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डिजिटल शोर में अख़बारों की निर्णायक वापसी

अमरेंद्र किशोर-

डिजिटल और टीवी की चमकदार, तात्कालिक और अक्सर शोर भरी दुनिया के बीच यह मान लेना कि अख़बार अप्रासंगिक हो चुके हैं, एक सुविधाजनक लेकिन भ्रामक निष्कर्ष है। तथ्य इससे उलट तस्वीर पेश करते हैं। सूचना की विश्वसनीयता, संरचना और जवाबदेही की कसौटी पर आज भी प्रिंट मीडिया (मुद्रित माध्यम) सबसे आगे खड़ा है। यही कारण है कि बाज़ार, पाठक और सरकार—तीनों की प्राथमिकताओं में अख़बार अब भी निर्णायक स्थान रखते हैं।

Reuters Institute for the Study of Journalism की ‘Digital News Report’ (डिजिटल समाचार रिपोर्ट) लगातार यह रेखांकित करती रही है कि पारंपरिक ब्रांडों (स्थापित समाचार संस्थानों) पर भरोसा डिजिटल प्लेटफॉर्म (ऑनलाइन मंचों) की तुलना में अधिक स्थिर है। रिपोर्ट का एक केंद्रीय निष्कर्ष है: “Established news brands retain higher trust than most online-only sources” (स्थापित समाचार संस्थान अधिकांश केवल ऑनलाइन स्रोतों की तुलना में अधिक भरोसा बनाए रखते हैं)। यह भरोसा यूँ ही अर्जित नहीं हुआ; इसके पीछे दशकों की संपादकीय अनुशासन, तथ्य-जांच (फैक्ट-चेक) और कानूनी जवाबदेही की प्रक्रिया है। डिजिटल माध्यम में सूचना की गति अधिक है, लेकिन सत्यापन (वेरिफिकेशन) की प्रक्रिया अक्सर कमजोर पड़ जाती है। अख़बार खबर को छापने से पहले परखते हैं, संदर्भ देते हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हैं।

भारत के परिप्रेक्ष्य में Press Trust of India से जुड़े वरिष्ठ संपादकों का एक स्थापित मत रहा है कि “Print is still the reference point for credible news in India” (भारत में विश्वसनीय समाचार का संदर्भ बिंदु अब भी प्रिंट है)। यह कथन केवल पेशेगत आग्रह नहीं, बल्कि व्यवहारिक वास्तविकता है। अदालतों में, सरकारी फाइलों में और नीतिगत बहसों में अख़बार की कतरन आज भी प्रमाण (एविडेंस) के रूप में संलग्न की जाती है। डिजिटल लिंक बदल सकते हैं या हटाए जा सकते हैं; मुद्रित पन्ना स्थायी दस्तावेज़ (परमानेंट रिकॉर्ड) बन जाता है।

बाज़ार की दृष्टि से भी तस्वीर स्पष्ट है। World Association of News Publishers ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, “Print remains a powerful advertising platform in emerging markets” (उभरते बाज़ारों में प्रिंट अब भी एक प्रभावशाली विज्ञापन मंच है)। भारत जैसे देश में, जहाँ क्षेत्रीय भाषाई अख़बारों का व्यापक नेटवर्क है, विज्ञापनदाता जानते हैं कि प्रिंट का पाठक ‘पेइंग रीडर’ (भुगतान करने वाला पाठक) है—वह खबर को गंभीरता से पढ़ता है। डिजिटल विज्ञापन की क्लिक-आधारित अर्थव्यवस्था (क्लिक आधारित आय प्रणाली) की तुलना में अख़बार का विज्ञापन ब्रांड विश्वसनीयता से जुड़ता है।

Audit Bureau of Circulations के आँकड़े वर्षों से संकेत देते रहे हैं कि क्षेत्रीय अख़बारों का प्रसार स्थिर बना हुआ है और कई भाषाई संस्करणों ने डिजिटल विस्तार के समानांतर अपनी पकड़ बनाए रखी है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रिंट और डिजिटल का संबंध प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहअस्तित्व (को-एक्ज़िस्टेंस) का है। कई बड़े मीडिया समूहों ने हाइब्रिड मॉडल (संयुक्त कार्यप्रणाली) अपनाया है, जहाँ अख़बार विश्वसनीयता का आधार तैयार करता है और डिजिटल उसका विस्तार करता है।

सरकार की नीतियाँ भी इस वास्तविकता को स्वीकार करती हैं। Ministry of Information and Broadcasting की विज्ञापन नीति में प्रिंट को अब भी केंद्रीय स्थान दिया जाता है। सरकारी निविदाएँ, भर्ती विज्ञापन और विधिक घोषणाएँ अख़बारों में प्रकाशित करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि उन्हें दस्तावेजी साक्ष्य (लीगल रिकॉर्ड) का दर्जा प्राप्त है। Indian Readership Survey के एक विश्लेषण में कहा गया है, “Print continues to command deep engagement, especially in Tier-II and Tier-III cities” (द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में प्रिंट अब भी गहरी पाठकीय सहभागिता बनाए हुए है)। यही गहरी सहभागिता अख़बार की असली ताकत है।

अख़बार केवल सूचना उद्योग नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक तंत्र भी हैं। रिपोर्टिंग से लेकर प्रिंटिंग और वितरण तक लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। यह तंत्र केवल खबर नहीं बनाता, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श (डेमोक्रेटिक डिस्कोर्स) की संरचना गढ़ता है। डिजिटल युग में जहाँ एल्गोरिद्म (संगणकीय सूत्र) एजेंडा तय करते हैं, अख़बार अब भी संपादकीय विवेक के आधार पर प्राथमिकताएँ निर्धारित करते हैं।

स्पष्ट है कि सूचना के इस अराजक दौर में अख़बार स्थिरता का स्तंभ हैं। वे शोर से अलग तथ्य की पहचान कराते हैं, तात्कालिकता से ऊपर उठकर संदर्भ प्रदान करते हैं और बाज़ार को भरोसे की ठोस ज़मीन देते हैं। डिजिटल विस्फोट के बावजूद अख़बार हाशिये पर नहीं गए हैं। वे आज भी लोकतंत्र, बाज़ार और समाज—तीनों की संरचना में केंद्रीय और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

डिजिटल और टीवी चैनलों के तेज दौर में भी अखबारों की अहमियत कम नहीं हुई है। वे आज भी असंख्य परिवारों की रोजी-रोटी और समाज की विश्वसनीय जानकारी का मजबूत आधार हैं।

-श्वेता सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

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