नवेद शिकोह-
प्रधानमंत्री के “राष्ट्र के नाम संदेश” की परंपरा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि इस तरह के संबोधन पूरी तरह गैर-राजनीतिक होते हैं और इनमें विपक्ष पर टिप्पणी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की कोई जगह नहीं होती।
दरअसल, “राष्ट्र के नाम संदेश” को एक औपचारिक और संवेदनशील संबोधन माना जाता है, जिसमें देशहित, नीतियों या महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर और संतुलित बात रखी जाती है। यह पद की गरिमा से जुड़ा होता है, इसलिए इसमें राजनीतिक भाषण या विरोधियों पर हमला शामिल नहीं होता।
हालांकि, किसी भी नेता को राजनीतिक बयान देने या विपक्ष की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब वही बात “राष्ट्र के नाम संदेश” के रूप में पेश की जाती है, तो उस पर सवाल उठने लगते हैं।
18 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक संबोधन कई टीवी चैनलों पर “राष्ट्र के नाम संदेश” के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन प्रसारित भाषण में राजनीतिक बातें और विपक्ष पर निशाना साधा गया, जिसके बाद इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया।
अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या ऐसे राजनीतिक भाषण को “राष्ट्र के नाम संदेश” कहा जाना चाहिए, या इस परंपरा और प्रोटोकॉल का पालन सख्ती से होना चाहिए।
सरकार और प्रधानमंत्री की लगातार तारीफ करती मीडिया पर अब उल्टा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि एकतरफा सकारात्मक कवरेज न सिर्फ पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, बल्कि भविष्य में खुद सरकार के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि इससे जमीनी हकीकत और सत्ता के बीच दूरी बढ़ने का खतरा रहता है।

राज्यसभा सांसद और आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज कुमार झा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया “राष्ट्र के नाम संबोधन” पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे “चुनावी भाषण” जैसा बताते हुए इसके खर्च को भाजपा के चुनावी खाते में जोड़ने की मांग की है।
सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया में मनोज झा ने कहा कि अगर सरकारी संसाधनों का उपयोग कर इस तरह के संबोधन दिए जाते हैं, तो उसकी लागत संबंधित राजनीतिक दल के चुनावी खर्च में शामिल की जानी चाहिए। उन्होंने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यदि आवश्यकता पड़ी, तो नागरिक भी इसके लिए योगदान देने को तैयार हैं।
‘राष्ट्र के नाम संदेश’ किसी चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता. -राजीव शुक्ला, सांसद


