शुभ नारायण पाठक-
हाल ही में शायद एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि भारत के लोग फर्जी खबरों पर विश्वास करने में अग्रणी हैं। यह रिपोर्ट एक आईना हो सकती है। भारत के लोग मीडिया पर कीचड़ उछालने में भी आजकल एक नंबर पर चल रहे हैं। चाहे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, किसी भी खेमे से मीडिया को जलील करने की कोई कोशिश छोड़ी नहीं जाती है।
इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ यह प्रवृत्ति बीते करीब एक दशक में बहुत अधिक तेज हुई है। मोबाइल ने आम आदमी की सूचनाओं तक पहुंच को आसान किया है, तो दूसरी तरफ सूचनाओं के नाम पर भ्रमजाल फैलाने वाले एक बड़े समांतर कारोबार को स्थापित कर दिया है। इसमें असल मुद्दे या तो गायब हैं या प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। लोग पत्रकार और सूचनाओं के नाम पर ठगी करने वाले फर्जी लोगों के बीच फर्क करना नहीं समझ पा रहे हैं। असल मुद्दे की बात करने वाले पत्रकार हाशिए पर हैं। यह समस्या का बड़ा फलक है। इसे मैं एक छोटे से उदाहरण से स्पष्ट करता हूं…
बिहार का उत्तर प्रदेश की सीमा से लगता एक छोटा सा जिला है बक्सर। बक्सर और रोहतास जिले की सीमा से लगता एक गांव है अहियापुर। इस गांव में बीते शनिवार की सुबह दो पक्षों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। एक पक्ष पूरी तैयारी करके आया था, जिसने दूसरे पक्ष को निशाना बनाकर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। कुल पांच लोगों को गोली मारी गई। सभी एक ही पक्ष के थे। इनमें से दो की घटना स्थल पर ही मौत हो गई, जबकि एक की मौत अस्पताल में हुई। दोपहर बाद चर्चा तेज हुई कि इस घटनाक्रम में चौथे व्यक्ति की भी मौत हो गई है। संस्थागत पत्रकारिता से जुड़े संस्थानों और उनसे जुड़े व्यक्तियों ने इस चर्चा की पड़ताल शुरू की, तो सच्चाई शुरुआत में स्पष्ट नहीं हो सकी।
पत्रकारिता का सिद्धांत है कि जब तक कोई सूचना स्पष्ट नहीं हो जाए, तब तक उसे आगे नहीं बढ़ना चाहिए। इसलिए जिम्मेदार पत्रकार इस घटनाक्रम में तीन व्यक्तियों की मौत की सूचना ही प्रसारित करते रहे। लेकिन समांतर मीडिया होने का दावा करने वाले कुछ इनफ्लुएंसर और कुछ लोकल न्यूज़ पोर्टल ने चार व्यक्तियों की मौत की खबरें तुरंत प्रकाशित और प्रसारित करनी शुरू कर दीं। ऐसी स्थिति में दूसरे संस्थान पर भी तत्काल अपडेट के लिए दबाव पड़ता है। जिम्मेदार पत्रकारों ने इस दबाव को झेला और बिना किसी पुष्टि के चौथी मौत की सूचना चलाने से बचते रहे। शाम तक यह पक्का हो गया कि तीन ही लोग मरे हैं। दो अन्य का इलाज हो रहा है। जिम्मेदार पत्रकारों ने यही बात आखिर तक प्रकाशित और प्रसारित की।
लेकिन इससे फायदा क्या हुआ? फर्जी खबरों के नशे का आदि हो चुके बहुसंख्यक लोगों ने पत्रकारों की सूचना को ही अपडेट करना चाहा। कई लोगों ने मुझे भी कहा कि आपको सही जानकारी नहीं है, वहां तीन नहीं, चार लोगों की मौत हो चुकी है। कई विशेषज्ञ तो इससे भी ऊपर गए और आला दर्जे की टिप्पणियां कीं। अगले दिन अखबार छप कर आए, तो लोगों ने कहा कि अखबार वालों को शायद पूरी जानकारी नहीं मिल पाई। मोबाइल पर ही सही खबर मिल पाई थी! ऐसे अतिरेकवादी समाज में जिम्मेदारी के साथ पत्रकारिता करना दोहरी चुनौती है।
मौजूदा दौर में बिना मोबाइल और बिना इंटरनेट के जीवन आसान नहीं है। मोबाइल और इंटरनेट हमारी जरूरत में शामिल हो चुके हैं। हमें सूचनाओं की भी जरूरत है। सूचनाओं के लिए हम मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल छोड़ नहीं सकते हैं, लेकिन हमें पक्की सूचना के लिए एक बार अखबार जरूर पढ़ना चाहिए। पुष्ट और संतुलित सूचना के लिए अगले दिन का अखबार आने का इंतजार जरूर करना चाहिए। अन्यथा छोटी-छोटी गलतफहमियां समाज में बड़ी दरारें पैदा करती रहेंगी।
दूरदर्शन और रेडियो के दौर में जब लोग क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल देखा और सुना करते थे, तब भी खबर के अंदर की खबर और मैच को समग्रता में समझने के लिए अगले दिन का अखबार जरूर पढ़ा करते थे। यही बात हर तरह के समाचार में लागू है। अखबार आपको सम्यक और समग्र दृष्टि देने में सक्षम हैं। इसलिए कम से कम एक अखबार रोज जरूर पढ़ें।
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