कृष्ण कल्पित-
अजित राय से बहुत पुरानी दोस्ती थी! तब वे दिल्ली सरकार के शिक्षा-विभाग में शिक्षक थे और साथ ही जनसत्ता, हंस, नवभारत टाइम्स में सांस्कृतिक समीक्षाएं लिखा करते थे। सिनेमा, नाटक, साहित्य और कलाकार, साहित्यकार उनकी दिलचस्पी का केंद्र थे।
देखते ही देखते वे दिल्ली की सांस्कृतिक और साहित्यिक दुनिया के महत्वपूर्ण नागरिक बन गए।
इस शताब्दी के शुरुआत में ही अजित राय एक बार कान्स फ़िल्म फेस्टिवल में एक पत्रकार की हैसियत से पहुंच गए। उनका दायरा विस्तृत होता गया। अब वे विश्व सिनेमा के एक गंभीर अध्येता थे। पिछले बीस वर्षों में दुनिया का कोई फ़िल्म फेस्टिवल ऐसा नहीं होगा जहां अजित राय न गए हों।
जब दूरदर्शन के महानिदेशक त्रिपुरारि शरण बने तो उन्होंने अजित राय को दूरदर्शन की एक साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका दृश्यांतर निकालने के लिए आमंत्रित किया। अजित राय ने दो वर्ष तक इस महत्वपूर्ण पत्रिका दृश्यांतर का संपादन किया, जिसके कई अंक सचमुच यादगार हैं।
विदेशों की आवाजाही में कालांतर में अजित राय की दोस्ती लंदन में बसे भारतीय उद्योगपति हिंदुजा ब्रदर्स से हुई। अजित राय ने हिंदुजा ब्रदर्स की भारतीय सिनेमा की ख़िदमात को लेकर अंग्रेज़ी और हिंदी में किताबें प्रकाशित की।
इन दिनों अजित राय मुंबई में बस गए थे। उनसे संवाद चलता रहता था। कोई एक वर्ष पहले मेरी एक पोस्ट पढ़कर अजित का पेरिस से संदेश आया कि कोई तो ज़िंदा ज़ालिम है जो हिन्दी के गैंगस्टरों के ख़िलाफ़ बोलता है। आपको पढ़ कर दिल बाग़ बाग़ हो जाता है। जब मैंने उन्हें देश आने को कहा तो उन्होंने जवाब दिया कि अभी मैं भिक्षाटन से दुनिया घूम रहा हूं।
दिल्ली में जब तक अजित राय थे तो वे अपना जन्मदिन सोवियत सांस्कृतिक केंद्र में धूमधाम से मनाते थे। इस मामले में वे राजेंद्र यादव का अनुकरण करते थे। इस पोस्ट में मेरी जो केदारनाथ सिंह के साथ तस्वीर है वह अजित राय के एक पुराने जन्मदिन की है जिसे अजित ने मुझे भेजा था।

दूसरी तस्वीर (ऊपर) दस वर्ष पुरानी है जब पटना में जागरण ने सिनेमा पर एक संवाद रखा था, जिसमें अजित राय, विनोद अनुपम, आलोकधन्वा इत्यादि मित्रगण हैं।
यह उम्र जाने की नहीं थी। अजित राय मुझसे छोटे थे लेकिन बुजुर्गों की तरह हिदायत देते थे। अजित राय की स्मृति को नमन।


