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साहित्य

दैनिक जागरण वाले अनंत विजय RSS के पर्चे ही पढ़ लेते तो इतना झूठ न बोलना पड़ता!

अंबरीश कुमार-

इतना झूठ! ये देखिये अनंत विजय अब इतिहासकार बन गए – काश आरएसएस के ही पर्चे पढ़ लेते — कह रहे हैं कि आरएसएस की आज़ादी की लड़ाई में बड़ी भूमिका रही हैं और “१९२०” में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पर देश द्रोह का मुकदमा चला था.

अलबत्ता उस समय संघ की स्थापना ही नहीं हुई थी और उस समय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस में थे —

फिर यह मुकदमा १९२१ का था– न कि १९२० का. मई १९२१ में कटोल और भरतवाडा में दिए भाषण पर उन पर मुकदमा चला था और अदालत में उन्होंने उससे भी अधिक आक्रामक भाषण दिया था, जिसमें उन्हें एक साल की सजा हुई थी. (स्रोत – आरएसएस फेक्ट चेक, जनसत्ता, राकेश सिन्हा का लेख)

कहते हैं कि उससे ही भयभीत हो कर डॉक्टर साहब ब्रिटिश – सेवा को राजी हो गए और आगे चल कर १९२५ में संघ की स्थापना कर ली.

जनाब यह बताएं कि १९२५ के बाद किसी आन्दोलन में संघ शामिल हुआ? दसियों लेख, पत्र सामने हैं जिसमें आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई से दूर रह कर काम करने की बात कही है. १९३१ में भगत सिंह और साथियों की शहादत पर गुरूजी का वक्तव्य याद है न?

अनंत जी – न घटना सही लिख पाए न ही तारीख —

फिर लिख्र रहे हैं कि भगतराम तलवार ने नेताजी सुभाष चंद बोस की मुखबिरी की . अनत विजय जी भगतराम तलवार आज़ादी के बाद पीलीभीत में रहते रहे – खेती करते थे . आप उनके बारे में क्या जानते हैं ?

जनवरी 1941 में सुभाष चंद्र बोस ब्रिटिश सरकार की आँखों में धूल झोंककर नज़रबंदी से फ़रार हुए। अंग्रेज़ी राज की नज़रों से बचाकर धनबाद तक उन्हें पहुँचाने का ज़िम्मा उनके भतीजे शिशिर बोस ने उठाया। धनबाद से गोमो फिर दिल्ली होते हुए नेताजी पेशावर पहुँचे। पेशावर से उन्हें अफगानिस्तान के रास्ते सोवियत रूस की सीमा में दाखिल कराने की ज़िम्मेदारी थी कॉमरेड भगत राम तलवार पर। भगत राम तलवार के दुस्साहसिक कारनामों की ख़बर पहले ही नेताजी को मिल चुकी थी।

किरती पार्टी से जुड़े भगत राम तलवार एक ऐसे क्रांतिकारी परिवार से आते थे, जिसके खून में शहादत थी। उनके बड़े भाई हरि किशन दिसम्बर 1930 में पंजाब के गवर्नर जेफ़्री द मांटमोरेंसी पर जानलेवा हमला करने के जुर्म में फाँसी की सजा पा चुके थे। मगर उनके पिता लाला गुरदासमल को अपने बेटे की शहादत का कोई दुःख नहीं था। एक बेटे की शहादत के बाद उन्होंने अपने दूसरे बेटों को भी क्रांति की राह पर चलने की प्रेरणा दी।

उल्लेखनीय है कि लाला गुरदासमल ने अपने बेटे हरि किशन से कहा था ‘हरेक इंसान को एक न एक दिन मरना ही है। मगर जो देश के लिए मरता है, वह अमर हो जाता है। मुझे पता है कि तुम अपने कर्त्तव्य पथ से विचलित नहीं होगे, डिगोगे नहीं। और ना ही तुम तलवारों के नाम पर कोई आँच आने दोगे।’

अपने इस परिवार की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाया भगत राम तलवार ने। लाहौर के महान क्रांतिकारी राम किशन और धन्वन्तरि उनके गुरु थे। नज़रबंदी से फ़रार होकर सोवियत रूस जाने की अपनी योजना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सरदार निरंजन सिंह तालिब को पहले-पहल बताई थी, जो उस वक़्त कलकत्ता में ‘देश दर्पण’ के सम्पादक थे। तालिब ने इस संदर्भ में भूमिगत कम्युनिस्ट नेता अच्छर सिंह चीना से सम्पर्क किया, जो उस वक़्त कलकत्ता में ही थे। चीना ग़दर पार्टी से जुड़े रहे थे और उस वक़्त कीर्ति किसान पार्टी के नेता थे। अच्छर सिंह चीना ने नेता जी से सम्पर्क किया और उनसे बातचीत के बाद उनकी मदद का वादा किया।

नेताजी को सोवियत यूनियन तक सुरक्षित पहुँचाने की ज़िम्मेदारी कीर्ति किसान पार्टी ने अपने सबसे योग्य कार्यकर्ता भगत राम तलवार सौंपी। जो ऐसे मिशन पहले भी सफलतापूर्वक अंजाम दे चुके थे। भगत राम तलवार ने यात्रा का खाका तैयार किया, जो इस प्रकार था : पेशावर, जमरुद होते हुए खजुरी मैदान स्थित ब्रिटिश सेना की छावनी के निकट से अफ़रीदी कबीले के क्षेत्र में प्रवेश। काबुल-पेशावर रोड पर चलते हुए भाटी कोट, जलालाबाद से अड्डा शरीफ़ जाकर जलालाबाद वापस लौटना और वहाँ से काबुल फिर आगे की यात्रा। नेताजी ने अड्डा शरीफ़ की पवित्र यात्रा पर जा रहे एक मुस्लिम का बाना धरा और भगत राम तलवार उनके सहयोगी बने। यह सभी कुछ बोस से जुडी फाइल्स में दर्ज हैं —

आप अपना बताएं कि १९४१ तक तो संघ 16 साल का हो गया था / उसने क्या किया नेताजी के लिए ? १९४२ के दुसरे विश्व युद्ध में नेताजी की आज़ाद हिन्द फौज के खिलाफ ब्रितानी सेना में भर्ती के लिए अपील आरएसएस या हिन्दू महासभा के ही लोग कर रहे थे न — आरएसएस के लोग तो भारत छोडो आन्दोलन के खिलाफ ब्रितानी सेना के वोलेंटीयर बने थे — यह सच नहीं है क्या कि १९४२ के भारत छोड़ी आन्दोलन का हिन्दू महा सभा, मुस्लिम लीग के साथ कम्युनिस्ट ने भी विरोध किया था और इसी लिए इन तीन दलों के अलावा सभी दलों पर पाबंदी नहीं- अवैध घोषित कर दिया गया था?? आप तो १९४२ में कम्युनिस्टों के साथ गलबहिया कर रहे थे??

दैनिक जागरण जैसे अखबार को इतिहास के पन्नों को सलीके से छापना चाहिए

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1 Comment

1 Comment

  1. हरजिंदर

    September 1, 2025 at 3:57 pm

    कीर्ति नहीं किरती पार्टी।
    चीना नहीं छीना।

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