राजेंद्र त्रिपाठी-
यह सिर्फ उत्कर्ष के 39 वर्ष का उत्सव नहीं था…यह सिर्फ अमर उजाला का स्थापना दिवस का समारोह नहीं था। यह इन सबसे बड़ा नूतन-पुरातन का संगम था जहां भावनाओं का ज्वार हिलोरे ले रहा था। यहां वो लोग थे जिन्होंने पौध को श्रम से सींच कर से वट वृक्ष का आकार लेते देखा…यहां वे लोग थे जो इसकी छांव में शब्दशिल्प की बुनकरी से इसे और और विराट आकार देने में जुटे हैं।
12 दिसंबर 2025 का दिन भूत को अभूतपूर्व एहसास कराने का था। वर्तमान से जुड़े रहने का था। यहां भविष्य के सपने थे…सुहाने सपने जिनको पंख लगाना है और सफलता के सोपान हासिल करने के लिए उड़ान भरनी है। कहते हैं कि जो लोग इतिहास को नहीं भूलते…पूर्वज उनके अंतस तक स्थापित हैं, वह शिखर तक पहुंचते हैं…बुलंदियों को छूते हैं।
अमर उजाला ऐसा संस्थान है जिसका हाथ पकड़ा उसको छोड़ा नहीं। अटूट भरोसा जताया। इसी संकल्प ने अमर उजाला को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। कल की इस जुटान में मुझ समेत दो और साथी श्री नीरज कांत राही और मौजूदा राज्य सूचना आयुक्त श्री राजेंद्र सिंह थे जिनकी तीन दशक की यात्रा रही है…कामयाब यात्रा।
करियर की शुरुआत के वक्त हम सब ने सोचा भी नहीं था कि उनका सफर रिपोर्टर के पहले सोपान से शुरू होकर संपादक जैसे अंतिम सोपान तक जाएगा। अमर उजाला ने ऐसे लोगों को न केवल सपने दिखाए बल्कि उनको पूरा किया। उनकी ऊर्जा..उनके समर्पण को पहचाना। इसकी परख की अतुल भाई साहब ने। 12 दिसंबर 2025 के इस उत्सव ने अमर उजाला के फलसफा को रेखांकित किया।
अमर उजाला परिवार के तमाम साथी अक्सर कहते हैं कि उन्होंने अतुल जी को नहीं देखा…काश उनके साथ काम करने का मौका मिला होता!!! उन्होंने नहीं देखा उनके लिए मैं कह सकता हूं कि वे अपने यशस्वी प्रबंध निदेशक श्री तन्मय माहेश्वरी को देख लें। उन्हीं का अक्स…। मैंने कल उनके अंदाज-ए-बयां को देखा तो …देखता और सुनता रह गया। भाव भंगिमा से लेकर भावना तक। सब कुछ वैसा ही…वे बोले जा रहे थे, मैं अपलक उन्हीं को निहारे जा रहा था। कुछ क्षण के लिए मुझे मंच पर तन्मय जी नहीं अतुल भाई साहब दिखाई दे रहे थे।
अतुल भाई साहब सार्वजनिक मंच पर कम ही दिखाई देते थे। इस तरह के मंच उन्हें पहली बार सुना हल्लाबोल आंदोलन के दौरान डीआईजी रेंज मेरठ के दफ्तर के बाहर धरना स्थल पर। धरना स्थल पर मेरठ से राज्यसभा सांसद शांति त्यागी समेत शहर के तमाम प्रतिष्ठित लोग मौजूद थे। अतुल जी बोल रहे थे और लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुने जा रहे थे। वे भावावेश में थे…आक्रोश में थे पर शालीन थे। तालियों के गड़गड़ाहट के साथ उनका वक्तव्य समाप्त हुआ तो लोगों ने तारीफों के पुल बांध दिए। अच्छे अच्छे वक्ता फेल हो चुके थे।
कल कुछ ऐसा ही वक्त था। उद्घोषक ने प्रबंध निदेशक से मंच पर आकर आशीर्वचन का आग्रह किया। तन्मय जी मंथर गति से मंच की ओर बढ़े…माइक संभाला। पहली पंक्ति में बैठे लोगों को निहारा। उनके मुख से पहला शब्द निकला – “इस मंच से मैं आशीर्वचन कहने की स्थिति में नहीं हूं। जब मैं एक साल का था तो मेरठ आया। अमर उजाला मेरठ संस्करण और उनकी जर्नी कमोबेश एक साथ चलती रही। सेंट मेरीज में जब पढ़ रहा था तो यहीं से पेरेंट टीचर मीटिंग में लोग जाते थे। कुछ कमतर दिखता तो हौसला देते थे कि अगली बार अच्छा होगा”
उन्होंने स्वयं को मेरठ से जोड़ा- “मैं आज भी कहीं जाता हूं और लोग पूछते हैं तो यही बताता हूं कि मेरठ से हूं, रहता नोएडा हूं”। उन्होंने अमर उजाला परिवार के सदस्यों के समर्पण को याद किया- “बचपन में जब कभी आया तो लोगों को देर रात तक काम में जुटे देखा। एक घटना याद है मुझे, आग लगती है तो लोग जान बचाने के लिए बाहर भागते हैं। यहां उल्टा हो रहा था। दफ्तर में आग लगी तो साथी जान बचाने के बजाए जान पर खेल कर उसे बुझाने में जुटे थे। जिसके हाथ बाल्टी..डब्बा जो भी आया उसी से आग पर काबू पाने की कोशिश की।”
तन्मय जी उद्घोषक के आशीर्वचन को कृतज्ञता पूर्ण शब्दों से बदल चुके थे। इस सादगी..शालीनता ने लोगों का दिल जीत लिया। इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि अमर उजाला समूह का नेतृत्व सुरक्षित और विराट सोच रखने वालों के हाथ में है।




