास्ता ही नहीं सूझा। रुक-रुककर हो रही बारिश के बीच भूखे-प्यासे जंगल में पड़े रहे। हमारा कोई लोकेशन नहीं मिला तो बच्चन सिंहजी ने वायरलेस से सूचना प्रसारित करा दी कि आतंकवादियों ने हम सभी का अपहरण कर लिया है। मामला पत्रकारों का था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया। समूचे तराई इलाके में चप्पे-चप्पे पर वाहनों की तलाशी शुरू हो गई। बच्चन सिंह और हमारे साथी चिंता में डूब गए।

उधर, जंगल में भूख से हम सभी की अतड़ियां सूखती जा रही थीं। लाचारी में पेड़ों की पत्तियां खानी पड़ी। गड्ढे में इकट्ठा बारिश के पानी से प्यास बुझानी पड़ी। जंगल में सांपों का जमघट था। जंगली जानवर थे। रुह कंपा देने वाली कीट-पतंगों की डरावनी आवाजें थीं। जंगल में हम सभी गाड़ी में पड़े रहे। सिकुड़े हुए और बेदम। आधी रात में बारिश थमी और आसमां से चांद भी बाहर निकला। हमने हिम्मत की और करीब आधे घंटे की मेहनत के बाद सीताफल का एक पेड़ ढूंढने में सफल हो गए। सीताफल के फलों ने हमें थोड़ी ताजगी दी।

तड़के आसमान में चील और गिद्धों को मंडराते हुए पाया तो उन्हें देखते हुए आगे बढ़े।  सकरिया नदी के पास पहुंचे तो देखा कि ग्रामीणों की लाशें पानी में फूलकर उतरा रही हैं। दूर-दूर तक बदबू फैली थी। पास में आतंकवादियों के बंकर और वाच टावर थे। शायद घटना के बाद आतंकवादी अपना ट्रेनिंग कैंप छोड़कर जा चुके थे। काफी जद्दोजहद के बाद सुबह करीब दस बजे भटकते हुए जंगल से बाहर निकले। हम समीप के एक पुलिस बूथ पर पहुंचे। सुरक्षाकर्मियों को मारे गए ग्रामीणों के बारे में जानकारी दी। साथ ही वायरलेस से अपने कुशलक्षेम के बारे में बरेली सूचना पहुंचाई।

करीब आठ घंटे बाद हजारों जवानों के साथ पुलिस और प्रशासनिक अफसर हमारी मदद से सकरिया नदी के पास पहुंच सके। बाद में सभी 29 शवों को ट्रैक्टर पर भूसे की तरह लादकर पीलीभीत लाया गया। अगले दिन लाशों को कफन नसीब हुआ।

दोनों घटनाओं ने मुझे खुरदरी चट्टानों से टकराने की ताकत दी। यह ताकत, यह हौसला, जीवन की कठोर सच्चाइयों की पटकथा लिखने का हुनर सबकुछ संपादक बच्चन सिंहजी से ही सीखा। मुझे गर्व है कि वे मेरे ऐसे मार्गदर्शक बने, जिन्होंने मुझे खतरों से लड़ने और निडर होकर सच लिखने की ताकत दी, हौसला दिया। उनके दिखाए पथ पर मैं अनवरत आगे बढ़ता जा रहा हूं। मेरी कोशिश है कि उनके सपनों को…, उनकी उम्मीदों को…, उनके आदर्शों को… कभी दाग न लगे। संपादक बच्चन सिंहजी मेरे प्रेरणा पहले भी थे और कल भी रहेंगे।

लेखक विजय विनीत जनसंदेश टाइम्स के वाराणसी संस्करण में समाचार संपादक हैं।

मूल खबर…

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अतुल माहेश्वरी की पुण्य स्मृति : इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा…

Shambhunath Shukla : नौकरी छोड़े भी चार साल हो चुके और अमर उजाला में मेरा कुल कार्यकाल भी मात्र दस वर्ष का रहा पर फिर भी उसके मालिक की स्मृति मात्र से आँखें छलक आती हैं। दिवंगत श्री अतुल माहेश्वरी को गए छह वर्ष हो चुके मगर आज भी लगता है कि अचानक या तो वे मेरे केबिन में आ जाएंगे अथवा उनका फोन आ जाएगा अरे शुक्ला जी जरा आप यह पता कर लेते तो बेहतर रहता। इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा।

साल 2002 की अगस्त में मैने अमर उजाला ज्वाइन किया था और 2011 की तीन जनवरी को वे नहीं रहे पर इतने ही वर्षों में उन्होंने ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो दुर्लभ थी। वे अपना बुरा चाहने वालों का भी भला चाहते थे। स्वयं का नुकसान उठाकर दूसरों का भला करने में भरोसा करते थे और अपने कर्मचारियों को अपना सहकर्मी समझते थे। संपादकीय विभाग के लिए वे एक पत्रकार पहले थे मालिक बाद में। हारी-बीमारी में मदद करने के लिए उनका हाथ सदैव खुला रहता और अपना दिया पैसा वापस लेने में वे उतना ही संकोच करते। ऐसे अमर उजाला के स्मृतिशेष मालिक को कोटिश: प्रणाम।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के इस एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Vivek Shukla : मेरा अतुल जी से परिचय भाई Hari Joshi जी ने 1988 में करवाया। मैं सन्डे मैगज़ीन के लिए लिखने लगा। फिर एक दिन उन्होंने मुझे मेरठ बुलाया। कहा, आप दिल्ली से खेल और बिज़नेस पर लिखो। 1989 में लोक सभा चुनाव, फिर खाड़ी युद्ध और उसके बाद भी अमर उजाला से दैनिक हिन्दुस्तान में रहते हुए जुड़ा रहा। कई बार उनसे बंगाली मार्किट में मिला भी। बेहतरीन इन्सान थे वे। पर बाद में अमर उजाला में भी कुछ मित्रों को हटाया गया तो लगा क़ि बदलने लगा है अमर उजाला।

Lalit Chaturvedi : शत शत नमन। शुक्ला सर पत्रकारिता के इस असाधारण व्यक्तित्व की असामयिक मौत प्राकृतिक तो नहीं थी। यह बात दबी जबान से आप सभी जानते हैं। आश्चर्य है कि 6 वर्ष बाद भी परिवार या वाह्य आवरण में इस प्रश्न को किसी ने नहीं छेड़ा। सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब इस तथ्य की निष्पक्ष जाँच होगी तथा सच सामने होगा। हां, अतुल भाई साहब के जाने से कुछ लोग आज अरबों में जरूर खेल रहे हैं। उन्हें सजा दिलाना जरूरी है।

Surendra Mohan Sharma : दस ग्यारह वर्ष की उम्र में अतुल और राजुल के साथ बचपन में खेलने का मौका मिलता था जब वे अपने पिता श्री मुरारीलाल माहेश्वरी जी के साथ होलीगेट मथुरा पर रहते थे। उनके पिता और मेरे पिता का अच्छा दोस्ताना था उस समय। असमय ही चले गए अतुल। नमन।

Harendra Narayan : बहुत सच्चे इंसान. भोपाल में पत्रकारिता के बाजारवाद पर खुद का लिखा पेपर पढा था। आज भी याद है। मुझे बुलाया था। समय ऐसा बदला फिर उनसे मिलना ना हुआ। अब न वो रहे, न मैं पत्रकारिता में! ऐसे इंसान को श्रद्धासुमन।

Mukesh Shriram : अतुलजी को सादर नमन…आज के सभी मीडिया मालिकों को अतुलजी जैसा मन और समर्पण मिले। कोटिशः धन्यवाद…

राकेश कुमार मिश्रा : स्व. डोरी लाल अग्रवाल जी मुरारी माहेश्वरी जी से विनम्रता सीखी है अगली पीढ़ियों ने। क्या ग़ज़ब लोग थे ये।


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यादे! कितने सरल और सहज थे अतुल माहेश्वरी

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अनिल यादव ने जब लेखक बनने के लिए लंबी छुट्टी की अर्जी अतुल माहेश्वरी को दी…

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अतुल माहेश्‍वरी ने कहा- जाकर कानपुर में संपादकीय प्रभार संभालिए

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वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने अपने अदभुत पापा को यूं दी श्रद्धांजलि

अलविदा डेविड कॉपरफील्ड. ये उपमा जस्टिस सुरेश दत्त झा के लिए है जो संयोग से हमारे पिता थे. वो अकसर खुद अपनी तुलना डेविड कॉपरफील्ड से करते थे. उन्होंने बड़ी कठिनाइयों में अपना शुरुआती जीवन गुजारा था पर इससे कभी वह विचलित नहीं हुए. उल्टे, यह उनकी ताकत बना. उन्होंने आगे बढने के लिए मेहनत की, अपनी लाचारी का रोना नहीं रोया. यह जरूर है कि वह अपने रिश्तेदारों के घर रहकर पढे थे. जाहिर है उन्हें बड़ी दिककतें पेश आई होंगी पर उनके चेहरे पर कभी किसी के लिए शिकन नहीं देखी, उपेक्षा नहीं देखी.

वह बताते थे कि पहली बार अपने अमीर भाई का जूता सुधरवाकर जब उन्होंने पहना तो उन्हें लगा था कि वह हवा में उड रहे हैं. कैसे वह रोज शाम अपनी इकलौती शर्ट धोकर पहनते थे. उन्हें कभी जरूरत महसूस ही नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट जज के बराबर उपलोकायुक्त के पद पर रहे थे वो. कई बार हमें लगता कि पापा इतने सीधे और सरल क्यों हैं. कहीं वो इस दुनिया से परे किसी दूसरी दुनिया से तो नहीं आए हैं? हम उनके परम मित्र और मध्यप्रदेश के डीजीपी रहे दिवंगत आईपीएस अधिकारी आनंद कुमार से यह पूछते कि बदमाश से बदमाश आदमी उन्हें बुरा क्यों नहीं लगता तो अंकल कहते कि यह तुम्हारे पापा का न्यायिक नजरिया है जो तब तक किसी को बदमाश नहीं मानता जब तक कि यह साबित न हो जाए. उन्हें कभी किसी पर गुस्सा आता था या नहीं, यह भी हम कभी नहीं समझ पाए. वह बड़े अच्छे किस्सागो थे. उनके पास किस्सों का खजाना था और वह ऐसे दिलचस्प तरीके से सुनाते कि कोई ऊब नहीं सकता था.

कानून के सिपहसालार

वह कानून के बड़े पाबंद थे और अपने काम के लिए किसी की परवाह नहीं करते थे. कभी देश के किसी सर्वोच्च नेता का चर्चित बेटा उनके पीछे पड़ गया था. उसकी कर्नाटक की बहुचर्चित खानों में दिलचस्पी थी और वह अपने किसी समर्थक को वह खान दिलाना चाहता था. पर पापा तो पापा ठहरे. उन्होंने टका सा जवाब दे दिया कि जो भी होगा नियम-कानून से. धमकियों के दौर चल पड़े पर वो जरा भी विचलित नहीं हुए. इसी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि हम लोग पेरिस कन्वेंशन के सदस्य बन जाएं. उदारवाद की दिशा में यह पहला कदम था. पर उस जमाने में पापा को ये बात जंची नहीं. उनके हिसाब से यह संधि विकसित देशों के लिए उपयोगी थी. हम जैसे पिछड़े देश में दवाइयों के बाजार में इसका सदस्य बनते ही हाहाकार मच जाता. इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी बातें थी इसमें जिससे अपनी अर्थव्यवस्था बैठ जाती. उन्होंने जब अपनी यह राय इंदिरा जी के सामने रखी तो वह मान गर्इं. बौद्धिक संपदा का वो जमाना कुछ और था. नेता और मंत्री अफसरों की राय को वजन देते थे. विधि मंत्रालय में पापा के पास कम से कम 20 मंत्रालय थे. इन सभी मंत्रालयों को वही सलाह देते थे. एक बार मध्यप्रदेश के किसी मुख्यमंत्री से भी उन्होंने कहा था कि कानून बनाना कोई भुट्टा भूनना नहीं है. इसका पूरे देश और दुनिया पर असर पड़ता है.

कहानी पर बवाल

फिल्म उद्योग से जुडे किसी लेखक शायद ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर एक बार बवाल मच गया. यह कहानी उस जमाने की बहुचर्चित पत्रिका सारिका में छपी थी और इसका शीर्षक किसी समुदाय विशेष के नाम पर था. देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे. माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर आपात कानूनी राय मांगी. विधि मंत्रालय में तो सबके हाथ-पांव फूल गए. हिंदी जानने वाला कोई शख्स था नहीं जो उसका अनुवाद करता. शाम के छह बज रहे थे. मरते क्या न करते. विधि सचिव वेंकटसूर्या दौड़े-दौड़े पापा से मदद मांगने आए. पापा ने कहानी पढ कर अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया तो पता लगा कि कहानी अधूरी है. इसकी शुरुआत का हिस्सा आया ही नहीं है. खैर किसी तरह उसका गायब भाग पहुंचा और अनुवाद के बाद पता लगा कि कहानी तो उस कौम की तारीफ में है. सरकार यूं ही घबरा रही है. लोग वहम को हवा दे रहे हैं. तब जाकर प्रदर्शन ओर विरोध का दौर थमा. उस दिन वेंकटसूर्या ने उन्हें संकट मोचक कहा था और बाद में वो उन्हें वापस जाने देने को तैयार नहीं थे.

गोपनीयता की रक्षा

पापा की बड़ी तमन्ना थी कि वह अंग्रेजी न्यूज रीडर बनें. सुबह उठते ही वह अकले ही आल इंडिया रेडियो की तर्ज पर अखबार पढते. उनके पास सूचना प्रसारण मंत्राालय भी था. लिहाजा सेंसर बोर्ड वगैरह में दखल रखते थे. कई बार हमें वो अप्रदर्शित फिल्मों की कहानी सुनाते और उस परचर्चा भी करते थे. ‘गांधी’ फिल्म के रोजमर्रा के डेवलपमेंट का मुझे पता रहता. रिचर्ड एटनबरो से समझौता उन्होंने कराया था. पर जब मैं पत्रकार बन गई तो वो मुझसे गोपनीयता बरतने लगे. यह भी कहते कि बेटा तुम्हें अलग रहना पडेगा. जब लड़कियों को लोग घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे तब वह पूछते कुछ इंतजाम हुआ तुम्हारा? पर इसी बीच मेरा विवाह पत्रकार अनंत मित्तल से हो गया और वो नौबत टल गई. मुझे ही नहीं, अपनी सभी संतानों के वो मन की बात करते. हमें रोकते-टोकते नहीं थे कि इतनी रात को कहां चली या इत्ती देर कहां थी. उन्हीं की हौसला अफजाई की वजह से मैं पाटलिपुत्र टाइम्स में काम करने पटना गई थी. और लोग थे कि उसका सबब समझने की बजाय मुझे बहुत तंगहाल मजबूर लड़की समझने लगे थे जिसके घर खाने-पीने को नहीं है. कुछ लोग मुझे घर से भागा हुआ समझते थे. मुझे लोगों की बुद्धि पर तरस आता था. लड़कियों का घर पर एक गिलास पानी निकालना उन्हें पसंद नहीं था. वह अपनी बहू का भी घरेलू काम करना पसंद नहीं करते थे. वह कहते कि ये सेवाएं तो खरीदी जा सकती हैं. शायद इसीलिए उनका आखिरी वाक्य था कि लडकियां काम-धाम छोड़कर आने की हड़बड़ी न करें. सीधे तेरही पर आएं. पर पापा की जैसे इतनी बातें नहीं मानीं, एक और सही. हम वक्त पर पहुंचकर उनके अंतिम दर्शन करने में कामयाब हो गए.

अखबारों की आजादी

अखबार की दुनिया में उनका बड़ा अमूल्य योगदान है. कांग्रेस सरकार इंडियन एक्सप्रेस से परेशान थी. जब जागरण कानपुर से बाहर निकलना चाहता था तो उन्हें सुनहरा मौका मिल गया. जागरण के बहाने इंडियन एक्सप्रेस पर रोक लगाने का विचार चल पड़ा. पापा के पास कानूनी राय के लिए यह मसला आया. तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री उनसे ऐसी राय चाहते थे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. पापा ऐसा लिख दें कि एक्सप्रेस के सारे संस्करण सिमट जाएं. पूरे अध्ययन के बाद पापा ने कहा कि यह ठीक नहीं होगा. इससे संविधान में दिए बुनियादी अधिकारों पर आंच आएगी. और मामला टल गया. सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो उसकी दलील खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने भी पापा की ही राय को आधार बनाते हुए फैसला दिया. आज देश में अखबारों के बहुसंस्करणों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें मेरे पिता न्यायमूर्ति एसडी झा का भी दिमाग लगा है.

कानून में जनभागीदारी

वह मुझे हर हफ्ते स्टोरी आइडिया दिया करते थे. वैसे वो आर्थिक, राजनीतिक और विेदेशी मामलों के बढिया जानकार थे पर उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी गहरी समझ थी. जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में मैने लंबे समय तक कानूनी पहलुओं पर जो लिखा उसमें उनकी खासी मदद मिलती रहती थी. मार्च में वो मुझे बता रहे थे कि कैसे अदालतों से जनता की भागीदारी समाप्त कर दी गई है. वो ज्यूरी सिस्टम की बात कर रहे थे. कह रहे थे कि किसी दिन घंटे भर बात करके मुझे नोट करवा देंगे. इस बात को कई महीने गुजर गए तो बोले बेटा उस पर तो फिल्म भी बन गई है. यही मौका है लिख डालो. वह नानावती कांड पर बनी अक्षय कुमार की फिल्म ‘रूस्तम’ की चर्चा कर रहे थे. उनका कहना था कि सीआरपीसी में अब भी ये प्रोविजन है. मैंने उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. पापा के पास वक्त नहीं था इसलिए वो जोर दे रहे थे और मेरे पास भी वक्त नहीं, लिहाजा मैं कोताही किए जा रही थी. वह दस साल पहले से कह रहे थे कि गंगा पर कोई काम करो और अब गंगा पर चारों ओर काम हो रहा है. एक बार मेरे पति की स्टोरी ‘कार है या कामधेनु’ का स्टोरी आइडिया भी उन्हीं का था. उन्होंने बताया कि कार निर्माण में कितनी बार एक्साइज ड्यूटी लगती है.

अतिथि प्रेमी

हमारे पापा अंदर से बेहद कड़क और दिखने में बहुत सुकुमार थे. उन्हें बहुत जल्दी एलर्जी हो जाती थी. उनकी खासियत ये थी कि वह कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और हम लोगों को भी ऐसा करने से रोकते थे. दिल्ली में हमारे पास मध्यप्रदेश जैसा बंगला नहीं था और मेहमानों का तांता लगा रहता था. उनकी अदालत में अर्जी लगाई- पापा पढाई में बडी दिक्कत होती है, तो बोले- किस्मत वालों के घर मेहमान आते हैं. कल से मुंह बनाओ तो कोई नहीं झांकेगा. ये लोग कहीं भी ठहर सकते हैं, किसी होटल में, भवन में, नेताओं के अहाते में भी ठहर सकते हैं, तुम्हारे ही यहां क्यों आते हैं? हमारे घर को दिल्ली में पड़ोसी मध्यप्रदेश भवन कहने लगे थे.

पदों से वैराग्य

उन्हें किसी पद से मोह नहीं था. न हीं नेताओं से मिलना-जुलना पसंद करते थे. बस काम से काम. वह कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा, कर्नाटक की पूर्व राज्यपाल रमादेवी और राजदूत गिरीश चंद्र  मेहरा जैसे यशस्वी अफसरों के समकालीन थे. रमा देवी ने तो उनके साथ विधि मंत्रालय और कस्टम ट्रिब्यूनल में काम भी किया था. उन्हें पद और पैसे का मोह छू भी नहीं गया था. वह कोई पद लेना ही नहीं चाहते थे वरना न्यायपालिका और कार्यपालिका में उनकी जो पकड़ थी उसमें उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था. उनके जैसा अनुभव न्यायपालिका में विरलों के पास ही होगा. वह फौजदारी और दीवानी कानून तक सीमित आम जज नहीं थे. अपने जीवनकाल में उन्होंने सात बार मध्यप्रदेश के विधिसचिव का पद ठुकराया था. वह तब गए जब वह पद उनके लिए अपग्रेड करके प्रधान सचिव का बनाया गया. इसके अलावा उन्होंने विधानसभा सचिव, इंडिस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और राष्ट्रीय महत्व का एमआरटीपी कमीशन के अध्यक्ष का पद ठुकराया था. एमआरटीपी के अध्यक्ष पद पर समयबद्ध नियुक्ति न कर पाने के लिए तब भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी थी. मुझे याद है मैं उन दिनों नवभारत टाइम्स में थी और ये खबर इकनॉमिक टाठमस में बैनर लीड छपी थी. तब यह पद बेहद ताकतवर था पर कुछ अखबारों ने उन्हें तब विश्वनाथ प्रताप सिंह का महज इसलिए करीबी बता दिया था कि वह उन जैसी टोपी लगाते थे. पापा इससे बेहद विचलित हो गए थे. सच्चाई यह थी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनका कभी कोई साबका ही नहीं पड़ा था.

धान का कटोरा नहीं, भंडार

वह अंग्रेजी के विद्वान थे, इस नाते कई बातों की उनकी अपनी समीक्षा होती थी. जैसे उन्हें छत्तीसगढ को धान का कटोरा कहने पर बडी आपत्ति थी. उनका कहना था कि हमारे यहां तो कटोरा भिक्षा का प्रतीक है. पढने लिखने से जी चुराने वालों को कहते हैं ना- जो ना माने बडों की सीख, ले कटोरा मांगे भीख. अंग्रेजी के ‘राइस बोल’ का सीधा अनुवाद करना ठीक नहीं है. इसे धान का भंडार कहना चाहिए. इसके लिए वह कई शब्दकोश भी देखकर मुझे बताते थे. इस पर मेरा नवभारत में लेख छपा था. ज्ञान का अथाह भंडार और प्रेम का सागर थे मेरे पापा. वह ऐसी-ऐसी बातें बताते जो कई बार हमारी समझ से परे होती. जीवन का तजुर्बा तो बहुतों के पास होता है पर गजब की दृष्टि मिली थी उन्हें. माया मोह से दूर वह वास्तव में इस दुनिया की शख्सियत नहीं थे. वरना आधा दर्जन आकर्षक पदों का मोह छोड़ने के लिए बड़ी हिम्मत और मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए.

पापा दस साल और चल सकते थे. लेकिन उनकी कोई इच्छा अधूरी नहीं थी. पद, पैसा और प्रतिष्ठा भी भरपूर कमा चुके थे.

मुझसे उन्होंने कहा था कि मेरा काम पूरा हो गया है. मेरा शोक मत करना.

ऐसे पापा को इरा, शिप्रा, विक्रमादित्य, स्मिता और शेफाली का प्रणाम.

इरा झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं. उनसे संपर्क irajha2@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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यशवंत ने निदा फ़ाज़ली को कुछ इस तरह दी श्रद्धांजलि (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : निदा फ़ाज़ली साहब के न रहने पर उनकी वो नज़्म याद आती है जिसे उन्होंने अपने पिता के गुजर जाने पर लिखा था… ”तुम्हारी कब्र पर मैं, फ़ातेहा पढ़ने नहीं आया, मुझे मालूम था, तुम मर नहीं सकते.” इस नज़्म को आज पढ़ते हुए खुद को मोबाइल से रिकार्ड किया. इसी नज़्म की ये दो लाइनें:

तुम्हारी मौत की सच्ची खबर, जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे? कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था।

पूरी नज़्म यूट्यूब पर डाल दिया. अच्छा तो नहीं पढ़ पाया लेकिन बस दिल कर रहा था कि इसे पढ़ूं और निदा साहब को श्रद्धांजलि दूं.

असल में निदा साहब नहीं गए हैं. हमारे और आपके भीतर से क्रिएटिविटी का थोड़ा थोड़ा हिस्सा खत्म हो गया है. एक आदमी इतना अच्छा इतना सारा लिख सकता है, यकीन नहीं होता. कमाल की संवेदना और समझ वाले शख्स थे निदा साहब.

यकीन नहीं होता, बस गर्व होता है कि हम सब उस दौर में थे जब निदा साहब सशरीर मौजूद थे. मैं उनसे भले न मिला और न उन्हें देखा हो पर लगता है जैसे बेहद करीबी थे हम. संवेदना और समझ की उदात्तता हो तो जुड़ाव, प्रेम, अपनापा जैसी चीजें निजी मुलाकातों का मोहताज नहीं होतीं.

इसी सोच और भाव से लबरेज होकर मैंने निदा साहब की रचना का आज दोपहर पाठ किया. रिकार्ड किया. और, यूट्यूब पर डाला. आप भी सुनिए.

लिंक ये है:

https://goo.gl/URuIP5

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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तीसरे रीटेक में निदा फ़ाज़ली बिफर गए और कुर्सी से उठते हुए चिड़चिड़ाकर बोले- मैं नहीं करता…

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उपेंद्र राय की माता जी को श्रद्धांजलि देने के लिए 17 जनवरी को दिल्ली में प्रार्थना सभा

With profound grief, I inform the sad demise of my beloved Mother Smt Radhika Rai who left my family for her heavenly abode on 7 th January 2016.

Bhajan Sandhya & prayer meeting to pray for peace to the departed soul will be held on Sunday, 17th January 2016 from 4 p.m to 5 p.m in the weightlifting auditorium gate no 19, near by gate no. 1, Jawahar Lal Nehru stadium, Lodhi road, New Delhi.

Regards
Upendrra Rai
Group CEO & Editor In Chief
Sahara News Network


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पंकज सिंह को जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज की श्रद्धांजलि : अनजान शहर में जान-पहचान

एक बेतकल्लुफ-सी मुलाकात थी वो। दिल्ली में औपचारिक तौर पर काम संभालने के बाद एक पुराने वरिष्ठ सहयोगी के इसरार पर मैं अजित राय के जन्मदिन की पार्टी में शिरकत के लिए पहुंचा। यह पहला मौका था कि मैंने किसी आयोजन में शमूलियत की हामी भरी थी। जनसत्ता के पूर्व संपादक अच्युतानंद मिश्र, प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह और मशहूरो-मारूफ बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की सोहबत का मौका मिला।

एक कोने की टेबल पर तसलीमा नसरीन के साथ अभी बातचीत का दौर शुरू ही हुआ था कि अजित एक प्रभावशाली व्यक्तित्व को मेरे पास लाए लेकिन औपचारिक परिचय से पहले ही कोई उनको खींच ले गया। हाथ में जाम और प्लेट में स्नैक्स के साथ वो मेरे साथ ही कुर्सी पर विराजमान हुए। एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ मुझे लगभग घूरते हुए उन्होंने कहा, ‘आप मुझे जानते नहीं है?’ मेरे लिए थोड़ा कठिन समय था उनका सवाल एक वाक्य था सधा हुआ, जिसमें कहीं सवालिया होने की गंध भी थी। शिष्टाचार का तकाजा था कि मैं ‘‘ना’’ न कहूं लेकिन, हां कहना कठिनतर था सो मैंने ही आंखों से ही अपनी उत्सुकता को बेआवाज अभिव्यक्ति दी।

बात आगे न बढ़ी तो मैंने थोड़ी देर में पूछ ही लिया, ‘आप भी लिखते हैं?’ उनकी हंसी एक भरी-पूरी टेबल पर अट्टहास की देहरी से थोड़ी ही दूर ठिठक गई। सहज ही बोले, ‘‘कोई बात नहीं। संयोग यह है कि कुछ दिन पहले यही सवाल मैंने तुम्हारे लिए भी किया था।’’ वार्तालाप में सब आसपास की आवाजों को भूल जाएं तो कुछ क्षण निर्विघ्न मौन रहा, फिर अपने जाम में से एक लंबा घंूट भरते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं पंकज सिंह हूं।’ यह थी पंकज सिंह से मेरी पहली मुलाकात जो बाद में ज्यादातर इंडिया इंटरनैशनल सेंटर में मेरी आमद से कुछ अरसा पूर्व नगर के प्रबुद्ध वर्ग के एक इकट्ठ में हुई। एक घटना या दुर्घटना के आसपास ही सिमटी रही। सब सुन कर सहज ही खातिर गजनवी की पंक्तियां स्मरण हो आईं।

मैं इसे शोहरत कहूं या अपनी रुसवाई कहूं,
मुझसे पहले उस गली में मेरे अफसाने गए।

उस खास घटना के आसपास बुनी गई निंदा की नक्शकारी को भूल जाऊं तो इस घटना से ही शहर में मुझे मेरी अहमियत का एहसास भी हुआ। अपने ही अखबार के कुछ नियमित लेखकों की जानकारी भी मिली जो इस घटना के चश्मदीद थे। बहरहाल उससे भी ज्यादा जो हुआ वह था पंकज सिंह के सकारात्मक और जान-पहचान बढ़ाने की नीयत से किया गया संवाद। ऐसे मौकों का यही लाभ सबसे ज्यादा है कि आप बहुत से लोगों से मिलते हैं और बहुत कुछ जान लेते हैं। बातचीत की डोर उस खास घटना से टूटी तो कविता, कहानी और साहित्य और साहित्यकारों की ओर बढ़ती चली गई। कहना न होगा कि पंकज सिंह वे पहली शख्सियत थे जिसने मुझे दिल्ली के दिलदार दिल, बेरहम बनावट और सहज सौहार्द से वाकिफ करवाया। मुझे हैरत थी कि बातचीत की डोर जब टूटी तो फिर मिलने का कोई वादा नहीं था।

बाद उसके, मुंबई में शिव सेना ने गजलकार गुलाम अली के कार्यक्रम पर रोक लगा दी। मेरी कलम इस सांप्रदायिक आतंकवाद पर सहज ही चल गई। उसी सुबह मेरा फोन बजा, एक अनजान नंबर था। मैंने उठाया तो एक आवाज ने ‘‘हैलो’’ के फौरन बाद कहा, ‘‘मैं पंकज सिंह बोल रहा हूं।’’ मेरे लेखन पर उनके उदार उद्गार मुझे बहुत भाए। एक लेखक या रोज अपनी कलम से एक नई कहानी बांचने वाले के लिए यह उपलब्धि ही होती है कि कोई उनकी रोज की लिखाई में किसी दिन तारीफ के दो शब्द बोले। बात लंबी चली। इस बार मिलने का वादा भी हुआ।

बहरहाल, यह दो संक्षिप्त से शाब्दिक आदान-प्रदान मेरे और पंकज सिंह के बीच एक ऐसी कड़ी जोड़ गए कि उनके जाने की खबर तकलीफ के तीर की तरह दिल पर लगी। एक अनजान शहर जिसके साथ कुछ महीनों पहले तक आपका महज आने जाने का नाता ही हो, ऐसे एक पहले जानकार का जाना एक निजी नुकसान के जैसा ही महसूस हुआ। पंकज सिंह चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए एक शून्य। उनसे दूसरी बार फोन पर बात करते हुए इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि मिलने का पहला वादा जो उन्होंने नहीं किया और दूसरी बार जो किया उसको वो अब कभी वफा नहीं करेंगे।

जीवन की क्षणभंगुरता की भी इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी कि जान-पहचान का पौधा ठीक से अंकुरित होने से पहले ही यादों के झरोखे में सज गया।

एक अनजान शहर में मेरे इस पहले और बिना जान-पहचान के ही बने इस खैरख्वाह की स्मृति शेष सदा ही रहेगी और किसी भी अनजान शहर में मेरे जैसे न जाने पहचाने को ऐसे ही खैरख्वाह मिलते रहेंगे। पंकज सिंह आज नहीं हैं लेकिन वे रहेंगे, हमारी स्मृतियों के पन्ने पर अपनी पहचान के साथ। सदा।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक मुकेश भारद्वाज द्वारा यह लिखा जनसत्ता अखबार में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार.

पंकज सिंह से संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

Pankaj Singh singing Mukesh on Neelabh’s 70th birthday

पंकज सिंह की मृत्यु और यादों से जुड़े समाचारों को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

दिल के दौरे से वरिष्ठ पत्रकार और कवि पंकज सिंह का निधन

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पंकज सिंह की याद में… Salute to the unsung hero of contemporary Hindi poetry

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सर्वदा कविता के सुखद आनंद में जीने वाले पंकज सिंह को उनकी ही एक कविता में विनम्र श्रद्धांजलि!

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…सुलह होगी पंकजजी, यहां नहीं तो वहां : ओम थानवी

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दुर्लभ व्यक्तित्व था पंकज सिंह का… श्रद्धांजलि सभा में जुटे संस्कृतिकर्मी

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वीरेन दा एक व्यक्ति नहीं, संस्था थे

वीरेन दा का निधन पत्रकारिता ही नहीं, समूचे हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी क्षति है। वीरेन दा मेरे लिए तो एक पत्रकार और साहित्यकार से बहुत आगे बढ़कर ऐसे गुरू थे, जो अपने शिष्य को कार्य क्षेत्र की कमियों, खूबियों और बारीकियों से ही अवगत नहीं कराते बल्कि जीवन में आगे बढ़ने की शिक्षा व्यवहारिक धरातल पर देते हैं। मुझे जैसे हजारों लोगों को वीरेन दा ने बहुत कुछ सिखाया है।

वीरेन दा के विराट व्यक्तित्व से मेरा पहला परिचय अमर उजाला, बरेली में अपनी तैनाती के दौरान वर्ष 1985 में हुआ था। तब वीरेन दा अमर उजाला की संडे मैगजीन रविवासरीय का सम्पादन करते थे। उस वक्त इस चार पेज की मैगजीन में पढ़ने लायक बहुत कुछ होता था। हर बार दिल को छू जाने वाली कहानी के साथ ही धीर गंभीर आलेख होते थे। इनका चयन और सम्पादन वीरेन दा खुद किया करते थे। वे कई बार अच्छे लेखकों को फोन करके उनसे रचना भेजने का अनुरोध करते थे।

सम्पादन का गुर गंभीर दायित्व संभालने के बावजूद वीरेन दा सम्पादकों वाले गरूर से बहुत दूर थे। कुछ समय बाद मुझे सम्पादकीय पेज का सम्पादन सौंप दिया गया। उस वक्त प्रख्यात बाल कवि श्री निरंकार देव सेवक लीडर राइटर के रूप में संपादकीय लिखा करते थे। संपादकीय के विषय पर अतुल माहेश्वरी जी और वीरेन दा अक्सर पहले ही चर्चा कर लेते थे। सम्पादकीय पेज के प्रभारी रहे मेरे वरिष्ठ श्री विपिन धूलिया ने मुझे इस पृष्ठ का सम्पादन करना सिखाया था। उनके जाने के बाद मैं सम्पादकीय पृष्ठ के लिए लेखों का चयन करने में शुरू में बहुत हिचकता था। उस दौर में वीरेन दा ने विषय चुनने के ऐसे गुर सिखाए कि आज तक नहीं भूल सका हूं। इस दौरान वीरेन दा मुझे अपने अमर उजाला रविवासरीय संस्करण के कुछ लेख, कहानी, समीक्षा आदि सम्पादन के लिए देते थे।

नए पुराने लेखकों की रचनाओं से कई फाइलें भरी पड़ीं थी। नए आने वाले लेखों को इस्तेमाल करने के साथ ही फाइलों में रखी पुरानी रचनाएं भी निकाल कर छापी जाती थीं। उसी दौर में पहाड़ के एक लेखक की दो तीन रचनाएं काफी समय से पैंडिंग देखकर मैंने वीरेन दा से पूछा कि इन्हें जगह नहीं मिल पा रही है, तो क्या इन्हें वापस भेज दूं। वीरेन दा के उत्तर ने उनके बड़प्पन और सामाजिक उत्तरदायित्व के बोध का भी अहसास करा दिया। उनका जवाब था – इस लेखक को इस समय मदद की जरूरत है…. ये वाली छप सकती है, थोड़ा ठीक करके कम्पोजिंग में दे दो।

अमर उजाला में समीक्षा के लिए पुस्तकें आती रहती थीं। एक बार वीरेन दा ने मुझे समीक्षा करने के लिए ऐसी ही एक पुस्तक दी… पुस्तक में इस्तेमाल किए गए शब्दों पर मुझे बहुत आपत्ति थी। मैंने कई बार वह किताब पढ़ी और समीक्षा में लिख दिया कि यह पुस्तक शोहदों के पढ़ने लायक तो हो सकती है, कोई सुसंस्कृत व्यक्ति इसे अपने घर में रखना भी शायद पसंद नहीं करेगा। मेरी समीक्षा पढ़कर वीरेन दा मेरी साफगोई पर बहुत हंसे। एक-एक करके कई रविवार निकल गए, लेकिन वो समीक्षा कम्पोज होने के लिए नहीं गई। वो मेरी पहली समीक्षा थी, शायद आखिरी भी। वीरेन दा ने कभी यह भी नहीं कहा कि समीक्षा छपने लायक नहीं है….. आज सोचता हूं तो लगता है कि यह भी वीरेन दा का सिखाने का तरीका था कि सच को भी कड़ुवे अंदाज में नहीं बोलना चाहिए….।

लेखक प्रो. सुभाष गुप्ता से संपर्क sg2300@gmail.com या 09412998711 के जरिए किया जा सकता है.


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जाने-माने कवि और पत्रकार वीरेन डंगवाल का बरेली में निधन

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मैं 2014 के जून में वीरेनदा को कैंसर के दौरान पहली बार देखकर भीतर से हिल गया था

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अक्षय, तुम दुबारा भारत में जन्म मत लेना और जन्म लेना भी तो पत्रकार मत बनना!

Rajat Amarnath : सुनो अक्षय, दूर कहीं जहाँ भी तुम भेज दिये गये हो वहाँ अपने बारे में सोचना कि क्या मिला तुम्हें. एक नपुंसक समाज, ख़बर बताने की जगह TRP के लिऐ ख़बर बनाने वाले न्यूज़ चैनल, “प्रधान सेवक” से सवाल दागने की जगह उनके साथ दाँत निपोरते हुऐ “सैल्फी” लेने वाले संपादक, असमय मौत. तुम्हारी जवान मौत पर मज़ाक उड़ाते संवेदनहीन नेता. आखिर क्या ज़रूरत थी तुम्हें किसी घोटाले को उजागर करने की? क्या तुमने अपने ही साथी “दीपक शर्मा” से कोई सबक नहीं सीखा था कि अगर नेता को नंगा करेंगे तो नौकरी गंवा दी जाती है या अपने पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर “क़मर वाहिद नक़वी” से समझ लेते कि नेताओं की “चरण वंदना” ना करने पर क्या नतीजा होता है.

तुमने तो ऐसे घोटाले को उजागर करने का बीड़ा उठाया था जिसमें एक राज्यपाल का बेटा तक जान गंवा चुका है. अगर कुछ सबूत हाथ लग भी गये थे तो चुप रहते या फिर किसी जिंदल सरीखे नेता का नाम घोटाले में होता तो मालिकों से मिलकर कुछ पैसे बना लेते. लेकिन तुमको तो अपनी कलम की ताक़त दिखानी थी. भुगतो अब. अरे, कुछ तो सबक “जगेन्द्र” की मौत से लेते कि इस गूंगे बहरे देश में ईमानदार पत्रकार को ना तो कोई घोटाले उजागर करने का हक़ है न ही अपनी आवाज़ उठाने का. अब सोच समझ कर जन्म लेना. अगर इंसान के रूप में इस धरती पर आओ तो हिन्दुस्तान, इंडिया, भारत में पैदा मत होना और अगर गलती से यहाँ पैदा हो जाओ तो पत्रकार मत बनना और किस्मत में फिर से पत्रकार बनना लिख दिया हो तो मेरे भाई किसी घपले घोटाले को उजागर करने की हिम्मत मत करना वरना फिर से मार दिये जाओगे… तुम तो असमय चले गये लेकिन अपने पीछे छोड़ गये हो एक गहरा सन्नाटा और उसमें गूंजते कुछ सवाल जिनके जवाब 42 ज़िंदगी ख़त्म होने के बाद भी किसी के पास नहीं हैं…

Zafar Irshad : मत डालो अपनी जान जोखिम में पत्रकार भाइयों किसी स्टोरी के लिए,क्योंकि चाहे तुम मर जाओ या विकलांग हो जाओ तुम्हारे परिवार के अलावा किसी को तुम्हारे मरने पर एक दो दिन दुःख होगा बस.. आखिर में ज़िन्दगी भर तुम्हारा परिवार ही तुम्हारी कमी महसूस करेगा और कोई नहीं.. यहाँ तक की तुम्हारा संस्थान भी एक दो दिन याद करेगा तुम्हें. वो भी अगर तुम स्थायी कर्मचारी हुए तो वरना अगर कॉन्ट्रैक्ट पर या स्ट्रिंगर हुए तो संस्थान भी मुंह मोड़ लेगा.. अपनी जान जोखिम में डाल कर कुछ अच्छी स्टोरी कर भी लाये तो ज़्यादा से ज़्यादा एडिटर तारीफ कर देगा बस, मर गए तो तुम्हारे परिवार को कोई सहायता नहीं मिलेगी, न ही मरणोपरांत राष्ट्रपति पदक.. पूरे देश में नेताओं और अधिकारीयों का ऐसा गिरोह काम कर रहा है, जिसे भेद पाना किसी पत्रकार के बस की बात तो नहीं..भारत में सबसे कमज़ोर और उपेक्षित नौकरी है पत्रकारों, की जिला स्तर पर बहुत से छोटे पत्रकार बिना सैलरी बिना किसी जीवन बीमा के दिन दिन भर ख़बरों की दौड़ में भागते फिरते है..और खबर के लिए जान लगा देते है,उनका संस्थान तो उनको अपना कर्मचारी भी नहीं मानता..फिर क्यों दांव पर लगाते हो अपनी ज़िन्दगी अपने बच्चो का बचपन..? नहीं तोड़ पाओगे कभी भी अधिकारीयों और नेताओं का गिरोह..इस लिए अभी भी सलाह है छोटे पत्रकारों को और स्ट्रिंगरों को,पत्रकारिता से अच्छा है रिक्शा चला लो..लेकिन मुझे मालूम है यह तुम अब कर नहीं पाओगे, क्योंकि तुम्हारे पत्रकारिता का नशा चढ़ गया है जो मार्फीन और अफीम के नशे से ज़्यादा मज़ा देता है…

Vikram Singh Chauhan : टीवी टुडे संस्थान के पत्रकार अक्षय सिंह की मौत पर मध्यप्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मजाक बनाते हुए कहा है कि हमसे बड़ा पत्रकार है क्या? कितनी शर्म की बात है किसी इंसान के मौत का मजाक बनाने वाले इस देश में मंत्री बने बैठे है. जनता ने अपार बहुमत देकर इन्हें अहंकारी बना दिया है. लेकिन सच यह भी है कि इंडिया टुडे ग्रुप इस न्यूज़ को ज्यादा नहीं उछालेगा क्योंकि उन्हें भाजपा शासित राज्यों से सबसे ज्यादा पैसा मिलता है. पत्रकार की मौत एक मजदूर की मौत से भी ज्यादा सस्ती है. VIP लोगों के साथ पत्रकारिता करते पत्रकार को ये बात समझ नहीं आती. उनके जाने के बाद उनके परिवार वालों से पूछ लीजिये.

Munne Bharti : पत्रकारों पर हमले में सीधे सरकारें शामिल हैं.. शायद मध्य प्रदेश सरकार में चल रही सियासी उठापटक का नतीजा है पत्रकार की मौत … प्रधानमंत्री जी की ख़ामोशी मुनासिब नहीं… आखिर देश की सियासी पार्टियों की ख़ामोशी भी अपने आप में सवालियां निशान है.. शहीद पत्रकारों को खिराजे अक़ीदत पेश है… मेरी सभी पत्रकार संगठनो और संस्थाओं से  अपील है की पत्रकाओं की सुरक्षा के लिए सीधी प्रधानमंत्री जी से दो टूक बात करें ..  और अगर सरकारें न मने तो आघे की रणनीति तैयार करें.. जिसमे सरकारों को जनता के सामने सरकारों की पोल खोल अभियान पूरी तरह शामिल हो… जिसमे सरकारों के प्रेस कॉन्फ्रेंस का बायकाट भी शामिल हो… अगर हम अब आवाज़ नहीं बुलंद करेंगे तो अगली बारी हमारी है….  आप जहाँ है वही अपने पत्रकार भाइयों के हक़ में आवाज़ बुलंद कीजिये.. सरकारों पर दबाव बनायें… अब बस बहुत हुआ..  

Ajit Anjum : दिल्ली और देश से बाहर हूँ सो आजतक के खोजी पत्रकार अक्षय की रहस्यमय मौत के बारे में बहुत पता नहीं चल पाया. सोशल मीडिया पर समझने की कोशिश करके भी समझने में नाकाम रहा कि उसकी मौत कैसे हुई? कौन ज़िम्मेदार है? व्यापमं घोटाले में हुई मौतों से इसे जोड़ा जा सकता है या नहीं? लेकिन टुकड़ों टुकड़ों में जितना मैंने अक्षय के बारे में पढ़ा, उससे यही लगा कि उसकी मौत कई सवाल छोड़ गई है. मैं अक्षय से कभी मिला नहीं था और दुर्भाग्य ही कहिए कि मैं उसे उसके नाम से भी नहीं जानता था, जबकि मैं हमेशा ये मानता रहा हूँ कि मैं टीवी मीडिया में काम करने वाले अधिकाधिक लोगों को जानता हूँ. या तो नाम ये या काम से. तो अक्षय को क्यों नहीं जाना पाया? क्योंकि वो गुमनाम रहकर …पर्दे के पीछे रहकर काम करने में यक़ीन रखता था. जहाँ टीवी पर आने के लिए लोग मरे जाते हैं, वहाँ अक्षय ही था कि चुपचाप काम कर रहा था …विकास मिश्रा Vikas Mishra ने बहुत अच्छी पोस्ट अक्षय के बारे में लिखी है ….

Sanjeev Chauhan : मैंने YouTube के अपने पापुलर चैनल Crimes Warrior पर ‘आज तक’ चैनल के खोजी और युवा पत्रकार अक्षय सिंह को श्रद्धांजिल के बतौर उनसे जुड़े तमाम वीडियो के लिए एक विशेष विंडो तैयार की है। इसमें व्यापम घोटाले से जुड़े तमाम वीडियो के साथ-साथ 5 जुलाई 2015 को दिल्ली के निगम बोध घाट पर किये गये अक्षय सिंह के अंतिम-संस्कार से जुड़े असंपादित वीडियो/ रॉ-फुटेज भी मौजूद है। व्यापम घोटाले की तफ्तीश/ रिपोर्टिंग के दौरान मध्य-प्रदेश के झबुआ में संदिग्ध हालातों में काल का ग्रास बने अक्षय की मौत पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का दिल्ली में लंबा-चौड़ा ‘ज्ञान’ हो या फिर तमाम सत्ताधारियों और गैर-सत्ताधारियों की अंतिम-संस्कार में उपस्थिति। क्राइम्स वॉरियर के इन वीडियो/ फुटेज में बतौर इतिहास सब कुछ कैद है। जल्दी नजर न आने वाले टीवी टुडे नेटवर्क (आज तक) के मालिक अरुण पुरी हों या वर्तमान में आज तक के सर्वे-सर्वा वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिय प्रसाद, राजदीप सरदेसाई, पुन्य प्रसून बाजपेयी,  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया या फिर ‘आप’ नेता कुमार विश्वास…या कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी.. या फिर भाजपा दिल्ली प्रभारी सतीश उपाध्याय… क्राइम्स वारियर के कैमरे ने इस मौके पर हर किसी की उपस्थिति इतिहासिक याद के रुप में दर्ज करने की कोशिश की है। क्राइम्स वॉरियर परिवार की ओर से इस होनहार युवा पत्रकार के लिए यही अश्रुपूरित और सच्ची श्रद्धांजलि… देखें: https://www.youtube.com/playlist?list=PLhjyOczvlcpQ5CBtY-iyXmkBn2waM2Mx_

वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ, जफर इरशाद, विक्रम सिंह चौहान, मुन्ने भारती, अजीत अंजुम, संजीव चौहान के फेसबुक वॉल से.

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‘आजतक’ के पत्रकार विकास मिश्र ने अपने बगल की सीट पर बैठने वाले अक्षय को यूं याद कर दी श्रद्धांजलि

Vikas Mishra : दफ्तर में मेरी ठीक बाईं तरफ की सीट खाली है। ये अक्षय की सीट है। अक्षय अब इस सीट पर नहीं बैठेगा, कभी नहीं बैठेगा। दराज खुली है। पहले खाने में कई खुली और कई बिन खुली चिट्ठियां हैं, जो सरकारी दफ्तरों से आई हैं, इनमें वो जानकारियां हैं, जो अक्षय ने आरटीआई डालकर मांगी थीं। करीब तीन महीने पहले ही दफ्तर में नई व्यवस्था के तहत, अक्षय को बैठने के लिए मेरे बगल की सीट मिली थी। वैसे दफ्तर में रोज दुआ सलाम हुआ करती थी, लेकिन पिछले तीन महीने से तो हर दिन का राफ्ता था। अक्षय…हट्ठा कट्ठा जवान। उसके हाथ इतने सख्त, मोटी-मोटी उंगलियां। मिलते ही हाथ, सिर तक उठाकर बोलता-‘सर, नमस्कार’ …और फिर हाथ बढ़ाता मिलाने के लिए। इतनी गर्मजोशी से हाथ मिलाता कि पांच मिनट तक मेरा हाथ किसी और से मिलाने लायक नहीं रहता।

बगल में सीट थी तो काफी बातें भी हुआ करती थीं। एक खोजी पत्रकार को क्या क्या झेलना पड़ता है, क्या क्या खतरे होते हैं, सब बताता था। एक चैनल में जब स्टिंग ऑपरेशन के दौरान पैसे के लेनदेन की खबरें उजागर हुईं तो अक्षय बहुत दुखी था। बोला- सर, यहां तो दुनिया दुश्मन बनी पड़ी है। हम लोग साख बनाने में जुटे रहते हैं, कुछ लोग बनी बनाई साख पर बट्टा मार देते हैं। अक्षय ने अपने करियर में कई सनसनीखेज खुलासे किए। अभी हाल ही में एडमिशन के सिंडीकेट को उसने उजागर किया था। ये संयोग ही है कि अभी 29 जून को उसके आखिरी स्टिंग-डॉगफाइट पर आजतक पर रात साढ़े आठ बजे का शो मैंने ही बनाया था। मैंने कहा-अक्षय पीटीसी कर दो। अक्षय बोला-नहीं सर, हम परदे के पीछे ही रहें तो ही अच्छा। वो शो अक्षय का आखिरी शो बनकर रह गया।

अभी हाल ही में अक्षय वैष्णोदेवी की यात्रा से लौटा था। माता-पिता को दर्शन करवाने गया था। वहां से प्रसाद लाया। प्रसाद में था-अखरोट। मुझे उसने कुछ अखरोट दिए, मैंने कहा-घर जाकर खाऊंगा। यहां किससे फोड़ूंगा। अक्षय ने अखरोट लिया, अंगुठे और तर्जनी के बीच रखा और अखरोट टूट गया। ये उसकी अंगुलियों की ताकत थी। इतने ताकतवर और बहादुर इंसान को यूं ही अचानक हॉर्ट अटैक आएगा..? दिल नहीं मानता। कल दोपहर ही अक्षय की मौत की खबर मिल चुकी थी। दफ्तर में ऐसा लग रहा था, जैसे अपनी लाश खुद ढोते हुए चल रहे हों। पत्रकार की जिंदगी का कोई मोल नहीं रह गया, कोई ठिकाना नहीं रह गया।

आज दफ्तर के लिए घर से निकल रहा था तो कई बातें जेहन में उमड़-घुमड़ रही थीं। बूढ़े माता-पिता और बहन का अकेला सहारा था अक्षय। पिता के हाथ कांपते हैं। जरा सोचिए, जिस बेटे को पिता ने गोद में खिलाया, कंधे पर बिठाया, मेले में घुमाने ले गया, उस बेटे को दिन ब दिन.. साल दर साल जवान होते देखा, उस बेटे को मुखाग्नि देने की जब नौबत आई, तब क्या बीती होगी उनके दिल पर। बच्चे को जरा सी आंच लग जाए तो पिता का कलेजा छलनी हो जाता है, लेकिन अपने जवान बेटे को चिता की आग के हवाले करते वक्त अक्षय के पिता के मन में पीड़ा की कैसी सूनामी उठी होगी। अक्षय के जाने से जब हम सब का कलेजा मुंह को आ रहा है तो उस मां के दर्द की तासीर क्या होगी, जिसने दूध पिलाकर बेटे को हट्ठा कट्ठा जवान बनाया। जिसके इंतजार में वो देर रात तक जागती थी, अब तो उस मां का इंतजार अनंत तक खिंच गया। छोटी बहन के लिए रक्षा बंधन और भाई दूज के मायने खत्म हो गए, क्या बीत रही होगी उस बहन पर। सुबह पदम सर Padampati Sharma का फोन आया था। भाव विह्वल होकर रोने लग गए थे। क्या कहें… हम सब का दुख बहुत छोटा है, अक्षय के परिवार वालों का दुख तो पहाड़ से भी भारी है।

आज हमारा जांबाज साथी अक्षय सिंह अनंत में विलीन हो गया, मिट्टी का तन मिट्टी में मिल गया, लेकिन उसकी यादों से कैसे पीछा छुड़ाएंगे हम। अपनी टेबल पर बैठकर ये पोस्ट लिख रहा हूं। बिल्कुल बगल वाली सीट खाली है, कई बार ऐसा एहसास हुआ कि हमेशा की तरह अक्षय बोलेगा- सर, आप कंप्यूटर पर टाइप करते हो या तबला बजाते हो..। नहीं अब कोई आवाज नहीं गूंजेगी। अक्षय अब कहां बोलेगा, वो तो उस दुनिया में चला गया, जहां से कभी कोई लौटकर नहीं आता।

आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.


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आलोक भट्टाचार्य और उमेश द्विवेदी श्रद्धांजलि सभा : पत्रकार-साहित्यकार मर कर भी अपनी लेखनी की वजह से जिंद रहते हैं

मुंबई : सांताक्रुज पूर्व के नजमा हेपतुल्ला सभागार में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ द्वारा दिवंगत पत्रकार साहित्यकार अलोक भट्टाचार्य और पत्रकार उमेश द्विवेदी की याद में श्रद्धांजलि सभा का कार्यक्रम रखा गया। श्रद्धांजलि सभा में शहर के जाने माने पत्रकारों और साहित्यकारों ने अपने दिनों दिवंगत साथियों को भावपूर्ण आदरांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने कहा कि पत्रकार-साहित्यकार मर कर भी अपनी लेखनी की वजह से जिन्दा रहते हैं।

प्रतिष्ठित हिंदी कवि और जानेमाने मंच संचालक आलोक भट्टाचार्य का शनिवार रात हृद्यगति रुकने से निधन हो गया था। डोंबिवली के नवजीवन अस्पताल में रात आठ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। केंद्रीय हिंदी संस्थान के अहिंदी भाषी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के सम्मान समेत सैंकड़ों पुरस्कारों से उन्हें नवाजा गया। राष्ट्रिय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार उमेश द्विवेदी का भी पिछले दिनों कम आयु में निधन हो गया।

श्रद्धांजलि सभा में सामना (हिंदी) के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल ने भावविभोर हो कर कहा कि आलोक जी से हमारे बहुत वैचारिक मतभेद थे परंतु व्यक्तिगत संबंधों पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था। उन्होंने मुंबई के साहित्य जगत को एक माला में पिरोकर रखा। बंगाली होने के बावजूद हिंदी साहित्य के लिए ढेरों काम किया। श्री शुक्ल ने इस आयोजन के लिए मुंबई हिंदी पत्रकार संघ कि सराहना की। अनिल त्रिवेदी ने कहा कि आलोक जी के कारण ही मेरा काव्य संग्रह ‘भाषा नहीं है शब्दों की वैशाखी प्रकाशित हो सका।

रजनीश मिश्र ने कहा कि अलोक ने बहुत लोगों की ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया। वे एकमात्र ऐसे संचालक थे जो सभी तरह के मंचों के भी संचालन में निपुण थे।  कवि व साहित्यिक पत्रिका अनुष्का के संपादक रासबिहारी पांडे ने कहा कि आलोक जी की जगह कोई नहीं ले सकता,मुंबई के साहित्य और समाज की हुई इस क्षति की पूर्ति कोई नहीं कर सकेगा। आलोक जी की अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित करवा कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। पत्रकार विनोद यादव ने कहा कि उमेश जी के साथ उनके पारिवारिक संबंध थे और वे पत्रकार के साथ एक सच्चे सिपाही भी थे। इस अवसर पर कवि मुकेश गौतम ने आलोक भट्टाचार्य की याद में ‘अलोक भट्टाचार्य प्रणाम इंटरनेशनल सम्मान’ दिए जाने की घोषणा की। साहित्यकार ह्रदयेश मयंक ने कहा कि अलोक जी आंदोलन के साथी रहे हैं। मुंबई में हर जगह पर हमारे क़दमों के निशान मौजूद है। यहां का साहित्यिक माहौल उन्ही की वजह से बना।

वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी ने कहा कि उमेश जी दबंग पत्रकार थे जबकि आलोक जी विनम्र स्वभाव के थे। आलोक जी का व्यक्तित्व कमाल का था,जिसके चलते उन्होंने बहुत लोगों को खड़ा किया है। अलोक जी के भाई वरिष्ठ पत्रकार तुषार भट्टाचार्य ने कहा कि अलोक जी पत्रकार साहित्यकार के साथ साथ अच्छे मूर्तिकार भी थे। वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी ने कहा कि एक कड़वी सच्चाई यह है कि पत्रकारिता में रहते हुए आप साहित्य की सेवा नहीं कर सकते इसलिए अलोक जी ने साहित्य को महत्व दिया। ।  कार्यक्रम में अब्सूलुट इण्डिया के संपादक द्विजेंद्र तिवारी, नवभारत के शहर संपादक ब्रजमोहन पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार सैयद सलमान, वागीश सारस्वत, साहित्यकार हस्तीमल हस्ती, कपिल आर्या,पंडित किरण मिश्र, सैयद रियाज, वरिष्ठ पत्रकार गोपाल शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

इस श्रद्धांजलि सभा में आलोक जी के परिजन भी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अभय मिश्र ने किया। कार्यक्रम में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ के महासचिव विजय सिंह कौशिक, उपाध्यक्ष आदित्य दुबे, मंत्रालय पत्रकार संघ के कार्यकारिणी सदस्य सुरेन्द्र मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार रामकिशोर त्रिवेदी, सुनील मेहरोत्रा, आनंद मिश्र, अखिलेश तिवारी, एड. विजय सिंह, अनिल गलगली, आनंद श्रीवास्तव, सरताज मेहदी, धर्मेन्द्र पांडे, राकेश पाण्डेय, विनोद चौमाल सहित बड़ी संख्या में पत्रकार-साहित्यकार मौजूद थे।

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Tearful homage to Com. K.L.Monga

The death of Com. K.L. Monga, many times General Secretary of the Bennett Coleman and Company Employees Union, is not only sad and shocking but has shaken me to the core. I really got so benumbed with this tragic news that I went into silence for a few minutes.  The saddest part of it is that youngsters working even for the Times of India do not know who he was.  For the last, nearly two decades he had virtually gone into oblivion.

He was a person, who was loved by colleagues and comrades but was also respected by the managements of newspaper industry, particularly the Bennett Coleman and Company, the publishers of the Times of India, the Economic Times, the Nav Bharat Times and the whole host of magazines in the eighties. In October 1987, he called for a one-day strike in his newspapers in the support of the struggling employees of the Indian Express Group of Newspapers. Lo and behold!  All offices of his newspapers were closed in no time. Hundreds of workers of the Times of India came out in open and started shouting slogans in support of Indian Express employees. Monga became the ruler of the Bahadur Shah Zafar Marg, New Delhi. The late Girilal Jain, the then editor of the Times of India, wrote a very long editorial condemning the police high handedness on the workers of Indian Express.

Comrade Monga, a graduate in Humanities from the prestigious Kirodi Mal College of Delhi University was the card holder of the CPI but he became so disenchanted with intrigues of his party colleagues that he decided to quit the party. Com Vikram Rao, by that time, was elected the president of the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) by defeating the CPI’s veteran A Raghavan. Journalists belonging to the left ideology were not able to digest the victory of Com Rao and they had virtually choked his functioning in the IFWJ. Ultimately, they formed a parallel organization. All-India Newspaper Employees Federation (AINEF), a powerful body of non- journalists in those days was in total control of the CPI. Its General Secretary Com (late) K.L. Kapur was leading from the front against the IFWJ.

It was then decided to form the National Federation of Newspaper Employees (NFNE) to get rid of the AINEF. Fed up with machinations of the left leaders Com. Paritosh Mukhopadhyay of Anand Bazar Patrika of Kolkata came forward to lead the new organisation. Within a short span of time NFNE caught the fancy of newspaper employees and, it became so powerful that many state governments and the Central government had to recognize it. As a result of it,Com. Paritosh Mukhopadhyay represented the NFNE in the Manisana Wage Board and in Majithia Wage Board; Com Uma Shankar Mishra became its representative. In fact, it could not have been possible if Com. Monga had not swung into the formation of NFNE with tan, man aur dhan.

I was fortunate to have worked with Com. Monga. I used to write pamphlets for him during elections in the Times of India. He was friend of friends and could go any extent to help them. Down the memory lane, there are many stories related to him and other comrades. I feel writing a book on them.

Com. Monga had shifted to Gujrat after his retirement but a few years ago again came back to Delhi. He, however, remained cut off with all Union activities. His two daughters and his highly qualified wife survive him.  I pay my tearful homage to you dear Com. Monga.

Parmanand Pandey
Secy. Gen. IFWJ

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चौथी पुण्यतिथि : आलोक तोमर की स्टाइल में आलोक तोमर को श्रद्धांजलि दी निधीश त्यागी ने

बड़े भाई आलोक तोमर को गुजरे चार बरस हो गए. कल बीस मार्च को उनकी चौथी पुण्यतिथि पर सुप्रिया भाभी ने कांस्टीट्यूशन क्लब में भविष्य के मीडिया की चुनौतियां विषय पर विमर्श रखा था. पूरा हाल खचाखच भर गया. अलग से कुर्सियां मंगानी पड़ी. सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में अगर सबसे अलग तरीके से और सबसे सटीक किसी ने आलोक तोमर को श्रद्धांजलि दी तो वो हैं बीबीसी के संपादक निधीश त्यागी. उन्होंने अपनी एक कविता सुनाकर आलोक तोमर को आलोक तोमर की स्टाइल में याद किया. ढंग से लिखना ही आलोक तोमर को सच्ची श्रद्धांजलि है, यह कहते हुए निधीश त्यागी ने ‘ढंग से न लिखने वालों’ पर लंबी कविता सुनाई जिसके जरिए वर्तमान पत्रकारिता व भविष्य की चुनौतियों को रेखांकित किया. कविता खत्म होते ही पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. बाद में अल्पाहार के दौरान कई लोग निधीश त्यागी से उनकी इस कविता की फोटोकापी मांगते दिखे. कविता (हालांकि खुद निधीश त्यागी इसे कविता नहीं मानते) यूं है, जो Nidheesh Tyagi ने अपने वॉल पर पब्लिश किया हुआ है…


ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग

(याद आलोक की, चुनौती मीडिया की)

– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग न विचारशील होते हैं, न कल्पनाशील, न संवेदनशील. न लालित्य होता है, न भावाबोधक. न पढ़े, न लिखे.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग अपनी बात को बहुत घुमा फिरा कर, बहुत सिटपिटाए ढंग से कहते हैं. वे ख़ुद को पहले बचाना चाहते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग वक़्त और जगह बहुत ख़राब करते हैं. अपना, दूसरों का.
– वे बहुत शोर करते हैं, पर गूँजते नहीं. ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग आग ज़्यादा लगाते हैं, रौशनी कम करते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोगों का विश्वास सरकार और पूँजीपतियों पर ज़्यादा होता है, ख़ुद के लिखे की ताक़त पर कम.
-ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग हाँका बहुत लगाते हैं, शिकार नहीं कर पाते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग क़तार के आख़ीर में खड़े लोगों की आँखें ठीक से नहीं पढ़ पाते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग बहुत चतुर सुजान बनते हैं और कहानी की माँग के आगे, उसूलों की परवाह नहीं करते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग अपने वाक्य के अलावा हर जगह ऐंठे दिखालाई पड़ते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग ढंग से न लिखे गये दूसरे वाक्यों का आशय तुरंत समझ लेते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग अपनी तशरीफ़ों को कम से कम तकलीफ़ देने में यक़ीन रखते हैं. वे न दंडकारण्य जाते हैं, न कालाहांडी , न कारगिल
– ढंग के वाक्य न लिख पाने वाले लोग वक़्त के साथ बदलते हैं, उनका साथ वक़्त को नहीं बदल पाता.
– ढंग के वाक्य न लिख पाने वाले लोग तुलनाओं में, स्पर्धाओं में, टुच्चेपन में फँसे हुए लोग होते हैं.
– ढंग के वाक्य न लिख पाने वाले लोग उन लोगों के लिए निविदा सूचनाओं की तरह होते हैं, जो ढंग की सी ख़बर पढ़ना चाहते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग अपना ही ढंग से न लिखा गया वाक्य ढंग से नहीं पढ़ पाते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग शब्दों और जुमलों के मशीनी और औद्योगिक पुर्ज़े होते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोगों के वाक्य पढ़ने में पढ़ने वाले का साँस अक्सर फूल जाता है.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग सरकार से सब कुछ प्रेस ब्रीफ़िंग में ही बता देने की माँग करते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने लोगों की पत्रकारिता में भर्ती या तो सिफ़ारिश का मामला है, या जुगाड़ का.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग सत्तासीन लोगों और कॉरपोरेट कम्पनियों से सुविधाओं की माँग करते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग ढंग के सवाल भी नहीं कर पाते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग कम हवा वाली फ़ुटबॉल से गोल मारने की उम्मीद रखते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग फ़तवे बहुत जारी करते हैं.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोगों को पता होता है कि वे ढंग का वाक्य नहीं लिख सकते.
– ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है आँख में आँख डालकर बात कर पाना.

(याद आलोक तोमर की थी, और बात मीडिया को चुनौती की. २० मार्च को कॉंस्टीट्यूशन क्लब में. मैं उन्हें इसलिए सम्मान देता हूँ क्योंकि वे ढंग के वाक्य लिखते थे. सबसे बड़ी चुनौती ढंग से न लिखे गये वाक्यों से है, ऐसा मैं मानता हूँ. ये रगड़ा उसी सिलसिले में. संचालक आनंद प्रधान ने इसे कविता कहा, जो यह नहीं है.)


इंडिया न्यूज के एडिटर इन चीफ और चर्चित पत्रकार दीपक चौरसिया जब मंच पर बोलने के लिए उठे और राजनेता व सांसद केसी त्यागी द्वारा टीवी मीडिया पर लगाए गए आरोपों का जवाब देने लगे तो एक सज्जन दर्शकों के बीच से खड़े होकर जोर-जोर से आरोप लगाने लगे. दीपक संयत भाव से मुस्कराते हुए सुनते रहे और माकूल जवाब भी दिया.

पूर्व केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने मजीठिया वेज बोर्ड व मीडिया मालिकों को लेकर कनफ्यूज से दिखे. वे पत्रकारों और मालिकों के अपने अपने नजरिए का उल्लेख कर खुद को बेचारा साबित कर गए. हालांकि उन्होंने टीआरपी को लेकर न्यूज चैनलों की कड़ी आलोचना की व तीखा व्यंग्य भी किया. उन्होंने कहा कि मुंबई के धारावी में किन्हीं दो टीआरपी डब्बों से इंग्लिश न्यूज चैनलों की टीआरपी आती है और इसी दो डब्बों में दिखने दर्ज होने के लिए इंग्लिश न्यूज चैनलों में होड़ मची रहती है.

मंच संचालक प्रोफेसर आनंद प्रधान ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से हर वक्ता को बुलाने से पहले उन्हें टॉपिक से जुड़े किसी खास एंगल पर बोलने के लिए भूमिका बना देते जिससे वक्ताओं को कनफ्यूज नहीं होना पड़ा. बालेंदु शर्मा दधीच ने सही मायने में जो टापिक रहा, भविष्य के मीडिया की चुनौतियां, उस पर तथ्यपरक बातचीत रखी. उन्होंने इंटरनेट के जरिए मुख्यधारा की मीडिया को मिल रही तगड़ी चुनौती और भविष्य में सबसे प्रभावी मीडिया बनने जा रहे न्यू मीडिया यानि डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स का सविस्तार सटीक जानकारी दी.  आलोक तोमर के चाहने वाले कई केंद्रीय मंत्री और सांसद भी आयोजन में पहुंचे और अपनी बात मंच से रखी. सबने आलोक के तेवर और व्यक्तित्व को याद किया. कार्यक्रम में केंद्रीय इस्पात एवं खनन मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, भाजपा नेता प्रभात झा, डॉ. शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के कुलपति निशीथ राय ने आलोक को अपने-अपने तरीके से याद किया. इस मौके पर पत्रकारिता के दो छात्रों को आलोक तोमर की याद में फेलोशिप प्रदान की गई.

ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में 27 दि‍सम्‍बर, 1960 में जन्मे वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर हिंदी पत्रकारिता में संवेदनशील रिपोर्टिंग के लि‍ए जाने जाते हैं. सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से उन्होंने जिंदगी शुरू की और जल्दी ही मुंबई के बाद दिल्ली पहुंच गए. यूनीवार्ता, जनसत्ता बीबीसी हिंदी, रीडिफ समाचार सेवा, पायनियर, आजतक, जी टीवी, स्टार प्लस, एनडीटीवी, होम टीवी, जैन टीवी और दैनिक भास्कर के अलावा कई देशी-विदेशी अखबारों के लिए अंदर और बाहर रह कर उन्होंने काम कि‍या. जनसत्ता अखबार के कार्यकाल के दौरान उनकी रिपोर्टिंग काफी चर्चित रही. उन्होंने 1993 में फीचर सेवा शब्दार्थ की स्थापना की. बाद में उसे उन्होंने समाचार सेवा ‘डेटलाइन इंडिया’ बनाया. फि‍र ‘डेटलाइन इंडिया’ नाम से उनकी वेबसाइट हिंदी पाठक वर्ग की सुर्खियां बनती रही. लंबी बीमारी के बाद पचास वर्ष की आयु में उनका 20 मार्च 2011 को निधन हो गया था. तभी से उनकी याद में प्रतिवर्ष मीडिया-विमर्श का आयोजन किया जाता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.

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सालों, इतनी जल्‍दी भूल गए… अभी बताता हूं…

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फोटो खींचने के लिए दस से बीस किमी तक साइकिल से ही जाते थे किशनजी

: शून्य से शिखर की यात्रा तय की कृष्ण मुरारी किशन ने : कृष्ण मुरारी किशन नहीं रहे। सुन कर अवाक रह गया। अभी दस दिन पहले ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनके बढते पेट के आकार को लेकर हंसी मजाक का दौर भी चला। खाते पीते घर की निशानी है पेट, कह कर उन्होंने ठठाकर हंसने को मजबूर कर दिया था। कौन जानता था कि इतनी जल्दी हम लोगों से विदा ले लेंगे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सन 70 के दशक में हमने पत्रकारिता आरंभ की तो उन्होंने छायाकारिता। टूटही बिना ब्रेक की सायकिल उखड़ी सीट पर मोटा सा तकिया और कंधे पर झोला। शुरुआती यही पहचान थी किशनजी की।

10 से 20 किमी की दूरी तक फोटो लेना हो तो सायकिल ही उनकी सवारी थी। पटना की घनी आबादी वाले दरियापुर गोला में उनके पिताजी पंक्चर बनाते थे। बेटा किषन को यह रास नहीं आया और उसने पकड ली दूसरी राह। उस वक्त के ख्यातिनाम छायाकारों में बनारस फोटो गैलरी के मो इश्तियाक अहमद, सत्यनारायण, कृष्णानंदजी आदि थे। आर्यावर्त से अपने करियर को शुरू करने वाले किशन बड़े ही मिलनसार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। मुझे याद है जब 1975 में पटना में बाढ़ आयी थी, पूरा पटना पानी में डूबा था। संचार के सारे साधन ठप। सभी अखबारों का प्रकाशन बंद। कमर भर पानी में हेल कर मैं उनके घर पहुंचा और बाढ़ की कुछ तस्वीरों की अपेक्षा की। जरा सोचिये। निगेटिव से फोटो बना कर चूल्हे पर उसे सुखाया और 10-12 तस्वीरें दीं जो वाराणसी से प्रकाशित ‘आज‘ में छपा।

उस वक्त ‘आज‘ का मैं पटना नगर से संवाददाता था। उत्तर भारत के किसी भी अखबार के लिए पहली रिपोर्ट थी जो पटना डेट लाइन से छपी। वाराणसी तक खबर लेकर मैं कैसे पहुंचा, इसकी एक अलग कहानी है। किशनजी पटना सिटी स्थित मेरी कुटिया पर बराबर आया करते थे। इस उम्मीद से कि गुरुद्वारा में मनाये जाने वाले गुरुपर्व को कवर करने का एक मौका मिल जाये। एक मौका का मतलब था उस समय का दो हजार रुपये का भुगतान। संयोग से पूज्य पिताश्री स्वर्गीय रामजी मिश्र मनोहरजी के जरिये उन्हें यह काम चार पांच बार मिला और उसके बाद उनकी गाड़ी पटरी पर आ गयी।

इसके बाद छिड़ा सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन में उनका महत्व और भी बढ़ा। सबसे बड़ी बात यह थी उनमें कि वे किसी का तिरस्कार नहीं करते थे। चाहे छोटा पत्रकार या नामचीन। राजनीतिज्ञों के बीच भी उनकी वैसी पैठ थी। पटना से बाहर भी कई स्टोरी के कवरेज के लिए उनके साथ जाने का मौका मिला था। ‘रविवार‘  पत्रिका के लिए अरूण रंजन और किशन की जोड़ी फेमस हो गयी थी। अरूणजी की बेबाक लेखनी और किशन भाई की तस्वीर। उस वक्त भी प्रतिस्पर्धा होती ही थी। सन अस्सी के दशक में छायाकारों का एक नया दल बना जिसके गुरु तो कृष्ण मुरारी ही थे लेकिन बाद में वह गुटीय आधार पर बंट गया।

इनके अनुज कृष्ण भान शर्मा और पुत्र अमृत जय किशन भी इसी पेशे में हैं। बहरहाल गंभीर बीमारी के दौरान पटना के अस्पताल में भर्ती किशन भाई को तुरंत दिल्ली के मेदांता अस्पताल तक पहुंचाने में बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता नंदकिशोर यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पटना से बाहर कार्यक्रम में व्यस्त मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी से श्री यादव ने बातचीत की और उनके लिए एयर एंबुलेंस की व्यवस्था की। अपने संघर्ष के बल पर शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले भाई कृष्णमुरारी किशन को मेरा शत शत नमन।

लेखक ज्ञानवर्द्धन मिश्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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मौत ने दूसरी बार कृष्ण मुरारी किशन को मौका नहीं दिया

Vinayak Vijeta : किशन जी का हंसता हुआ वो नूरानी चेहरा… जुल्फें बिखरी पर खिंची तस्वीरों का रंग सुनहरा… 1981 में किशन जी से सासाराम में हुई थी पहली मुलाकात.. एक बार मौत को मात दे दी थी हमारे बड़े भाई किशन जी ने… बिहार ही नहीं देश के दस सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफरों में शुमार कृष्ण मुरारी किशन जी से हमारी पहली मुलाकात 14 जनवरी 1981 में तब हुई थी जब वो कोलकाता से प्रकाशित और तब के सबसे चर्चित साप्ताहिक ‘रविवार’ के लिए कार्य किया करते थे। उस वक्त किशन जी की कला की इतनी धधक थी कि उन्हें इस पत्रिका द्वारा बिहार के बाहर भी फोटोग्राफी के लिए बुलाया जाता था। किशन जी से जब पहली बार सासाराम में हमारी मुलाकात हुई तो उस वक्त मैं सातवीं कक्षा में पढ़ा करता था।

स्व. कृष्ण मुरारी किशन

उस वक्त बेगुसराय निवासी व रविवार में कार्यरत वरीय उपसंपादक विजय कुमार मिश्र जो हमारे नजदीकी रिश्तेदार हैं एक न्यूज के सिलसिले में डुमरांव (बक्सर) के पास स्थित एक गांव में मल्लू नामक मजदूर की व्यथा पर रिपोर्टिंग करने गए थे। तब 12 किलोमीटर पैदल चलकर तैयार की गई यह रिपोर्ट ‘रविवार’ में ‘मल्लू की आजादी, राय साहब के यहां गिरवी’ शीर्षक से छपी थी। स्टोरी ने तो हंगामा मचाया ही था कृष्ण मुरारी किशन की तस्वीरे भी काफी चर्चित हुई थीं। बक्सर से ही लौटने के दौरान विजय भैया और किशन जी रोहतास के तत्कालीन एसपी किशोर कुणाल और उनकी पत्नी के साथ रात हमारे घर पहंचे और चारो लोगों ने हमारे घर पर ही खिचड़ी का आनंद लिया। हमारे रिश्तेदार विजय कुमार मिश्र जो नेतरहाट विद्यालय से पासआऊट थे वो और किशोर कुणाल बाद में पटना कॉलेज मे बैचमेट रहे थे।

उस वक्त मेरे इंजीनियर पिता सासाराम में पदस्थापित थे। अपने रिश्तेदार से ज्यादा किशन जी से प्रभावित होकर तब मैंने कोलकाता जाकर उस वक्त का मशहुर कैमरा ‘जेनीथ’.खरीदा था और पत्रकारिता जीवन की पहली शुरुआत मैंने फोटोग्राफी से ही की थे। मैंने 12 वर्ष की उम्र से ही पत्रकारिता को अपना पहला और अंतिम लक्ष्य बनाने की ठान ली थी। मैंने किशन जी को कभी तनाव में नहीं देखा। हर क्षण उनके चेहरे पर मुस्कराहट ही देखी। न अहंकार न अभिमान। बड़ो को प्रणाम और छोटों को स्नेह व प्यार शायद किशन जी के जन्मजात संस्कारों में शामिल रहा।शयद कम ही लोगों को पता होगा कि किशन जी ने अपने घर के सामने एक चाय विक्रेता की छोटी बच्ची में पढ़ने की ललक देक अपने खर्च से उसका स्कूल में नामांकन कराया और अबतक वह उस बच्ची का खर्च उठा रहे हैं जो बच्ची उन्हें ‘मामा’ कहती है।

डेढ़ दशक पूर्वं मुजफ्फरपुर से देर रात पटना लौटते वक्त भगवानपुर के समीप रोड लुटेरों ने किशन जी की गाड़ी रुकवा उन्हें लूटने के क्रम में उन्हें गोली मार दी थी (तस्वीर) तब काफी गंभीर और चिंताजनक स्थिति में पटना लाए गए किशन जी को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इलाज के लिए दिल् ली भिजवाया था जहां चिंताजनक स्थिति रहने के बाद भी किशन जी ने मौत को मात दे दी थी पर इस बार वह मौत को मात नहीं दे सके और जिंदगी और मौत के बीच आठ दिनों से चल रही लड़ाई में कुख्यात मौत ने उन्हें अपने सामने घुठने टेकने पर मजबूर कर दिया। बड़े भाई समान और हमारे प्रेरणा किशन जी को हमारी भावभीनी श्रद्धांजली…..‘हम आपको यूं भूला न पाएंगे, जब भी आएगी याद तेरी-दो बूंद आंसू जरूर बहाएंगे!’

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर….

बिहार के चर्चित फोटो जर्नलिस्ट कृष्ण मुरारी किशन का निधन

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वेद प्रकाश ओझा पंचतत्व विलीन, पत्रकार कल्याण कोष बनाने पर मंथन शुरू

प्रभात खबर धनबाद के मुख्य संवाददाता वेद प्रकाश ओझा गुरुवार को पंचतत्व में विलीन हो गये. कोलकाता के कालीघाट शमशान घाट पर अंतिम संस्कार हुआ. छोटे पुत्र कुमार अनिकेत ने मुख्गानि दी. इस दौरान कई परिजन व शुभचिंतक मौजूद थे. देर शाम परिजन कोलकाता से वापस धनबाद लौटे. सनद हो कि श्री ओझा की मृत्यु बुधवार शाम कोलकाता में एक लंबी बीमारी के बाद हो गयी थी.

प्रेस क्लब धनबाद की ओर से गुरुवार को एक शोक सभा आयोजित कर दिवंगत पत्रकार वेद प्रकाश ओझा को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गयी. पत्रकारों के अलावा कई सामाजिक एवं व्यावसायिक संगठनों के प्रतिनिधि सभा में शामिल हो कर अपने प्रिय साथी को याद किया. सबसे पहले उनकी आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन धारण किया. इसके बाद सभी ने उनके चित्र पर फूल-माला चढ़ा कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया.

शोक सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार बनखंडी मिश्र तथा संचालन संजीव झा ने किया. पत्रकार भारतीय बसंत कुमार ने कहा कि वेद प्रकाश हमेशा अपने साथियों के बीच लोकप्रिय रहे. कहा कि दिवंगत पत्रकार के परिजनों को आर्थिक सहयोग देने का प्रयास हो. पत्रकार गणोश मिश्र ने कहा कि श्री ओझा बहुत ही मिलनसार थे. उनकी कमी हमेशा खलेगी. पत्रकार इंद्रजीत प्रसाद सिंह ने पत्रकारों के लिए कल्याण कोष बनाने पर बल दिया. कहा कि यहां पत्रकारों के सहायता के लिए कोई फंड नहीं है. छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज में भी परेशानी होती है. अध्यक्षता करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि पत्रकारों के लिए कल्याण योजना बने. साथ ही ऐसी व्यवस्था हो कि भविष्य में पत्रकारों को परेशानी नहीं हो.

प्रेस क्लब के अध्यक्ष संजीव झा ने कहा कि जल्द ही धनबाद में पत्रकारों के लिए कल्याण कोष की व्यवस्था की जायेगी. इसमें समाज के सभी वर्ग से सहयोग लिया जायेगा. पत्रकारों का सामूहिक बीमा कराने के लिए भी बीमा कंपनियों से बात चल रही है. शोक सभा में वेद ओझा के परिजनों को आर्थिक मदद करने का निर्णय लिया गया. इसके लिए पत्रकार पंकज कुमार के नेतृत्व में एक कमेटी बनायी गयी जो पत्रकारों तथा शुभचिंतकों से सहयोग राशि संग्रह कर उनके परिवार को देगा. पांच फरवरी तक लोग उनके पास राशि जमा कर सकते हैं.

सभा में आशीष प्रसाद सिंह, प्रियेश कुमार, दिलीप सिन्हा, अभय कुमार, अभिषेक सिंह, बलराम दुबे, अजय प्रसाद, अजय मुखर्जी, सुभाष मिश्र, नारायण चंद्र मंडल, धर्मेद्र प्रसाद गुप्त, जयदेव गुप्ता मनोज, अरुण बरनवाल, अशोक वर्मा, सुधीर सिन्हा, मृत्युंजय पाठक, आशीष अंबष्ट, मोहन गोप, अमित वत्स, गंगेश गुंजन, उमेश तिवारी, रविकांत झा, संजय कुमार, धीरज गुप्ता, मनोज शर्मा, दिनेश पासवान, ज्योति राय, राज कुमार मंडल, उमेश श्रीवास्तव, सुरेंद्र यादव, शैलेश रावल, शमशुल हक, दीपक पांडेय, सत्या राज, रोशनी झा, प्रतीक पोपट, गोपाल प्रसाद, अशोक झा, जनक सिंह चौधरी, केके सुनील, अजीत सिंह, अमित मिश्र, विद्युत वर्मा, धर्मेद्र पांडेय, नवीन राय, चंदन पाल, गौतम डे, लखन कुमार, नवनीत कुमार, अशोक कुमार, श्रवण सिंह, दिलीप दीपक, अमरजीत कुमार, रवि मिश्र सहित बड़ी संख्या पत्रकार शामिल थे.
अधिकारी, उद्योगपति भी

श्रद्धांजलि सभा में झारखंड पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के महामंत्री शरत दुदानी, बैंक मोड़ चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सुरेंद्र अरोड़ा, महासचिव प्रभात सुरोलिया, प्रमोद गोयल, पुराना बाजार चेंबर के अध्यक्ष अजय नारायण लाल, सचिव मो. सोहराब ने श्रद्धा सुमन अर्पित किया. बीसीसीएल के डीजीएम सह सीपीआरओ आरआर प्रसाद, पीआरओ विजय खरे, सिंफर के उप निदेशक इश्तियाक अहमद, रेलवे के मो. शफीख खान, भाजपा नेता संजय झा ने भी दिवंगत पत्रकार के चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया. जिला चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष राजीव शर्मा एवं महासचिव राजेश गुप्ता ने शोक जताते हुए स्व. ओझा के परिजनों को आर्थिक मदद करने की घोषणा की है. सामाजिक  कार्यकर्ता जितेंद्र कुमार सिंह ने शोक जताते हुए कहा कि यह उनके लिए व्यक्तिगत क्षति है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिंह ने शोक जताते हुए कहा कि दु:ख की घड़ी में वे उनके परिजनों के साथ हैं. आइएसएम प्रबंध विभाग के विभागाध्यक्ष डा. प्रमोद पाठक ने कहा कि वेद के साथ उनके पारिवारिक संबंध थे. उनके निधन से गहरा झटका लगा है.

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श्रद्धांजलि : कैंसर से पंजा लड़ाते हुए अमरेंद्र कुमार ने पत्रकार की तरह जीना नहीं छोड़ा

अमरेंद्र कुमार


वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं। 10 मई, 1945 को जन्मे इस शख्स ने 13 दिसंबर, 2014 को आखिरी सांस ली। जब भारत आजादी के करीब पहुंच रहा था तो उसी दौरान अमरेंद्र कुमार का जन्म बिहार के सासाराम में हुआ। जब वे अपने पैरों पर खड़े हो कर चलना शुरू ही किए थे तो भारत स्वतंत्र देश बन चुका था। और स्वाभाविक तौर पर, उनमें स्वतंत्र खयाल कूट कूट कर भरा हुआ था। स्वतंत्र खयालों के होने की वज़ह से उन्होंने जिंदगी को अपनी तरह से जीया और परिस्थितियों के साथ समझौता नहीं करने की उनकी जिद्द ने कई बार उनका माली नुकसान भी कराया। मगर, जो विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखते हैं, वे नफे नुकसान का कभी खयाल कहां रखते और ये सारी बातें उनके व्यवहारों और कार्यप्रणालियों में साफ देखने को मिलता था।

पत्रकार बनने की इच्छा तो उन्हें बहुत बाद में पैदा हुई। उन्होंने तो बाकायदा काॅलेज में पढ़ाना लिखाना भी शुरू कर दिया था। मगर, जवाहर लाल नेहरू काॅलेज, डिहरी आॅन-सोन में साढ़े चार साल तक काम करने के बाद वह दायरा उन्हें छोटा लगने लगा और अपने ज्ञान और विज्ञान को प्रसार देने के लिए उन्होंने पत्रकारिता को पेशे के तौर पर चुनने का ऐलान किया। रास्ता मुश्किलों भरा था, घर परिवार में विरोधी स्वर भी मुखर हुए, लेकिन अपनी मुखरता के लिए मशहूर अमरेंद्र जी ने पीछे मुड़ने से साफ मना कर दिया।

शुरुआत भी गजब तरीके से हुई। अपने दम पर अखबार निकालने का फैसला कोई हंसी ठट्ठा का काम तो था नहीं। मगर, जिनके इरादे बुलंद होते हैं वे नतीजों के बारे में पहले से विचार कहां करते, सो अपने ही तरह के विचारों से ओतप्रोत ‘जन बिक्रांत’ नाम के अखबार को निकालने का फैसला किया। ये उनकी प्रतिभा का ही असर था कि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद उनके अखबार का उद्घाटन करने के लिए तैयार हो गए। अखबार निकला और जब तक निकाला, ताल ठोंक कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराता रहा।

मगर, आर्थिक मुश्किलों का सामना ना तो जज्बातों से किया जाता है और ना विचारों से। अखबार निकलना बंद हो गया। अब रोजगार की नई समस्या खड़ी हो गई। मगर, अमरेंद्र जी इस बात से अच्छी तरह वाकि़फ थे कि जब एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा अपने आप खुल जाता है और खास कर तब जब आप में कुछ कर गुजरने का दमखम हो। हुआ भी वही, पटना से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित अखबार ‘आज’ के संपादक ने उन्हें मिलने का आमंत्रण भेजा और शुरू हो गई एक नई यात्रा। बतौर न्यूज एडिटर तक का सफर पूरा करने के बाद उन्होंने दिल्ली की ओर रूख किया और राष्ट्रीय अखबार ‘राष्ट्रीय सहारा’ के मुख्य पृष्ठ के इंचार्ज बना दिए गए।

बिहार के एक छोटे से जिले से अपना पत्रकारिता का करियर शुरू करने वाले अमरेंद्र जी की ये उन बड़ी उपलब्धियों में शामिल नहीं है जो उन्होंने बाद के दौर में इस क्षेत्र में अपनी लेखनी के जरिए योगदान दिया। ‘युग’ नाम का पाक्षिक पत्रिका उनके संपादकत्व में लंबे समय तक दिल्ली से प्रकाशित होता रहा। जब तक वे इस पत्रिका में रहे, पत्रिका युगांतकारी साबित हुई।  इसके बाद उन्होंने वाईएमसीए में पत्रकारों को बनाने का फैसला किया। यहां पर नए-नए छात्रों से रूबरू होने के बाद पहली बार उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि नई पीढ़ी भाषा के स्तर पर काफी पिछड़ी हुई है और जब तक भाषा में सुधार नहीं होता, पत्रकारिता के मानक स्तर बिखर कर रह जाएंगे। सो, उन्होंने भाषा को बेहतर बनाने के लिए किताबें लिखनी शुरू कर दी।

21वीं सदी और हिंदी पत्रकारिता, पत्रकारिता के अश्वथामा (उपन्यास), हिंदी पत्रकारिता के अध्ययन अध्यापन में मील का पत्थर साबित हो रहा है। कई सारे अन्य किताबों में कस्बानामा (कथा रिपोर्ताज), कविता संग्रह कतरन, कहानी संग्रह-यहां वहां, व्यंग्य संग्रह-दूसरों के जरिए, जो है सो, सुन मेरे बंधु रे, अक्षरों की मछलियां (कहानी संग्रह), लड़की देखेंगे (नाटक) शामिल हंै। इन सब मुश्किल कामों को पूरा करते हुए भी वे पत्रकारिता से कभी खुद को अलग नहीं रख सके और व्यस्तताओं के बावजूद उनके स्वतंत्र लेखन का काम अनवरत चलता रहा। तब भी, जब उनके स्वास्थ्य ने उनका साथ देना छोड़ दिया था। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पंजा लड़ाते हुए उन्होंने पत्रकार की तरह जीना नहीं छोड़ा। लिखते रहे और बस, लिखते ही रहे। यही तो खयाल था, जो उन्हें स्वतंत्र खयालों वाला बनाए हुए था।

अब, वे हमारे बीच सशरीर नहीं हैं। मगर, उनके शब्द, उनके ज्ञान, उनकी प्रेरणा स्त्रोत बातें, उनके साथ बिताए लंबा वक़्त, उनकी यादें, उनकी बातें-सब कुछ जेहन में रचा बसा हुआ है। उनकी खामोशी सालती जरूर है मगर, उनकी यादें, उनके होने का हर पल ये अहसास कराती है कि जैसे वे कह रहें हों कि जला तो सिर्फ शरीर ही है। शरीर का जल जाना एक क्रिया मात्र है। जीवन यहीं खत्म नहीं होती। आज भी हम साथ साथ हैं।

युवा लेखक अमित कुमार से संपर्क kumaramit06@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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शिवम भट्ट से मेरी वो पहली और आखिरी मुलाकात

मैं शिवम भट्ट को नहीं जानता था, पहली और आखिरी मुलाकात हिसार के बरवाला में हुई थी, जब रामपाल दास के सतलोक आश्रम का विवाद चल रहा था। सभी पत्रकारों को आश्रम से तकरीबन एक किलोमीटर दूर बैरिकेट्स लगाकर रोक दिया गया था। जिस कारण सभी न्यूज चैनल के पत्रकार उसी बैरिकेट्स से अपना लाइव दे रहे थे। उनमें से मैं भी एक था।

जैसे ही मेरा लाईव खत्म हुआ, मेरे पास आकर उसने कहा- भैया आप रामपाल के बारे में शायद काफी जानते हैं. मैने कहा-हां, मैं रोहतक का रहने वाला हूं और रामपाल का आश्रम विवाद वहीं से शुरू हुआ था, इसको मैंने कई बार कवर किया है, इसलिए इसके अतीत के बारे में कुछ जानकारी है।

फिर क्या था, उसने तकरीबन आधे घंटे तक रामपाल की सारी कहानी मेरे से पूछ ली और कहा कि थैंक्यू भैया, अब मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि विवाद के असली कारण का पता चल गया और रामपाल के इतिहास का भी।

ये सामान्य-सी बात है, जो मेरे और शिवम के बीच हुई थी, लेकिन इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि शिवम ने सबसे पहले बरवाला पहुंचते ही रामपाल दास के बारे में अपनी नालेज को अपडेट किया। वरना वहां पर दिल्ली के बहुत-से ऐसे स्वयंभू पत्रकार भी पहुंचे थे, जिन्हें ये तक नहीं पता था कि रामपाल दास कौन है और उसका आखिर विवाद क्या है। पहुंचते ही पीपली लाईव की तरह लग गए पूरी दुनिया के सामने अपना ज्ञान झाड़ने।

आज शिवम हमारे बीच में नहीं है..भगवान उनके परिवार को दुख सहने का सामथ्र्य दे। हम तो सिर्फ अफसोस ही जता सकते हैं।

धीरेन्द्र कुमार
रोहतक।
09813172122
dhiru.haryana@gmail.com

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जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट की हरियाणा में सड़क हादसे में मौत

एक दुखद खबर हरियाणा से है. जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट का सड़क हादसे में निधन हो गया है. वे हिसार में रामपाल प्रकरण कवर करने गए हुए थे. सड़क हादसे में जयवीर रावत और रोहित खन्ना घायल हुए हैं. हादसा कैथल के पास हुआ. हादस आज यानि 20 नवंबर की सुबह हुआ. शिवम की उम्र लगभग 24 साल थी. शिवम कई दिनों से हिसार के बबराला में रामपाल प्रकरण को कवर कर रहे थे. कल रात रामपाल की गिरफ्तारी के बाद जी न्यूज की टीम वापस चंडीगढ़ जाने के लिए निकली.

शिवम भट्ट के साथ रिपोर्टर रोहित खन्ना और कैमरापरसन जयवीर भी थे. रोहित व जयवीर को काफी चाटें आई हैं. शिवम भट्ट की मौके पर ही मौत हो गई. शिवम भट्ट जी मीडिया के साथ 3 फरवरी 2014 को जुड़े थे और पंजाब, हिमाचल, हरियाणा के लिए चंडीगढ़ में कार्यरत थे. शिवम भट्ट के निधन पर इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन (इम्वा) के पदाधिकारियों ने दुख व्यक्त किया है. इम्वा की तरफ से केन्द्र सरकार और राज्य सरकार से मांग की गई है कि शिवम भट्ट के परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए.

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कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार डॉ. रुक्म त्रिपाठी का निधन

डॉ. रुक्म त्रिपाठी


मेरे पूज्य भैया, मेरे गुरु मेरे अभिभावक डॉ. रुक्म त्रिपाठी नहीं रहे। आठ दशक का  एक व्यक्तित्व पलक झपकते इतिहास बन गया। उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के बिलबई गांव में 12 जुलाई 1925 को शुरू हुआ उनकी जिंदगी का सफर 2 नवंबर की शाम कोलकाता में थम गया। यों तो डेढ़ साल पहले भाभी निरुपमा त्रिपाठी के गुजरने के बाद ही वे टूट चुके थे। मन और धीरज से भी। उस वक्त रोते हुए बोले थे -मुझे अनाथ कर के चली गयी।

मैंने उनको ढांढस बंधाया कि आप अनाथ कैसे हो गये हम तो हैं। उनके शब्द थे- तुम लोग हो तो सहारा मिल गया वरना मैं भी नहीं बचता। उसके बाद से हमने कभी उन्हें अकेला या बेसहारा नहीं छोड़ा। जितना बन पड़ा इलाज भी कराया लेकिन एक तो मन की टूटन दूसरे बार्धक्यजनित कफ आदि रोग। वे निरंतर थोड़ा-बहुत बीमार रहने लगे थे। पिछले छह महीनों में दो बार नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ा। घर में भी आक्सीजन वगैरह का प्रबंध था लेकिन यह प्राणवायु भी 2 नवंबर को काम न आयी। सांस लेने में उनकी तकलीफ इतनी बढ़ गयी कि उन्हें तत्काल नर्सिंग होम ले जाया गया लेकिन रास्ते में ही उनका निधन हो गया।  

पराधीन भारत में उनका जन्म हुआ था। जितना बन पड़ा उन्होंने स्वाधीनत संग्राम में योगदान दिया। लाठियां खायीं, प्रताड़नाएं सहीं। लेकिन जब स्वाधीनता सेनानियों के लिए ताम्रपत्र दिया जा रहा था पेंशन दी जा रही थी, उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि हमने संघर्ष देश को स्वाधीन बनाने के लिए किया था, किसी सम्मान या धन प्राप्ति के लिए नहीं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उन्होंने गीत लिखा था जिसमें स्वाधीनता प्राप्ति के वार, दिन, नक्षत्र का वर्णन था। उसकी आखिरी पंक्ति थी-हिंद की गुलामी का रुक्म आज बेड़ा पार है। कवि सम्मेलनों में जब वे यह गीत गाते वहां उपस्थित जनसमूह आखिरी पंक्ति  दोहरा देता था। वे जब तक बांदा में थे ” व्यथित” उपनाम से कविताएं लिखते थे। उन दिनों बालकृष्ण राव बांदा के कलेक्टर थे और स्वयं भी हिंदी के अच्छे कवि थे। वे अपने यहां कवि गोष्ठियां करवाया करते थे जिनमें भैया भी भाग लेते थे। उनकी कविताएं सुन कर राव साहब बोले-क्या व्य़थित उपनाम रखा है तुम तो रुक्म (स्वर्ण) हो तुम यही उपनाम रखो।तब उन्होंने उनका सम्मान करते हुए यह नाम दिया। यह है रामखिलावन त्रिपाठी के रुक्म बनने की दास्तान।

कालांतर में वे कोलकाता चले आये और कई पड़ावों, कार्यों से गुजरते हुए आखिरकार पत्रकारिता और साहित्य सृजन को अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाया। कलकत्ता के पत्रकारिता और साहित्य जगत में कोई रामखिलावन त्रिपाठी ( भैया का वास्तविक नाम)  नहीं जानता था लेकिन रुक्म जी के नाम से हिंदी पत्रकारिता जगत से जुड़ा हर व्यक्ति परिचित था। पूर्वी भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय दैनिक सन्मार्ग में उन्होंने आधी शताब्दी गुजारी जिस दौरान पत्र के साहित्य परिशिष्ट के संपादन के दौरान उन्होंने अक्सर नये रचनाकारों को प्रोत्साहित किया। पूछने पर कहते-प्रतिष्ठ जमे- जमाये लेखक तो हर जगह छप जाते  हैं, नये लोगों को भी मौका दिया जाना चाहिए। वे ऐसा करते समय कई बार नये लेखकों की कहानी का पुनर्लेखन तक करते थे। इतनी उम्र में भी उनकी स्मृति शक्ति दुरुस्त थी और पलक झपकते कविता, कहानी लिख लेते थे। सन्मार्ग के “चकल्लस” स्तंभ में नियमित व्यंग्य कविता लिखते थे जो उन्होंने 2  नवंबर को भी लिखी जो पत्र के 3 नवंबर अंक में छपी। उनके स्तंभों में लिखने वाले बाल लेखक आज बड़े पत्रकार और पत्रों के संपादक हैं। वे उन्हें इतना आदर करते थे कि सम्मान से “गुरु जी” ही कहा करते थे।

उन्होंने असंख्य कविताएं, कहानियां और उपन्यास लिखे। उनके उपन्यास रोशनी और रोशनी, अंगूरी, बर्फ की आग,अनचाही प्यास, मेरे दुश्मन मेरे मीत, नीली रोशनी (जासूसी) बहुत लोकप्रिय रहे। उनके काले मन उजले लोग, बहकी राहें, नरोत्तम नारायणी धारावाहिक प्रकाशित हुए। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। मासिक-रूपवाणी, पागल, राजश्री, गल्प भारती, घरोवा, साप्ताहिक-स्क्रीन (हिंदी) स्वप्नलोक का संपादन किया। सन्मार्ग हिंदी दैनिक में साहित्य संपादन किया व महानगर सांध्य दैनिक के संपादक रहे। उन्हें कई सम्मान भी प्राप्त हुए। लायंस क्लब कोलकाता द्वारा पत्रकारिता के 50 साल पूरे होने पर सम्मान, विक्रमशिला विद्यापीठ भागलपुर की ओर से विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि। पीयूष साहित्य परिषद पटना की ओर से पत्रकारिता सम्राट, राजश्री स्मृति न्यास से सम्मान, मनीषिका कोलकाता सारस्वत रचनाकार सम्मान।

मेरे लिए भैया का जाना सिर से उस वटवृक्ष के अचानक हट जाने के समान है जिसके रहते मैंने कभी खुद को असुरक्षित नहीं महसूस किया, उनके आशीष सदा जैसे मेरे साथ रहे। वे थे तो घर में किसी बड़े के होने का एहसास था। कुछ भी लिखता उनसे जंचा लेता था अब मैं नितांत अकेला रह गया हूं। आफिस से लौटने में देर होती तो फोन करने लगते, मेरे पहुंचने से पहले खाना तक नहीं खाते थे। अब वह प्यार, फिक्र करने का उनका वह अपनत्व कभी नहीं मिलेगा, यह सोच कर ही मन भर जाता है। जिस तरह कोई किसी को हाथ पकड़ कर सिखाता है उस तरह उन्होंने मुझे गीत, गजल कहानियां लिखना सिखाया। आज अगर मैं दो अक्षर लिख पाता हूं तो उनकी खातिर। सौभाग्यशाली रहा कि भाई के रूप में गुरु मुझे घर में ही मिल गये। भैया की कमी मुझे  हमेशा सालती रहेगी। शायद उनके लिए उन लोगों की आंखें भी नम होंगी जो उनकी व्यंग्य कविता चकल्लस में पढ़ कर उनसे कहते थे कि-हमें लगता है कि जैसे कोई बुजुर्ग, कोई गुरु कविता की एक-एक पंक्ति से जमाने के ऊंच-नीच, अच्छे-बुरे से हमें आगाह कर रहा हो। उनकी और उन लोगों की भी स्मृति में वे रहेंगे जिनके वे जो हैं उस होने में उनका थोड़ा भी योगदान रहा हो।

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09433728973 के जरिए किया जा सकता है.

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कलराज मिश्र ने स्व. बजरंग शरण तिवारी को उनके आवास पर जाकर दी श्रद्धांजलि

लखनऊ। लोकतंत्र सेनानी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी के मित्र एवं सुविख्यात पत्रकार स्व. बजरंग शरण तिवारी के हीवेट रोड स्थित आवास पर रविवार को सायं आठ बजे केंद्रीय लघु मंत्री तथा वरिष्ठ भाजपा नेता कलराज मिश्र ने उनके परिवार के सदस्यों से कुशलक्षेम पूछा।

वहां उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद परिवार वालों को युवावस्था के दौरान स्व. बजरंग द्वारा दिये गये दिशा-निर्देश के बारे में अपने संस्मरण बताए। लगभग घंटे भर तक समय बिताने के बाद स्व. बजरंग के दोनों पुत्रों एडवोकेट कृष्ण कुमार तिवारी एवं वरिष्ठ पत्रकार एवं वायस ऑफ मूवमेंट के संपादक प्रद्युम्न तिवारी का ढाढंस बंधाया।

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ऋषि की तरह थे बजरंग शरण तिवारी, नेता या सत्ता से कभी कोई अपेक्षा नहीं की : वीर विक्रम बहादुर मिश्र

: वरिष्ठ पत्रकार बजरंग शरण तिवारी के निधन पर श्रद्धांजलि : उपजा व लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने आयोजित की श्रद्धाजलि सभा :  लखनऊ। आपातकाल में अहम भूमिका निभाने वाले राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत वयोवृद्ध पत्रकार बजरंग शरण तिवारी के निधन पर उपजा के प्रान्तीय कार्यालय में लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा शनिवार को एक सभा का आयोजन कर दो मिनट का मौन धारण कर मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई।  उल्लेखनीय है कि वयोवृद्ध पत्रकार बजरंग शरण तिवारी का गत् बुधवार को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नाकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में देर शाम इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे।

पी0टी0आई0 के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने तिवारी के निधन को पत्रकारिता जगत में अपूर्णनीय क्षति बताया और कहा कि मूल्यों और विचारों की पत्रकारिता करने वाले एक और सदस्य का जाना हम सब के लिए असहनीय है।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने पत्रकार बजरंग शरण तिवारी के दौर की पत्रकारिता के अतीत की यादें ताजा करते हुए तिवारी से जुडे अपने संस्मरण सुनाये। अजय कुमार ने बताया कि तिवारी आपातकाल के समय 26 जून 1975 को तरुण भारत समाचार पत्र में कार्यरत थे और वहीं से उन्हें जेल भेजा गया। पं. दीनदयाल उपाध्याय के साथ प्रसिद्ध पत्रिका राष्ट्रधर्म के संस्थापकों में से वे एक थे। इसी पत्रिका के संपादक के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कार्य किया।

उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह ने बजरंग शरण तिवारी के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि बजरंग शरण तिवारी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के साथ आपातकाल में संघर्षरत रहे। उन्होंने तरुण भारत, राष्ट्रधर्म जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संस्थापकों में रहे, उन्होंने इन पत्रिकाओं में समय-समय पर संपादन व विशेष भूमिकाएं निभाई। शुरू से क्रांतिकारी स्वभाव के बजरंग शरण ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर देश के उत्थान में अहम योगदान दिया।

वरिष्ठ पत्रकार सुनील पावगी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि तिवारी बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव के थे । उन्होने बताया कि  स्व. बजरंग शरण कलाकुंज पत्रिका से भी लंबे समय तक जुड़े रहे। अपने युवावस्था से हिंदी भाषा के लिए कार्य करने वाले स्व. बजरंग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे।

वरिष्ठ पत्रकार वीरविक्रम बहादुर मिश्र ने बजरंग शरण तिवारी को एक ऋषि की संज्ञा दी। उन्होने कहा कि अटलबिहारी बाजपेई जैसी शख्सियत के करीबी होने के बावजूद तिवारी ने उनसे या सत्ता से कोई अपेक्षा नही की।  पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना ने बताया कि तिवारी अपने पीछे अपने दो पुत्र एडवोकेट कृष्ण कुमार तिवारी व वरिष्ठ पत्रकार प्रदुम्न तिवारी समेत भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। प्रद्युम्न तिवारी ने उनके साथ अमर उजाला में काम किया था।

उपजा की लखनऊ इकाई लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने तिवारी के निधन पर गहरा दुखः व्यक्त करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदनाए प्रकट की है और ईश्वर से प्रार्थना की है कि वह दुःख की इस घडी में परिजनों को सांन्त्वना प्रदान करे। इस मौके पर एल0जे0ए0 के महामंत्री के0के0वर्मा, उपाध्यक्ष सुशील सहाय, भरत सिंह, रत्नाकर मौर्य, कोषाध्यक्ष मंगल सिंह, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिह, विकास श्रीवास्तव, सहित वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर शुक्ल, श्रीधर अग्निहोत्री , मुकेश श्रीवास्तव , उपजा के प्रदेश मंत्री  सुनील टी त्रिवेदी, पत्रकार तारकेश्वर मिश्र, शैलेन्द्र श्रीवास्तव, रीता त्रिवेदी सहित अनेको पत्रकारो ने  वरिष्ठ पत्रकार बजरंग शरण तिवारी के निधन पर गहरा दुखः व्यक्त किया और पुष्प श्रद्धांजलि अर्पित की।

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LAST CHAT WITH AJAY JHA SIR

Dear Yashwant ji,  Still my hands are trembling , am shaken and eyes full of tears. Do not know how am I even writing all this. It feels as he was just there with me. A while ago. On whatsapp, on facebook, on gmail chat, on phone – blessing me from India. Our chat only used to  start with me saying CHARANSPARSH DADA with a reply coming from him many times as KALYANAM ASTU.

13th October he told me he came out of DD … Below are the excerpts from the gmail chat i had last with him..

Monday, October 13, 2014:

    Ajay N Jha – 11:53 AM
    kya babu. kya haal?

    Amit Kakkar – 11:55 AM
    dada pranam
    charansparsh

    Ajay N Jha – 11:57 AM
    theek thaak…
    I came out of DD last friday…
    was getting sick there.
    it is looked after by a bunch of jokers who have no vision,.. just pen pushers…
    thinking of doing something out of the box…..

    Amit Kakkar – 11:59 AM
    ohhh ok
    like what ??
    but sir salary to aa rahi thi and it was givt job
    govt job

    Ajay N Jha – 12:00 PM
    in life, you are faced with chicken or egg.

    Amit Kakkar – 12:00 PM
    ok
    but whats the fresh plan now

    Ajay N Jha – 12:00 PM
    I have to bother about kevin’s education.. his future.. I am thinking of shifting back to Bangalore…

    Amit Kakkar – 12:00 PM
    but what job there ?

    Ajay N Jha – 12:01 PM
    i would go back to academics.. may be as HOD of some media institution…
    i can reaD AND WRITE AND TEACH.. TEACHING IS A NOBLE PROFESSIOPN…

    Amit Kakkar – 12:05 PM
    hmmm
    kya sir…is time apka apna ek channel hona chahiye tha
    🙁
    kuch karo na

    Ajay N Jha – 12:05 PM
    i never tried to become, Rajdeep, Chaurasia aur Raajiv shukla.. I always remained on my own….

    Amit Kakkar – 12:06 PM
    i know

    Ajay N Jha – 12:06 PM
    let us see how things develop from here….

    Amit Kakkar – 12:06 PM
    u r a different league all together
    but sarkari naukri thi sir …chalao na

    Ajay N Jha – 12:16 PM
    it was a consultants job babu.. no fixed sarkari naukri…
    advisors and consultants in DD are the same.

    Amit Kakkar – 12:41 PM
    ok
    but money was coming

    Ajay N Jha – 1:44 PM
    kevin’s future is more important.

    Amit Kakkar – 2:31 PM
    but sir money se hi to future banega
    either u take me also along with u and i can also teach advertising

    Ajay N Jha – 2:32 PM
    i would find the way.

    Amit Kakkar – 2:32 PM
    and i will be under ur guidance which i always wanted

    Ajay N Jha – 2:33 PM
    thanks

    Amit Kakkar – 2:36 PM
    when r u planning to shift base

    Ajay N Jha – 2:36 PM
    next year

i am into media because of ajay sir. he knew my passion about journalism while i worked in advertising solutions sales. he groomed me into doing both. he used to tell me to do journalism as passion but earn money and incentives through advertising. Your words of wisdom echoing in my mind ajay sir. Why did you leave me like this ?

Amit Kakkar

Dubai

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