अमित गांधी-
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम आते ही खुशियों के बीच एक अजीबोगरीब ‘झोल’ सामने आया है। मामला 301वीं रैंक का है, जिस पर दो राज्यों की दो युवतियां दावा ठोक रही हैं। एक तरफ बिहार के आरा से रणवीर सेना के संस्थापक रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती आकांक्षा सिंह (पुत्री- इंदुभूषण सिंह) की सफलता के चर्चे हैं, तो दूसरी तरफ यूपी के गाजीपुर की आकांक्षा सिंह ने भी इसे अपनी उपलब्धि बताया है। सोशल मीडिया पर दिख रहे एडमिट कार्ड ने इस मामले को और पेचीदा बना दिया है, जिससे अब आयोग की स्पष्टीकरण पर सबकी नजरें टिकी हैं।
हालांकि, पूरे विवाद बिहार के आरा की रहने वाली ब्रह्मेश्वर सिंह की पोती आकांक्षा सिंह से नवभारत टाइम्स ऑनलाइन संवाददाता ने उनके घर जाकर बात की तो उन्होंने अपनी दावेदारी को बरकरार रखा। उन्होंने कहा कि सारा डिटेल मेरा है। इसके साथ उन्होंने अपने एडमिट कार्ड की दो-दो कॉपी दिखाया। जिसमें उन्होंने अपनी सेलेक्शन को सही ठहराया। इनके एडमिट कार्ड पर रोल नंबर 0856794 दर्ज है। साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले को अब यूपीएससी ही क्लियर कर सकता है।

विवेक त्रिपाठी-
“वो मेरी स्टोरी नहीं है.. वो किसी और की है तो उस पर क्लेरिफिकेशन उधर से आएगा.. मुझे बस ये पता है, ये रैंक मेरी है और ये रोल नंबर मेरा है..” यूपीएससी रिजल्ट की 301वीं रैंक की असली हकदार गाजीपुर की आकांक्षा सिंह को सुनिए..
पेशे से गाइनकोलॉजिस्ट हैं.. पटना एम्स से एमबीबीएस और एमएस कर रखा है.. आकांक्षा कह रही हैं, अगर किसी को कोई डाउट है तो एडमिट कार्ड में बारकोड है.. वो पब्लिक डोमेन में है.. सब लोग चेक कर सकते हैं.. कोई कॉन्ट्रोवर्सी नहीं है..
देश में यूपीएससी रिजल्ट को लेकर सबसे बड़ी कंट्रोवर्सी पर आकांक्षा ने बड़े धैर्य, संयम से शालीनता से जवाब दिया..
अजय प्रकाश-
पहले गलगोटिया फिर ब्रह्मेश्वर मुखिया!
पहले हम गली-मोहल्ले में फेंकते थे, रिश्तदारी-नातेदारी में फेंकते थे, अड़ोस-पड़ोस में भी डींग हांकने का धंधा चलता था। आगे चलकर देश का विकास हुआ तो दफ्तरों, बैठकों और शहरों में पहुंचकर फेंकने का रोजगार फलने—फूलने लगा। गांव से उजड़कर दिल्ली में पहुंचा मजदूर मैनेजर होने लगा। फेंकने के धंधे में देश में सच्चा लोकतंत्र आ गया। बाघ-बकरी एक ही स्वर में फेंकने लगे। चुनाव में हारा व्यक्ति विधायक जी के नाम से सुशोभित होने लगा और सरपंच न चुने जाने पर अपनी जाति का आदमी प्रधान कहा जाने लगा। 12 घंटा खटकर लोग-बाग मुर्गे के दरबे जैसे कमरों में सोते, सुबह शौचालय की लंबी लाइनों लगाते, लेकिन झगड़े में बताते कि हमारे यहां तो 52 बीघा पुदीना बोते हैं, हमारे यहां ये है वो है…इतना खेत है और इतनी बारी है।
हर संस्कृति आगे बढ़ती है। वैसे में समय के साथ फेंकने की प्रवृत्ति में भी इजाफा हुआ, उसके बाजार का भी विस्तार हुआ। 21वीं सदी के पहले दशक बीतने के साथ हमें लगने लगा कि अब गांव-मोहल्ले-शहर-बाजार में फेंकने को राष्ट्रीय बनाना चाहिए और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर राष्ट्र का नाम रौशन करना चाहिए। फिर हमने फेंकने वालों को नेता बनाया, अभिनेता बनाया, नीति-नियंता बनाया।
समय के साथ फेंकने की संस्कृति को मान्यता मिलती चली गयी, समाज में यह आदर्श स्थापित होता गया। सच बोलने वाले दफ्तर में हों या दहेज के मंडप में उनको हाशिया नसीब होने लगा और फेंकू होना ‘पूज्य’ माना जाने लगा, उसे सकारात्मक सोच की संज्ञा दी जाने लगी। उन्हें ही राष्ट्र में विकास पुरुष जैसे सम्मान मिला और बाकी नेता भी फेंकू बनने की कलात्मकता में अपने को निपुण करने में जुट गए।
उसके चंद वर्षों बाद ही वह समय आ गया जब मानव सभ्यता तकनीकी के एक नए पायदान पर पहुंच गयी। एआई की खोज हुई। उसका पहला बाजार उड़नखटोला की खोज करने वाले देश आर्यावर्त में लगा। हमारे देशवासी बहुत खुश हुए कि हमने उन देशों को पछाड़ दिया जिन्होंने केवल खोज की। वे देश को बाजार बना देने की तरकीब नहीं सीख पाए।
AI के बाजार में दुनिया भरके लोग आए। हम भी गए। सबने सब दिखाया तो हमने कुत्ता दिखाया। कहा हमारी खोज है। हमने सेलिब्रेट किया। उत्सव मनाए। हमने पूरी दुनिया में प्रचार का लोहा मनवाया कि सिर्फ डेढ़ दशक में देश कहां से कहां पहुंच गया। हमने एआई को उन्नत करने में, उसकी गहनता और सटीकता को और असरकारी बनाने में कई सौ करोड़ खर्च करने के दावे किए। हमारे देश के प्रधानों ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।
पर चंद मिनट में ही दावा फेंकू निकला और अत्याधुनिक तकनीकी में भी हमने अपने फेंकने की क्षमता का फिर एक बार लोहा मनवाया। पूरे देश में इस बात की चर्चा भी हुई। लोगों ने इस बात को सराहा कि क्या कमाल तरीके से उस महिला ने दूसरे के रोबो डॉग को अपना बताया, जो कोई आसान काम नहीं था।
इस घटना को बीते अभी चंद दिन ही हुए थे कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती की सफलता की कहानी की चर्चा होने लगी। उसे कलक्टर साहिबा कहा जाने लगा। पोती ने उत्साह में पद पाने के बाद की योजनाओं की भी कहानी सुना दी। अपने दादा के बलिदानी होने के पुराने दिनों में खोने लगी। देखते ही देखते पोती ने दादा मुखिया को हत्यारा बोलने वालों को भी आड़े हाथों ले लिया। जातिवाद की बहस छिड़ गयी। जातिवादियों की चौपाल लग गयी। बाद में पता चला कि उसने तो कलक्टर बनने का साक्षात्कार ही नहीं दिया।
इस तरह हम लगातार फेंकने के क्षेत्र में दुनिया को मात दे रहे हैं, अपने डीएनए में शामिल कर लिया है।

UPSC ने कन्फर्म किया – UP वाली आकांक्षा सिंह की ही 301वीं रैंक है !!
नकली आकांक्षा सिंह (ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती) के दावे में मुख्य तकनीकी कमियां और विसंगतियां ये थीं, जो उनके क्लेम को पूरी तरह फर्जी साबित करती हैं:
◦ असली 301 रैंक वाली आकांक्षा सिंह (उत्तर प्रदेश, गाजीपुर वाली, AIIMS पटना से MBBS डॉक्टर) का रोल नंबर 0856794 है, जो UPSC की ऑफिशियल मेरिट लिस्ट में दर्ज है।
◦ मुखिया जी वाली आकांक्षा के वायरल एडमिट कार्ड पर QR कोड स्कैन करने पर रोल नंबर 0856569 निकला, जो 301 रैंक से जुड़ा नहीं है। उन्होंने खुद बातचीत में माना कि उनका रोल नंबर 0856569 ही है, लेकिन दावा 301 का कर रही थीं।
◦ सोशल मीडिया पर उनके शेयर किए एडमिट कार्ड में रोल नंबर को एडिट करके 0856794 जैसा दिखाने की कोशिश की गई लगती है, लेकिन QR कोड स्कैन से असली रोल नंबर सामने आया। यह क्लासिक फेक डॉक्यूमेंट का केस है।
◦ दोनों आकांक्षा सिंह के पिता का नाम अलग-अलग है (एक के पिता रंजीत सिंह, दूसरा के इंदुभूषण सिंह)। नाम common होने के बावजूद बाकी पहचान (पिता का नाम, राज्य, बैकग्राउंड) पूरी तरह अलग थी, लेकिन फिर भी क्लेम एक ही रैंक का किया गया ।
◦ असली कैंडिडेट ने अपना एडमिट कार्ड, ई-सम्मन लेटर, बारकोड और इंटरव्यू डिटेल्स शेयर करके साबित किया।
◦ लेकिन मीडिया में पहले ही नायिका बन चुकी आकांक्षा ने कोई ऐसा मैचिंग प्रूफ नहीं दिया, बल्कि बाद में UPSC की “गड़बड़ी” का बहाना बनाया।
नाम common होने का फायदा उठाकर फेक एडमिट कार्ड शेयर करना, रोल नंबर एडिट करना और मीडिया इंटरव्यू देकर पब्लिसिटी लेना – ये सब तकनीकी और नैतिक दोनों स्तर पर गलत था।
आख़िरकार UPSC ने अब कन्फर्म कर दिया कि UP वाली आकांक्षा सिंह ही असली 301 रैंक वाली हैं।
-शीतल पी सिंह


