
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में शुभांशु के अंतरिक्ष उड़ान की खबरों को तो प्रमुखता दी ही गई है बची-खुची जगह में भी ‘इमरजेंसी’ ही है। यहां तक कि प्रेस कांफ्रेंस में लगाये गये कांग्रेस अध्यक्ष के अघोषित इमरजेंसी के आरोप को भी पहले पन्ने पर बमुश्किल जगह मिली है। इंडियन एक्सप्रेस में अघोषित इमरजेंसी पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में खबर है, केंद्र आपातकाल पीड़ितों का सम्मान करेगा। अमर उजाला में दो पहले पन्ने हैं। पहले पर तो अंतरिक्ष मिशन ही है। दूसरे में इमरजेंसी पर प्रधानमंत्री का कहा टॉप पर है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का आरोप अपेक्षाकृत बहुत छोटा सा है। खरगे के आरोप को सबसे अधिक प्रमुखता देशबन्धु ने दी है। यहां प्रधानमंत्री के बयान को वैसे छापा गया है जैसे अमर उजाला ने खरगे को छापा है। द टेलीग्राफ और द हिन्दू में न प्रधानमंत्री पहले पन्ने पर हैं और न खरगे।
द हिन्दू में जीएसटी कौंसिल की एक खबर सेकेंड लीड है। इसके अनुसार ज्यादातर वस्तुओं को पांच प्रतिशत जीएसटी के वर्ग में रखा जायेगा और 12 प्रतिशत के वर्ग में वस्तुओं की संख्या कम की जायेगी। हालांकि, 18 प्रतिशत वाले कुछ आयटम 12 प्रतिशत के वर्ग में आ सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि जरूरी चीजों पर टैक्स नहीं या न्यूनतम होना चाहिये पर सरकार (जीएसटी कौंसिल) अभी तक जरूरी चीजों को ही ढंग से पारिभाषित नहीं कर पाई है। बहुमंजिली इमारतों के लिए लिफ्ट जरूरी उत्पादों में है लेकिन उसपर टैक्स 18 प्रतिशत है। यही नहीं, इसके रख-रखाव के लिए एएमसी पर भी जीएसटी की दर 18 प्रतिशत है। ऊपर की मंजिल के लिए यह इतना जरूरी है कि इसके बिना फ्लैट की कीमत शून्य हो जाये फिर भी लिफ्ट पर टैक्स 18 प्रतिशत है। दलील दी जा सकती है कि रोटी, कपड़ा और मकान जरूरी है, बहुमंजिली बिल्डिंग में फ्लैट नहीं। दूसरी ओर, बैंक के चार्ज और जुर्माने पर भी जीएसटी है।
दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री के आरोप को सबसे ऊपर तीन कॉलम में छापा है और खरगे का जवाब दो कॉलम में उसके नीचे। इस ‘मुख्य’ खबर के साथ है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी इमरजेंसी पर दोनों खबरें नहीं हैं। यहां अंतरिक्ष वाली खबर तो लीड है लेकिन सेकेंड लीड रिठाला की एक फैक्ट्री में आग लगने से चार लोगों के निधन की खबर है। यह खबर दूसरे अखबारों में भी है। आप जानते हैं कि गर्मी के दिनों में आग लगती रहती है और नुकसान व हादसा तब होता है जब कानून के अनुसार अग्निशमन के उपाय नहीं होते हैं। व्यावसायिक इमारतों को अग्निशमन के उपाय दुरुस्त होने का प्रमाणपत्र लेना होता है। जांच-कार्रवाई का मामला अक्सर इससे आगे नहीं बढ़ पाता है। निजी भवनों में खर्च का भी मामला होता है और जहां खर्च साझा करना हो वहां कई लोग इसे गैर जरूरी बता देते हैं और इस तरह अग्निशमन के उपाय नहीं होते हैं। जान-माल की हानि के बाद कुछ दिन मामला गर्म रहता है। फिर वैसा ही हो जाता है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रधानमंत्री के ‘हमले’ को पूरा महत्व दिया है और खरगे के आरोपों को इसके साथ अपेक्षाकृत बहुत कम जगह में छोटा सा छापा है। उसका भी शीर्षक है, नाकामियों को छिपाने के लिये भाजपा सरकार ड्रामा कर रही है। यह दिलचस्प है कि हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर कोई विज्ञापन नहीं है और खबरों के लिए पूरी जगह है। फिर भी खरगे के आरोप को प्रधानमंत्री के आरोपों के मुकाबले कम महत्व देना मायने रखता है। यही नहीं, आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर है, “महाराष्ट्र चुनाव नतीजों में गड़बड़ी का दावा हास्यास्पद, हताशा में किया गया : हाईकोर्ट।” मुझे नहीं पता अदालत में क्या दावा किया गया था और अदालत का यह फैसला किस संदर्भ में है। अखबारों की खबरों से मैं जानता हूं कि महाराष्ट्र में मामला नतीजों का नहीं है या हो भी तो उससे जुड़ा मुद्दा यह है कि मतदाताओं की संख्या में कम समय में भारी वृद्धि हुई है। इसी तरह एक गांव का मामला था जहां लोगों ने खुद से मतदान करवाकर नतीजों से तुलना करने की कोशिश की तो प्रशासन ने दोबारा चुनाव नहीं होने दिया और यह तब हुआ जब मुख्यमंत्री का चयन नहीं हुआ था और शपथ ग्रहण वगैरह तो बाकी ही था। इसलिए मामला धांधली का नहीं, विश्वसनीयता का है और यह सुनिश्चत किया जाना है कि मतदाताओं की संख्या में वृद्धि वाजिब और सही है कि नहीं।
यही नहीं चुनावों में गड़बड़ी का एक मामला पांच बजे के बाद पड़े वोटों का होता है तथा घोषित और वास्तविक संख्या का होता है। खबरों के अनुसार इनमें अंतर है, चुनाव आयोग का जवाब संतोषजनक नहीं है। इसलिए याचिका यह मांग करने के लिए होनी चाहिये थी कि चुनाव आयोग इन्हें स्पष्ट करे या उसे इसे स्पष्ट करने के लिए कहा जाये। यह दलील दिलचस्प है कि हारे हुए उम्मीदवार ने याचिका नहीं दायर की है – को भी मुद्दा बनाया जा रहा है। यहां उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि हारे हुए उम्मीदवार ईवीएम की जांच की मांग कर सकेंगे तो उसकी भारी फीस रखी गई और इस फीस को जमा करने के बाद भी अंततः जांच नहीं हुई या चुनाव आयोग ने जांच नहीं होने दी। अब कहा जा रहा है कि हारे हुए उम्मीदवार ने याचिका दायर नहीं की। वैसे भी चुनाव सिर्फ हारने और जीतने वालों के लिए नहीं होता है। चुनाव जनता के लिए जनता का प्रतिनिधि चुनने के लिए होता है और जनता को यह आश्वासन चाहिये होता है कि जो हो रहा है वह सही है।
यह आश्वासन व्यवस्था का काम है और जरूरी नहीं है कि इसकी मांग की ही जाये। अखबारों की खबरों से जनता अपनी राय बनाती है पर ऐसी खबरों से अगर सच छिपाने की कोशिश होगी तो देर होगी और सत्यमेव जयते में यकीन करने वाले इंतजार करेंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि जो हो रहा है वह ठीक है। हारने वाले उम्मीदवार के दावा करने के लिए उम्मीदवार के पास आधार और भरोसा होना चाहिये और नहीं होगा तो वह याचिका दायर करे या नहीं मामला अदालत में टिकना नहीं है। लेकिन मतदाताओं की संख्या बढ़ी और पांच बजे के बाद अगर असामान्य मतदान हुआ है तो याचिका हो या नहीं, चुनाव आयोग को स्पष्ट करना चाहिये पर चुनाव आयोग ने हाल में नियम बनाया है कि याचिका नहीं होगी तो 45 दिनों बाद वीडियो आदि नष्ट कर दिये जायेंगे। पर अखबारों में जो शिकायत छपी है उसके आधार पर चुनाव आयोग वीडियो नहीं रखेगा तो जांच किस बात से होगी? मुझे लगता है कि यह खबर अदालत की बात भले सही बताती हो, जनहित की बात नहीं कर रही है और वही प्रचारित कर रही है जो चुनाव आयोग चाहता है या दवा कर रहा है।
उदाहरण के लिए, अखबार ने अलग से छापा है, चुनाव आयोग ने भी आपत्ति जताई। इसमें कहा गया है, चुनाव आयोग ने दलील दी कि एक मतदाता मांग कर रहा है कि सभी 288 सीटों का चुनाव रद्द हो। यह कैसे संभव है जबकि याचिका में कोई विजयी उम्मीदवार पक्षकार नहीं है। आखिर इसी चुनाव में यह मुद्दा क्यों उठा जबकि हर चुनाव में शाम छह बजे के बाद मतदान होता रहा है। मुझे नहीं लगता कि इस सवाल का जवाब चुनाव आयोग को पता नहीं है। मूल बात यह है कि खबरों से लगता है कि मतदाताओं की संख्या चुनाव आयोग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हैं। अगर मतदाता फर्जी हैं और उनका मतदान तय समय के बाद हुआ है और उसकी संख्या सामान्य से ज्यादा है तो चुनाव आयोग का काम है कि वह परेशान होने की बजाय जांच कराने की तैयारी दिखाये और उसके लिए तैयार रहे। यही नहीं, ईवीएम का अनुभव यह है कि जो सत्ता में रहता है वही जीतता है क्योंकि वही छेड़-छाड़ कर सकता है और जांच रोक सकता है। महाराष्ट्र में पिछले चुनाव का जनादेश, उसके बाद सरकार बनाने की कोशिशें, फिर उद्धव ठाकरे की सरकार गिरना, सुप्रीम कोर्ट में समय से फैसला नहीं होना, बाद का फैसला, विधानसभा अध्यक्ष का कार्रवाई नहीं करना, दलों में तोड़फोड़ ऐसे तमाम मामले हैं जो साबित करते हैं कि किसी भी तरह भाजपा को सत्ता दिलाने के लिए काफी लोगों की मिलीभगत हो सकती है।
इसीलिए खरगे ने कहा है, चुनाव आयोग भाजपा की कठपुतली बना। देशबन्धु में तीन कॉलम में चार लाइन की खबर इस प्रकार है, …. चुनाव आयोग विपक्ष की बात नहीं सुनता है और चुनाव को लेकर उससे जो सवाल पूछे जाते हैं उनका जवाब नहीं दिया जाता है। चुनाव आयोग सिर्फ सरकार के इशारे पर उसकी कठपुतली बनकर काम कर रहा है। श्री खरगे ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में धांधली की बात आंकड़ों के साथ कह रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग मानने को तैयार नहीं है। कायदे से दोनों अखबारों में दोनों बातें होनी चाहिये। पहले ऐसा होता भी था। पर अब पत्रकारों से कहा जाता है कि आप खिलाफ खबर छापते हैं तो तारीफ भी लिखिये जकि तारीफ लिखना पत्रकार का काम नहीं है। इसका नतीजा है कि ज्यादातर अखबार सरकार का प्रचार कर रहे हैं और कुछ खुलकर खिलाफ हैं। वैसे भी, महाराष्ट्र चुनाव में बड़ी धांधली हुई है यह कई बातों से स्पष्ट है और मतदाताओं की संख्या बढ़ना इनमें से एक है। दूसरा चुनाव आयोग के साथ भाजपा का भी परेशान होना है। इस संदेह का पर्याप्त आधार है। इसे जांच से ही खत्म किया जा सकता है और जांच नहीं कराने से इसकी पुष्टि ही होती है। पर ऐसी खबरें नहीं है। और चुनाव आयोग का पक्ष हाइलाइट किया जा रहा है जबकि उससे उसकी निष्पक्षता साबित करने के लिए कहा जाना चाहिये।


