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सुख-दुख

देश में कॉफी हाउस की चेन खोलना चाहते थे दिवंगत ‘अजय उपाध्याय’

राजीव सिंह-

फेद दाढ़ी, छोटा कद, सवरे हुए बाल, दुनिया जहान को लेकर सतर्क, हंसता हुआ नूरानी चेहरा ये सब मिल कर एक कोलाज बनता है। इस कोलाज में जो शक्ल उभरती है उसका नाम अजय उपाध्याय है। कविता की भाषा में कहें- ‘जाना एक खौफनाक क्रिया है’ अजय का जाना हम सबको हिला गया। बनारस ने देश को बहुत सारे पत्रकार दिए है। जब भी बनारस के प्रबुद्ध पत्रकारों की फेहरिस्त बनेगी अजय उपाध्याय का नाम इसमें शामिल रहेगा।

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अजय पेशे से इंजीनियर थे। इंजीनियर की नौकरी रास नहीं आई। नौकरी छोड़ घर लौट आए। माता-पिता आहत थे। अजय को कोई फर्क नहीं पड़ा। उनकी रुचि पढ़ने -लिखने में थी। अजय ने अर्थपूर्ण तरीके से समय काटने के लिए बीएचयू की सेंट्रल लाइब्रेरी का रुख किया। आठवें दशक में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गायकवाड़ ग्रन्थालय (सेंट्रल लाइब्रेरी) में विद्यार्थियों की भीड़ भाड़ रहती थी। सेंट्रल लाइब्रेरी जाने पर एक शांत युवा पाठक प्रायः अंग्रेजी की पुस्तक में लीन दिखाई देता था। रविवार छोड़ सुबह दस से शाम पाँच अजय का वहीं बीतता था। लाइब्रेरी के स्टाफ़ आवाज पर अजय बाहर निकलते थे। शाम को उनकी साइकिल लंका की चाय की दुकान पर पहुँचती थी। एक प्याली चाय के साथ दोस्तों से गपशप फिर घर की ओर। पाँच साल तक सेंट्रल लाइब्रेरी में किए गए गहन अध्ययन ने उनको बहुत कुछ दिया। जिसके बल पर अजय ने बनारस से दिल्ली तक अपना परचम फहराया।

ऐसा कोई विषय नहीं था जिस पर अजय उपाध्याय मौन रह जाए। आज गुमनामी में खो चुका ज्ञान मंडल प्रकाशन का इतिहास गौरवशाली रहा है। ‘आज’ के ज्ञान मंडल प्रकाशन में रखी पुरानी दुर्लभ पुस्तकें उनको सुलभ थी। उन पुस्तकों का भी उन्होंने लाभ उठाया। काशी के इतिहास की उनको गहरी जानकारी थी।

वीएस नायपॉल को 2001 में नोबेल प्राइज मिला। अजय उपाध्याय An area of darkness (1964), In a free state (1971) ये दोनो किताबें बीएचयू की लाइब्रेरी में वे पढ़ चुके थे। फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल के आलोचनात्मक सिद्धांत का अध्ययन भी यहीं किया। इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र और महात्मा गांधी का गहरा अध्ययन किया था। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्य दंडी, भामह और मम्मट को भी पढ़ा था। भारतीय इतिहास के साथ-साथ विश्व इतिहास पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। ईश्वर ने उनको फोटोजेनिक मेमोरी दी थी। कभी कभी किसी विषय पर बात करते हुए पुस्तक के संदर्भ के साथ उसका चैप्टर तक बता देते थे। रॉबर्ट फ़्रॉस्ट हो या मोशे डायन, रोमिला थापर या इरफ़ान हबीब या बिपिन चंद्रा। किसी का नाम लीजिए अजय उसकी पुस्तक का नाम लेते हुए अपनी बात कहते थे।

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दैनिक ‘आज’ में आने के बाद बनारस में रहते हुए अजय उपाध्याय की साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच गुजरती थी। बच्चन सिंह, दीपक मलिक, मनु शर्मा के यहाँ अजय प्रायः जाते थे। इन लोगों से साहित्य, राजनीति, मार्क्सवाद, समाजवाद, भारतीय और पाश्चात्य दर्शन पर चर्चा करते थे। बच्चन सिंह के घर (मेरा घर भी) नामवर सिंह आए थे। अजय भी आ गए। साहित्य पर बात चली। चर्चा उत्तर आधुनिकतावाद पर केंद्रित हो गई। नामवर जी ने कहा उत्तर आधुनिकता अब पुराना पड़ गया है। उसपर बात करना फ़िज़ूल है। अजय उपाध्याय ने नामवर जी से कहा, मेरी समझ से इसे फ़िजूल कहना न्याय संगत नहीं होगा। अभी भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उत्तर आधुनिकता पर काम हो रहा है। नामवर जी हतप्रभ थे। उन्होंने स्वीकार किया कि यह जानकारी उनके लिए नई है।

आज अखबार से मन उचटा। एकाएक आज छोड़ दिया। अजय ने रेलगाड़ी पकड़ी और दिल्ली आ गए। बेरोजगारी के दिन शुरु हो गए। दिल्ली की निर्ममता से पाला पड़ा। इंजीनियर की नौकरी छोड़ना हो या बनारस। ये सब उनका अपना निर्णय था। कम लोगों को पता होगा कि अजय उपाध्याय ने दिल्ली आकर बिजनेस करने की योजना बनाई। वे देश में कॉफी हाउस की चेन खोलना चाहते थे। जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। कोई मददगार भी नहीं। किसी न किसी से मिलने के लिए अक्सर उन्हें मीलों पैदल चलना पड़ता था। कई रात चना खा कर काम चलाना पड़ा। हिम्मत नहीं हारे। किसी के सामने लाचारी ज़ाहिर नही की। तमाम परेशानियों के बाद भी जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं की। हर आदमी को अपनी लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती है। अजय भी लड़ रहे थे। बेरोजगारी के दिनो में बनारस के मित्र आल इंडिया यूथ कांग्रेस के महामंत्री अनिल श्रीवास्तव के साथ विट्ठल भाई हाउस के फ़्लैट नम्बर 307 में रहते थे। बाद में अनिल जी के साथ बंगाली मार्केट के फ्लैट में चले गए। बिजनेस की बात न बनते देख उन्होंने फिर से नौकरी की तलाश शुरू की। वे बात चीत में कहते थे कि- वह सुबह कभी तो आएगी। समय ने करवट ली वे दिल्ली में दैनिक जागरण में आ गए। जागरण से आजतक और फिर हिंदुस्तान फिर अमर उजाला। दिल्ली के नेशनल हेराल्ड में भी कुछ दिन रहे।

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अजय जी दिल्ली के हिंदी पत्र में काम करते थे। उनकी हिंदी अंग्रेजी दोनो भाषाओं पर मजबूत पकड़ थी। अंग्रेजी अखबारों के पत्रकारों में भी वे लोकप्रिय थे। बीस बरसो के बीच संपन्न हुए लोकसभा चुनाव अंग्रेजी अखबारों के पत्रकार उनके हवाले से चुनाव कवर करने बनारस आते रहे। उनकी मैं यथा संभव मदद करता था। एक बार 1995-1996 के दौरान अजय जी ने फोन किया बताया कि वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार स्टीव कोल मेरे मित्र है, बनारस जा रहे हैं। उनकी मदद करनी है। दो दिनो बाद स्टीव कोल के चार- पाँच लोगों की टीम के साथ बनारस आ गए। लगभग दस दिन तक बनारस रहे। बनारस के तमाम प्रबुद्ध लोगों से मिले। ज्ञानवापी मस्जिद के पीछे शृगार गौरी को लेकर उठे हिंदू-मुस्लिम विवाद पर सबसे बातचीत की। उन दिनो वॉशिंगटन पोस्ट में बनारस की खबर रोज छपती थी। स्टीव कोल मस्त और दोस्ताना मिजाज के थे। सरल और जमीन से जुड़े हुए आदमी। अजय जी ने बताया कि दिल्ली लौटने के बाद स्टीव कोल ने बनारस यात्रा पर प्रसन्नता व्यक्त की।

अपनी जीवन यात्रा में अजय जी ने तमाम अख़बारों में काम किया। हिंदुस्तान का प्रधान संपादक पड़ छोड़ने के बाद उन्होंने दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्ता को पत्रकारिता संस्थान खोलने के लिए राज़ी किया। नोएडा में 2004 में Jagaran Institute of Journalism and Mass Communication खुला। पत्रकारिता पढ़ने वालों की लाइन लग गई। अजय जी ने जीवन में कहीं भी लम्बी नौकरी नहीं की। वे तीन साल बाद 2007 में विद्यार्थियों से भरा-पूरा संस्थान छोड़ कर चले गए। पुस्तकों के बीच जीवन गुजारने वाले अजय जी ने अपने पत्रकारिता संस्थान की लाइब्रेरी में हिंदी-अंग्रेजी की महत्वपूर्ण पुस्तकों का संग्रह किया था। देश विदेश की करीब 40 पत्र-पत्रिकाएं आती थी। कुछ महीनो तक New York times और Washington Post भी आता रहा। नोएडा JIMMC की छोटी सी लाइब्रेरी में चार हजार किताबें थी। किसी भी दूसरे पत्रकारिता संस्थान से अधिक संपन्न थी। JNU से पढ़े पीसी सिंह बाद के दिनो में यहाँ पढ़ाते थे। लाइब्रेरी की पुस्तकों पर वे अभिभूत थे। उनका मानना था कि जिन किताबों का संग्रह JIMMC में है वे JNU की लाइब्रेरी में मिलती हैं। इस लाइब्रेरी का सचेत छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों ने सदुपयोग किया। कुप्रबंधन के चलते बीस साल बाद JIMMC बंद हो गया। JIMMC बंद होने का अजय जी को बहुत अफसोस था।

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पुस्तकें खरीदना और उनको पढ़ना उन्हें बहुत प्रिय था। हर महीने अंग्रेजी की सद्यः प्रकाशित नई पुस्तकें खरीदते थे। उनकी निजी लाइब्रेरी इसकी गवाह हैं। आँखों के जवाब देने के बाद पुस्तक पढ़ना बंद हो गया। फिर उन्होंने ऑडीओ-विडीओ पर उपलब्ध भाषण डिबेट सुनने का रास्ता निकाल लिया। जिसे अंत तक सुनते रहे।

पिछले आठ बरस से वे अपने मित्र रामगोपाल मोहले के महमूरगंज स्थित होटल पूजा रेज़िडेन्सी में रुकते थे। इस बार भी वहीं रुके थे। उनको दिल्ली चार जुलाई को वापस आना था। घरेलू कारणों से वापसी दो दिनों के लिए टल गई। पाँच तारीख को महाप्रस्थान पर निकल गए। एक बार चंद्रकुमार मीडिया फाउंडेशन के कार्यक्रम में अजय जी बनारस आए थे। तब वे हिंदुस्तान के प्रधान संपादक थे। उस दिन पत्रकारों से पराड़कर भवन का हाल भर गया था। उसी बनारस में उनके अंतिम संस्कार में वे पत्रकार भी नहीं पहुँचे जिनको अजय जी ने कभी नौकरी दी थी।

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केदारनाथ सिंह की कविता है-
जाऊँगा कहां, रहूँगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह
पड़ा रहूँगा

अजय हमारे बीच नहीं रहते हुए भी मौजूद रहेंगे । बीएचयू की लाइब्रेरी की किसी पुरानी किताब में, दिल्ली के किसी काफ़ी शाप की कुर्सी पर, निराला निवेश कालोनी के बरामदे में दीपक मलिक और सुरेंद्र प्रताप से गप करते हुए।

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लेखक वाराणसी के रहने वाले हैं। उनसे संपर्क rajeev.jimmc@gmail.com पर किया जा सकता है।

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1 Comment

1 Comment

  1. Rajeev Singh

    July 10, 2024 at 12:37 pm

    अजय जी पर लिखे संस्मरण में fount बदलने पर काफी कुछ बदल गया है। एक बात स्पष्ट कर दू कि अजय जी घरेलू कारणों से बनारस दो दिनों के लिए रुक गए ‘आरोपों’ के कारण नहीं।
    कृपया इस त्रुटि को सुधार कर पढ़ें।

    राजीव सिंह

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