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सुख-दुख

नोएडा में अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार आलोक वर्मा जी की प्रार्थना सभा!

देव प्रकाश चौधरी-

जब भाषा के सारे पंचांग अचानक लड़खड़ा जाएं! अपार्टमेंट के बाहर खुले इलाके में थी प्रार्थना सभा। हमारे संस्थान के सीनियर जर्नलिस्ट आलोक वर्मा जी की प्रार्थना सभा।

यह ग्रेटर नोएडा (वेस्ट) का वही अपार्टमेंट था, जिसमें जीने के पूरे समारोह के साथ बरसों रहे आलोक जी। उस सभा में सबके होंठ खुले थे। लेकिन कोई बोल नहीं रहा था। शोर में डूबे शहर और शोर में लगभग डूबी जिस जिंदगी के हमलोग आदि हो चुके हैं उसमें चुप्पी खलती है। लेकिन कोई बोले तो क्या बोले!

अचानक चले गए आलोक जी। एक आदमी जो सुबह अपने घर से दफ्तर के लिए निकला, शाम में आपके साथ नहीं रहा। आप क्या बोलेंगे?

यहीं आकर तो सारे तर्क धूल नजर आते हैं और कई बार ढोंग भी और फिर आपके साथ काम करने वाला, आपका दोस्त या फिर रिश्तेदार अचानक इतिहास में चला जाता है।

मैं अपने दो साथियों सत्येंदु जी और रघुवीर के साथ वहां था। दफ्तर के कई सीनियर संपादक वहां थे। अखबार के कई पत्रकार वहां थे। लगभग मौन।

अचानक मुझे लगा कि मेरे पास जो भाषा है, उसमें प्रार्थना करने में रही है दिक्कतें। मेरी भाषा के लगभग सारे पंचांग अचानक लड़खड़ा गए। पुष्प अर्पित करते हुए मेरे पास शब्द नहीं थे। वहां से लौटते हुए मुझे लगा कि आलोक जी से मैं पूछूं कि सुबह शेव करते हुए खुद को झागभरे आईने में देखते हुए या फिर जूते पहनते हुए आपने क्या सोचा होगा आलोक जी! नि:शब्द विदा गीत स्वीकार करें।

मूल खबर…

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