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सुख-दुख

छह महीने तक कोमा में रहने के बाद अस्पताल से ज़िंदा लौट आए वरिष्ठ पत्रकार अनेहस शाश्वत की कहानी!

यशवन्त सिंह-

मैं अपने को बहुत सारी फालतू की सांसारिकता और व्यस्तता से बचा कर रखना चाहता हूँ। मैं ज्यादातर वक्त सोचता रहता हूँ, ऑब्जर्व करता रहता हूँ। मनुष्य को खासकर देखता रहता हूँ। मनुष्य के जीवन का कोई तय एसओपी नहीं है। मानक संचालन प्रक्रिया न होने से भारी विविधता रहती है मनुष्य जीवन में। अपने एक सीनियर जर्नलिस्ट मित्र हैं। लखनऊ में। अनेहस शाश्वत। वे पंद्रह साल पहले छह माह पीजीआई में कोमा में रहे थे। छह माह। क्या इतने वक्त तक वेंटीलेटर लगाये रखने की औक़ात (मानसिक और आर्थिक, दोनों) रखते हैं आप के घर वाले? और साला रोग ग़ज़ब कि छह माह तक कोमा करने के बाद एक दिन भाग गया। शाश्वत जी का आज हालचाल के लिए फ़ोन आया तो उस प्रसंग का जिक्र होने पर उनसे अनुमति लेकर रिकॉर्ड किया। सुनिएगा पूरा ध्यान से। बहुत ज़िंदादिल शख़्सियत हैं शाश्वत जी। सुल्तानपुर जिले के पहले सांसद बाबू गनपत सहाय के पौत्र हैं। पत्रकारिता में मेरे मेंटर हैं।

जीवन अदभुत है। आप लाखों तरीके से सोच और जी सकते हैं। लेकिन ध्यान से देखियेगा, हम सब धीरे धीरे एक समय गुजरने के बाद एक टाइप्ड/ रूटीन सा जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं जिसमें सुबह से शाम तक की पूरी दिनचर्या और सोचने करने का तरीका प्री डिसाइड होता है। जैसे हम आप के बारे में बता सकते हैं कि आप क्या सोचोगे, क्या करोगे, क्या कहोगे! सबका एक पैटर्न है जिसके सूत्र / केंद्रीय बिंदु को बड़े आराम से पकड़ा जा सकता है।

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