वेतन हजार रुपये मासिक, संपादक के नखरे प्रेमिका वाले
- दम तोड़ते अखबार, भुखमरी के कगार पर ग्रामीण पत्रकार
- रुद्रप्रयाग के पत्रकार संपादक से बोले, ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतै नाच नचायो

गुणानंद जखमोला-
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में तैनात अमर उजाला के जिला प्रभारी समेत ब्लाक और तहसील में तैनात आधा दर्जन पत्रकारों ने इस्तीफा दे दिया है। प्रसार संख्या घटने के साथ ही मुख्यालय और ग्रामीण पत्रकारों पर संपादकों और प्रबंधकों का जुल्म लगातार बढ़ रहा है। उन्हें समाचार एकत्रित करने, डेली कंपेरेजेशन, कार्यसूची, नंबर देना, हर तीन महीने में अप्रेजल समेत अखबार के नाम पर अपराजिता जैसे कई प्रोग्राम निशुल्क करने के साथ ही विज्ञापन का टारगेट भी दिया जाता है। जबकि वेतन के नाम पर यह मनरेगा के चार दिन की दिहाड़ी के बराबर होता है।
जानकारी के अनुसार अमर उजाला जिला प्रभारी को 17 हजार से 21 हजार तक वेतन देता है जबकि तहसील स्तर पर 500 से एक हजार का मानदेय। यानी देहरादून जैसे महंगे शहर में इन ग्रामीण पत्रकारों को इस वेतन में 3 दिन की घर की सब्जी ही नसीब हो सकती है। तर्क दिया जाता है कि ये ग्रामीण पत्रकार फुलटाइमर नहीं हैं। क्या लाला इन्हें सम्मानजनक मानदेय नहीं दे सकता।
उत्तराखंड में दैनिक जागरण के बाद सबसे अधिक विज्ञापन अमर उजाला को मिलते हैं। औसतन दो से पांच करोड़ प्रति वर्ष। इसके बावजूद लाला वेतन बढ़ाने को तैयार नहीं। सालाना इंक्रीमेंट भी नहीं। गजब की बात यह है कि अमर उजाला ने कोरोना काल में कई स्टाफरों को ठेके पर लिया और उनका वेतन घटा दिया। अमर उजाला के संपादकों के नखरे किसी प्रेमिका से कम नहीं हैं, लेकिन वेतन बढ़ोतरी पर उन्हें सांप सूंघ जाता है।
2012 से 2016 तक मैं राष्ट्रीय सहारा देहरादून में चीफ सब एडिटर था। मैं अक्सर संपादक से इस बात पर लड़ता था कि स्ट्रिंगर को कम से कम बाइलाइन तो दी जाएं। मैं उनकी खबरों में वैल्यू एडेड कर कई बार पेज एक पर प्रकाशित करता था। वो स्ट्रिंगर आज भी मुझे याद करते हैं। क्योंकि न उन्हें अच्छा पैसा मिलता है और न ही बाइलाइन। बाइलाइन में भी भारी भेदभाव होता है।
दैनिक अखबारों में अब हालात और बदतर हो रहे हैं। देहरादून में इन्हीं अखबारों के कई पत्रकार एसयूवी में चल रहे हैं। उनका वेतन ही बहुत अच्छा नहीं है लेकिन चाटुकारिता और जमकर दलाली हो रही है। संपादक और बड़े पत्रकार जुगाड़बाजी कर विभिन्न सरकारी पदों पर भी काबिज हो रहे हैं। अधिकांश पत्रकार ईमानदार हैं और जुगाड़बाजी से दूर हैं तो उन्हें भी दून में महज एक-डेढ़ हजार का इंक्रीमेंट पर ही संतोष करना पड़ता है। पर यह बड़ा सवाल है कि ग्रामीण पत्रकार कहां जाएं? देहरादून में यदि साल में एक मीटिंग होती है तो बेचारों का दो-तीन महीनों का मानदेय ही किराया, होटल और खाने में खर्च हो जाता है। संपादक और प्रबंधक एक वक्त का खाना खिलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।
पहाड़ में ग्रामीण पत्रकारों के लिए भारी चुनौतियां हैं। हाल में उत्तरकाशी में डीडी न्यूज संवाददाता दिग्बीर बिष्ट का एक्सीडेंट हो गया। रोड इतनी खतरनाक हैं। वह धराली आपदा की कवरेज से लौट रहा था। देहरादून में इलाज के लिए जब अपने गांव से चला तो सड़क वॉशआउट हो गयी थी और उसे पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। पत्रकारों को मुख्यालय से किसी गांव में जाने के लिए भी कई बार मीलों पैदल चलना पड़ता है तो कई बार बाइक से 20-30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इसका कोई हिसाब नहीं। डीएनई, एनई या संपादक कहता है, हमें कोई मतलब नहीं, खबर चाहिए। बीमार हो जाओ तो वेतन कट।
ऐसे कठिन चुनौतीपूर्ण माहौल में यदि अमर उजाला के जिला व ग्रामीण पत्रकारों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया तो समझा जा सकता है कि उन्होंने संपादक को क्यों कहा, ये ले अपनी लकुटिया कमरिया, बहुतै नाच नचायो।



Guddu
October 27, 2025 at 9:17 pm
और जिला व देहात के पत्रकारों के लिए अमर उजाला में इन्टरव्यू ऐसा कि जैसे पीसीएस की नौकरी मिल रही हो। और सैलरी श्रमिक के बराबर यानि दस से पंद्रह हजार
Satish chandra gairola
October 30, 2025 at 6:15 pm
समय बदलने में देर नहीं लगती….इसका उदाहरण यह है कि—
वर्ष 2024 से इस अखबार का घमंडी, कान का कच्चा और अहंकारी संपादक लोगों की नौकरी को बिना कारण के खाए जा रहा था। सुबह की मीटिंग में बड़ी अकड़ के साथ बोलता था कि फलानी जगह दूसरा आदमी रख दो, जबकि इसको यह भी पता है कि जिन रिपोर्टरों को बदलने के लिए यह और इसके चमचे कहते थे उन रिपोर्टरों को महीने के मात्र 500 और 1000 रूपये दिए जाते थे। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता है। अब यह किसी को नौकरी से क्या निकालेगा, लोग खुद इसका साथ छोड़कर जा रहे हैं।
वर्ष 2023 के आखरी महीनों में इस के संपादक बनकर आने के बाद बड़े-बड़े दिग्गज पत्रकार हिन्दुस्तान व जागरण में आ गए थे। पौड़ी और उत्तरकाशी के दो दिग्गज पत्रकारों ने भी जागरण ज्वाइन कर दिया था। अब हाल ही में रूद्रप्रयाग जिले से श्री विनय बहुगुणा और उनकी टीम ने जब रिजाइन किया तो शायद इसके संपादक को पता चल गया होगा कि देहरादून में ए.सी. रूम में बैठकर कुछ नहीं होता है आखिर काम तो ग्राउंड जीरो के रिपोर्टर ही आते हैं।
दिल्ली/नोएडा में बैठा नशीली आखों वाला इसका साहिब भी कम नहीं है। ब्यूरो को ठेके पर संवाद का आदमी बनाने वाला मास्टर मांइड यही है। जो स्टाफर थे उनकी तनखा को काटकर उनको संवाद का आदमी बना दिया। जबकि नोएडा में ए.सी. कमरे में बैठकर यह संस्थान से लाखों रूपये तनखा ले रहा है।