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आज के अखबार : अमित शाह ने केरल में चुनावी तैयारी शुरू की और सोमनाथ की खबरें पहले पन्ने पर छा गईं

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ में से आठ अखबारों में सोमनाथ की ‘खबर’ पहले पन्ने पर है। ज्यादातर में यह खबर लीड है या सेकेंड लीड। कल मैंने लिखा था कि सोमनाथ से प्रधानमंत्री की खबर सिर्फ दि एशियन एज में लीड थी आज अमर उजाला में लीड है तो इंडियन एक्सप्रेस में सेकेंड लीड – लगभग एक ही शीर्षक के साथ। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा – सोमनाथ के पुनर्निर्माण का विरोध करने वाली ताकतें अब भी सक्रिय। खबर यह होनी चाहिए थी कि इंदौर में पीने का साफ पानी मुहैया कराने में सरकार अब भी निष्क्रिय, कांग्रेस ने निकाली न्याय यात्रा। मैंने कल लिखा था कि इंदौर में फिर लोग बीमार हुए हैं, उसकी खबर सिंगल कॉलम में थी। आज उसका फॉलोअप होना चाहिए था। लेकिन मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर तो नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकार को सिर्फ इंदौर पर जवाब देना है या कुछ करना है – सच्चाई यह है कि जिन मुद्दों पर उसे कुछ करना है या कहना है, वो सब मुद्दे अखबारों के पहले पन्ने से गायब हैं। सरकार कुछ कह-कर तो नहीं ही रही है। अगर कह-कर रही होती तो उसकी खबर क्यों नहीं होती? आज के अखबारों में साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार का प्रचार तो पूरा है ही, मनमानी की सरकारी कोशिशों में भ्रम फैलाना आम है और यह सब इस तरह किया जाता है जिससे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को चुनावी लाभ मिले। उदाहरण के लिए, आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – सुरक्षा उपायों के तहत सरकार स्मार्ट फोन के सोर्स कोड जानना चाहती है। इस खबर के अनुसार, टेक्नालॉजी फर्मों ने वलनरेबिलिटी एनालिसिस स्टैंडर्ड्स (भेद्यता विश्लेषण मानकों) का विरोध किया है। इसमें गोपनीय सूचना और ऑटोमेटिक मैलवेयर स्कैनिंग शामिल है। खबर में बताया गया है कि भारतीय दूरसंचार सुरक्षा आश्वासन आवश्यकताओं में 83 सुरक्षा मानकों का प्रस्ताव है। इनमें भारतीय बाजार में बिकने वाले स्मार्ट फोन के निर्माताओं के लिए सोर्स कोड का खुलासा शामिल है। तकनीकी कंपनियों का कहाना है कि ये ऐसे प्रस्ताव हैं जो दुनिया भर में कहीं भी पहले कभी नहीं किए गए गए हैं। इसलिए, ऐप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां इनका विरोध कर रही है और चूंकि ये प्रस्ताव अभी लागू नहीं किए गए हैं इसलिए सब कुछ पर्दे के पीछे चल रहा है और निश्चित रूप से यह खबर है।

रायटर की इस खबर को द हिन्दू ने आज लीड बनाया है जबकि पीआईबी फैक्टचेक ने कहा है, भारत सरकार ने ऐसे किसी उपाय का प्रस्ताव नहीं किया है जो स्मार्ट फोन निर्माताओं को अपना सोर्स कोड शेयर करने के लिए मजबूर करे। रायटर की खबर है, सिक्यूरिटी (सुरक्षा) ओवरहॉल में भारत स्मार्ट फोन निर्माताओं को सोर्स कोड देने के लिए मजबूर करने का प्रस्ताव कर रही है। पीआईबी फैक्ट चेक कहता है, A news report by @Reuters claims that India proposes forcing smartphone manufacturers to share their source code as part of a security overhaul. (रायटर की एक समाचार रिपोर्ट दावा करती है कि सुरक्षा ओवरहॉल में भारत स्मार्ट फोन निर्माताओं को अपना सोर्स कोड देने के लिए मजबूर करने का प्रस्ताव करती है।) स्पष्ट है कि भारत सरकार का प्रस्ताव है, यही खबर है और फैक्ट चेक ने नहीं कहा है कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। फैक्ट चेक कहता है, भारत सरकार ने ऐसा कुछ प्रस्ताव नहीं किया है….।  कहने की जरूरत नहीं है कि खबर भी ऐसा नहीं कहती है। खबर कहती है कि भारत सरकार का प्रस्ताव है। खबर से यह पक्का नहीं होता है कि प्रस्ताव किया गया है या नहीं। यही लगता है कि प्रस्ताव किया जाना है। पीआईबी फैक्ट चेक भी यही कह रहा है फिर भी इस दावे या खबर को फर्जी करार दिया गया है। बाकायदा आधिकारिक रूप से, सरकारी खर्चे पर,  सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों द्वारा।

इसका नतीजा यह हुआ कि यह खबर आज सिर्फ द हिन्दू में लीड है जबकि आज यह खबर कई अखबारों में छपनी चाहिए थी। जाहिर है, सरकार कुछ करना चाहती है। उसकी खबर लीक हो गई तो खबर को स्वीकार करने की बजाय रायटर जैसी संस्था के बारे में कह दिया गया है कि दावा फर्जी है। एक्स पर पीआईबी फैक्ट चेक ने यह भी लिखा है, किसी सूचना पर यकीन करने या उसे साझा करने से पहले आधिकारिक सूत्रो से उसकी पुष्टि करें। जाहिर है कि इस चक्कर में आज यह खबर दूसरे अखबारों में नहीं छपी और प्रधानमंत्री ने जो अर्थहीन-महत्वहीन बातें कहीं हैं वह लीड है। सरकार जब कह रही है कि खबरों की पुष्टि करें और प्रधानमंत्री खद कुछ कह रहे हैं तो प्रधानमंत्री के कहे को ही महत्व मिलेगा। वही आज के अखबारों में हुआ है। सोमनाथ में प्रधानमंत्री के भाषण के अलावा जो खबर आज लीड है वह द टेलीग्राफ में है। इसका शीर्षक है, “भाजपा की नजर ‘लूट’ में मदद पर”।  फ्लैग शीर्षक है, पार्टी के अनुसार मुख्यमंत्री ने नौकरशाही का राजनीतिकरण कर दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि ममता बनर्जी ने आई-पैक के ठिकानों पर ईडी के छापे को उनकी पार्टी की चुनावी योजनाओं और सूचनाओं को लूटने, चुराने की कोशिश कहा है। यह निराधार नहीं है। इसपर मैं यहां लिख चुका हूं। ममता बनर्जी का कहना है कि वे आईपैक के 10 ठिकानों में से एक (या एक-एक कर दो) पर गईं। बाकी की जगहों पर वे नहीं गईं, किसी को भेजने की खबर नहीं है क्योंकि उन्हें वहां उनकी और पार्टी की जानकारी होने की सूचना नहीं थी। दूसरी ओर, ईडी के छापे पर इस बार और पहले भी कई सवाल रहे हैं। ईडी की कार्यशैली और सफलता की दर पर भी सवालिया निशान हैं। ऐसे में ममता बनर्जी का दावा निराधार नहीं है और मामला अदालत में भी है। इसके बावजूद, खबर के अनुसार सत्तारूढ़ भाजपा ने मुख्यमंत्री के यह कहने पर कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के रूप में काम किया और मुख्य मंत्री के रूप में नहीं, तब ये सवाल उठाए हैं जो शीर्षक है। भाजपा का कहना है कि ईडी के छापे के दौरान ममता बनर्जी जब फाइल लेने गई थीं तो पश्चिम बंगाल की सर्वोच्च नौकरशाही के लोग उनके साथ क्यों थे। मुझे लगता है कि ऐसे ही सवाल ईडी से या छापे के बारे में पूछे जा सकते हैं लेकिन उसका जवाब नहीं है, भाजपा के सवालों का जवाब चाहिए। मामला अदालत में तय होना है तब भी। इसलिए यह खबर तो है ही लेकिन प्रधानमंत्री जब खबर और शीर्षक देंगे तो बाकी सब पीछे रह ही जाएगा।

आज जिन खबरों को महत्व नहीं मिला उनमें अंकिता हत्याकांड को लेकर विरोध प्रदर्शन की खबर शामिल है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, सामाजिक संगठनों ने पूरे राज्य में प्रदर्शन किया। कल बंद रखा गया था जिसका मिला-जुला असर रहा। एक खबर यह भी है कि इंदौर में कांग्रेस ने न्याय यात्रा निकाली। जीएसटी के एक इंस्पेक्टर पर 100 करोड़ के घपले का आरोप है। वह फरार है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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