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सुख-दुख

पत्नी को अपनी किडनी देने जा रहे पत्रकार अमित पांडेय इस संकट से भी निपट लेंगे.. उम्मीद है!

सत्येंद्र पीएस-

आज Amit Pandey ने फेसबुक पर लिखा कि 20 तारीख को पत्नी की किडनी ट्रांसप्लांट होगी, तबसे दिमाग में वही घूम रहे हैं. पत्नी को वह अपनी किडनी देने जा रहे हैं तो उन्हें खुद भी भर्ती रहना पड़ेगा!

मैं उनके कुछ मित्रों में होऊंगा, जो उनकी पत्नी की किडनी की समस्या से पहले दिन से वाक़िफ़ हूँ. उसके बावजूद मूड ऑफ रहा. तमाम बातें दिमाग में घूमती रहीं. किडनी ट्रांसप्लांट की जटिलताओं के साथ सक्सेस स्टोरी के बारे में सोचता रहा.

अमित से मेरी मुलाकात 2008 की सर्दियों में हुई जब हम लोगों ने एक ही संस्थान में नौकरी पकड़ी. अमित भी मेरी ही तरह मस्त इंसान थे तो नज़दीकी सी हो गई.

मेरी शादी हो चुकी थी, अमित की नहीं हुई थी. उस समय हम लोग तमाम हवाई ख्वाब देखते थे. मुझे याद है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में हम लोगों ने प्लान बनाया कि राजनीति में इनवॉल्व हुआ जाए. एक दूसरे के लक्षण देखकर तय हुआ कि अमित जी भाजपा पकड़ें और मैं कांग्रेस पकडूं.

अमित तत्काल एक्टिव हो गए. उन्होंने यह बातचीत होने के एक हफ्ते के भीतर ही लाल कृष्ण आडवाणी का वार रूम ज्वाइन कर लिया और भाजपा के लिए मेहनत करने लगे. मैं कभी कांग्रेस दफ्तर गया ही नहीं. कांग्रेस सत्ता में थी तो उसे भी कोई जरूरत नहीं थी और मैं भी आलसी.

अमित जब 2009 का लोकसभा चुनाव कवर करने गए तो मुझे अभी भी याद है कि अमित जी ने खबर दी कि यूपी में कांग्रेस 25 लोकसभा जीत जाएगी और भाजपा दहाई अंक में भी नहीं पहुंचेगी. अमित जी की वह खबर केवल इसलिए रद्द हो गई कि मैंने अपनी एक्सपर्ट राय यह दी थी कि आंकड़े बेहद हास्यास्पद हैं. कांग्रेस 6 सीट से ज्यादा जीत ही नहीं सकती.

खैर.. रिजल्ट आया. मनमोहन सरकार बनी. भाजपा ने हार का ठीकरा evm मशीन पर फोड़ दिया. मैं कभी कांग्रेस दफ्तर गया नहीं और अमित जी की पार्टी ही फेल हो गई! उसके बाद अमित जी दूसरे संस्थान में चले गए.. उनका विजन क्लीयर था कि इस संस्थान में हमारे और आपके लिए कुछ बचा नहीं है, ऐसे ही नौकरी करते रहिए तो कोई दिक्कत नहीं है.

अमित जी भाजपा माइंडेड बने रहे. नौकरी छोड़कर Narendra Modi के लिए काम किया. मोदी सरकार भी बन गई. लेकिन आखिरकार फिर नौकरी में लौट आये और अभी समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा में काम कर रहे हैं. इस बीच मेरी जिंदगी को ग्रहण लग गए. मुझे मोदी सरकार बनते ही कैंसर डिटेक्त हुआ.

जब जाँच के लिए सैंपल दिया था तो कांग्रेस नेता और वकील मित्र मकरंद प्रताप सिंह के साथ घंटों घूमा, वह मैक्स में एक कैंसर के डॉक्टर को दिखाने ले गए तो उसने सीधे बोल दिया कि यह कैंसर है. उसके बाद मेरी आँख से आँसू रुकने के नाम ही नहीं ले रहे थे. मकरंद जी drive कर रहे थे और आश्वत कर रहे थे कि कुछ नहीं होगा. मुझे ध्यान है कि मेरे मुँह से इतना ही निकला था कि जानते हैं? मेरे खाते में तीन हजार रुपये नहीं थे इसलिए सरकारी अस्पताल में बायोप्सी कराया. मकरंद जी साउथ के एक कांग्रेसी मन्त्री के यहाँ ले गए जिनकी अस्पताल की चेन थी. उनसे मुलाकात नहीं हुई. मुझे घर छोड़ते उन्होंने एटीएम से पंद्रह हजार रुपये भी निकालकर दिया. आपको आश्चर्य होगा कि मैं मकरंद जी से जिंदगी में पहली बार मिला था!

मुझे ध्यान है कि जब बायोप्सी रिपोर्ट आई और पता चला कि कैंसर हो गया है तो उस समय मेट्रो में इंद्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन पर Nilkamal Sundram के सामने फूट फूटकर रोया था. भले ही मकरंद जी के रिलेटिव डॉक्टर ने बोल दिया था कि कैंसर है, लेकिन एक उम्मीद थी कि हो सकता है कि कुछ न निकले!

उसके बाद तीसरी बार अमित पांडे के सामने रोया. वह कहते रहे कि कुछ नहीं होता है. हँसाने की कोशिश करते रहे. कभी-कभी गुस्सा भी आता था कि अभी 8 साल शादी को हुए, बेटी 7 साल की है, साल भर का बेटा है. और डॉक्टर के मुताबिक मेरे मर जाने की संभावना 70 प्रतिशत है. सब कुछ घूम रहा था. लेकिन इंडिया गेट पर घूमते अमित जी ने मास्टर स्ट्रोक लगाया कि आप जब मर ही जाएंगे तो चलिए आंध्र भवन में भरपेट खाना खाते है.

कभी-कभी मुस्कुराहट के पीछे बड़ा दर्द होता है. मुझे रुलाई नहीं आती. अम्मा बोलती थी कि ई बड़ा कठकरेजी है! सोशल मीडिया पर भी मेरा वही रूप दिखता है. कभी-कभी तो भीतर का दर्द घर के लोग भी नहीं समझ पाते. पुरुष उसे छिपाये रहता है कि कोई कमजोर न समझ ले. लेकिन कुछ लोग होते हैं जिनके कन्धे पर रो लेने से दिल हल्का हो जाता है और मेरे लिए अमित जी उनमें से एक हैं.

अमित जी ने तमाम उद्यम उपक्रम किए. जब कोई श्रीराम शर्मा का डायलॅाग कहता है कि “सफलता इसलिए नहीं मिली कि हमने सच्चे मन से कोशिश नहीं की”, तो बड़ा बुरा लगता है. मुझे अपने से ज्यादा अमित जी की ज़िंदगी याद आती है. अमित से जब आर्थिक सामाजिक संकट की बात करता था तो ऐसे ही बोले कि आपके पिता जी गवर्नमेंट में क्लास टू ऑफिसर थे और मेरे पिताजी फैक्ट्री मजदूर. कोई जमीन नहीं है हमारे पास! आपसे कम ही सेलरी पाता रहा हूँ.

अमित जी की पत्नी जब कॉलेज में लेक्चरर हुई तो बड़ी खुशी हुई कि अब अच्छे दिन शुरू हो गए हैं. यह अच्छे दिन कुछ ही समय चले कि जागृति जी की किडनी ही खराब हो गई जो बेहद घरेलू, धार्मिक, सात्विक, शाकाहारी हैं.

अमित जी जब मिलते हैं तो एकदम बिंदास. जैसे मैं तमाम मुसीबतों मे फेसबुक पर दिखता था. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि अमित जी के लिए मैं क्या कर दूँ? हम जैसे लो पेड वर्कर के लिए सरकारी अस्पताल का ही सहारा होता है और किसी गम्भीर रोग में तो वह भी कभी कभी affordable नहीं रह जाता. मैं अपनी तरफ से जो बन पड़ेगा, जो समझ में आयेगा वह करूँगा और कर रहा हूँ. आप भी जो कर सकते हैं करें. अमित जी इस संकट से भी निपट लेंगे… यह उम्मीद और दुआ शुभकामनाएं हैं.


ये फोटो जितनी रोमांटिक लग रही है, अपनी जिंदगी हमेशा उतनी रोमांटिक रही नहीं। सुख आया, लेकिन हमेशा किसी मेहमान की तरह आया। अच्छी बात ये रही कि जब दुख आया, तो वो भी ज्यादा देर टिक नहीं पाया।
हमारा जीवन सुख-दुख के बीच एक पगडंडी की तरह रहा है। 20 मई को एम्स, दिल्ली में जागृति का किडनी ट्रांसप्लांट होना है।
मुझे पूरा भरोसा है कि आप सबके प्यार और शुभकामनाओं से वही पुराना क्रम एक बार फिर दोहराया जाएगा। जब हमारे दरवाजे पर खड़ा दुख फिर से टिक नहीं पाएगा। हारकर लौट जाएगा।
बस इतना आशीर्वाद दीजिए कि इस बार सुख ऐसी सुगंध की तरह आए, जो हमारे घर में हमेशा के लिए बस जाए। बहुत एक्साइटमेंट हो गया जिंदगी में। -अमित पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

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